महाकुंभ 12 साल में एक बार आता है, ये तो सुना था लेकिन एक ऐसा फूल भी है जो 12 साल में एक बार खिलता है. इस फूल का नाम 'नीलकुरिंजी' है जो दक्षिण भारत की पश्चिमी घाटी में पाया जाता है. इस फूल का वैज्ञानिक नाम स्ट्रोबिलैंथस कुंथियाना है और ये हल्के बैंगनी नीले रंग का होता है. इसे दुर्लभ प्रजाति के तौर पर जाना जाता है.

ये फूल केरल में खिलता है

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ये फूल केरल के मुन्नार में हर 12 साल में एक बार खिलता है. इस फूल के खिलने के साथ ही देश-विदेश से भी लोग यहां आते हैं. केरल की स्थानीय भाषा में नील का मतलब होता है 'रंग' जबकि कुरिंजी इसका स्थानीय नाम है.

इस साल खिला है 'नीलकुरिंजी'

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पिछली बार ये फूल साल 2006 में खिला था. ये फूल एक बार फिर पूरे 12 साल बाद जुलाई की शुरुआत में ही मुन्नार की पहाड़ियों को अपने नीले रंग में चुका है. जुलाई से सितम्बर तक पूरे 3 महीने के लिए ये फूल पर्यटकों को रोमांचित करते रहेंगे. मुन्नार वैसे भी केरल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है और यहां के हरे-भरे चाय के बागान 'नीलकुरिंजी' के नीले रंग के समक्ष फीके नज़र आने लगे हैं. इन दिनों मुन्नार के आस-पास की हर पहाड़ी नीले फूलों से सज चुकी है.

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मुथिरपुझा, नल्लथन्नी और कुंडल पर्वत श्रृंखलाओं से मिलकर बना मुन्नार समुद्र तल से 1600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. 'नीलकुरिंजी' फूल के खिलने से इन तीनों पहाड़ियों का रंग नीला हो जाता है. इसीलिए इन पहाड़ियों को ‘नीलगिरी’ नाम दिया गया है.

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साल 2006 में 'नीलकुरिंजी' के फूलों को देखने के लिए 3 लाख पर्यटक मुन्नार आये थे. केरल पर्यटन विभाग के अध‍िकारियों का अनुमान है कि साल 2018 में ये संख्‍या 8 लाख तक पहुंच सकती है. पर्यटकों की भीड़ बढ़ जाने के कारण मुन्नार के 'एराविकुलम नेशनल पार्क' में प्रतिदिन 3500 लोगों को ही आने दिया जा रहा है.

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इस नेशनल पार्क के लिए ऑनलाइन टिकट भी ख़रीदा जा सकता है. टिकट की कीमत वयस्‍कों के लिए 120 रुपये, बच्‍चों के लिए 90 रुपये, जबकि विदेशी नागरिकों के लिए 400 रुपये है.

भारत में 'नीलकुरिंजी' के फूल की कुल 46 प्रजातियां हैं जिनमें से सर्वाधिक प्रजातियां मुन्नार में ही पायी जाती है.

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