देश की आज़ादी के लिए कई क्रांतिकारी शहीद हुए. कुछ क्रांतिकारियों ने खुलकर अंग्रेज़ों का विरोध किया, तो कुछ परदे के पीछे रहकर देश की आज़ादी के लिए रणनीति बनाया करते थे. भगत सिंह, राजगुरु, चंद्र शेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ुल्ला ख़ान, सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों के नाम हमारी ज़ुबान पर होते हैं, लेकिन उन क्रांतिकारियों का क्या जिनकी रणनीतिक सोच के कारण ही भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी देश को मिले.

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ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे रास बिहारी बोस. जिन्हें हिन्दुस्तान में तो भुला दिया गया, लेकिन जापान में वो आज भी हर किसी के हीरो हैं. रास बिहारी वही हीरो थे जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए कई सफ़ल नीतियां बनाईं, जिनकी वजह से ही क्रांतिकारियों को अंग्रेज़ों को खदेड़ने में सफ़लता मिली. बस एक इतिहासकार ही हैं, जो आज भी रास बिहारी बोस को देश के बड़े क्रांतिकारियों में से एक मानते हैं.

चलिए जान लेते हैं कि रास बिहारी बोस आख़िर थे कौन?

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वो क्रांतिकारी जिसने 'आज़ाद हिंद फौज' की नींव रखी. मौत से पहले उन्होंने 'आज़ाद हिंद फ़ौज' की जिम्मेदारी सुभाष चंद्र बोस को सौंपी थी. बीसवीं सदी के शुरूआती दशकों में जितने बड़े क्रांतिकारी षड़यंत्र हुए उन सबके सूत्रधारों में शामिल रास बिहारी बोस ही थे. गदर रिवोल्यूशन, अलीपुर बम कांड, युगांतर पार्टी का विस्तार हो या फिर गर्वनर जनरल हॉर्डिंग की हत्या की प्लानिंग, इन सब के मास्टर माइंड रास बिहारी बोस ही थे.

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ब्रिटिश काल में गवर्नर जनरल की वही हैसियत होती थी, जो इस वक़्त प्रधानमंत्री की है. रास बिहारी बोस ने उसी गवर्नर जनरल लॉर्ड हार्डिंग की हत्या की योजना बनाई जिसने देश की राजधानी कोलकाता से दिल्ली बनाई थी. उस वक़्त रास बिहारी देहरादून की फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम कर रहे थे, केमिकल्स के साथ उनका लगाव इस कदर था कि उन्होंने 'क्रूड बम' बनाना सीख लिया था. उन्होंने इसी बम से लॉर्ड हॉर्डिंग की हत्या की योजना बनाई.

दिसंबर 1911, में जब गर्वनर जनरल लॉर्ड हार्डिंग को नई राजधानी दिल्ली में पहली कदम रख रहे थे. उनके ज़ोरदार स्वागत के लिए पूरी दिल्ली में तैयारियां जोरों पर थी. चांदनी चौक से बड़े भव्य तरीके से हाथी पर बैठकर लॉर्ड हॉर्डिंग की रैली निकल रही थी. तभी रास बिहारी ने अपने साथी युवा क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास को बम फेंकने का आदेश दिया. बम फेंकने के साथ ही चारों तरफ़ अफ़रातफ़री मच गई. सभी लोगों को लगा कि हॉर्डिंग की मौत हो गई है, लेकिन वो बच निकला. इसके बाद रास बिहारी रात की ट्रेन देहरादून निकल लिए और सुबह ऑफ़िस भी ज्वॉइन कर लिया. कई महीनों तक अंग्रेज़ पुलिस इस बात का पता नहीं लगा पाई कि आख़िर इस षड़यंत्र का मास्टर माइंड कौन था? इतिहास में इसे 'दिल्ली कॉन्सपिरेसी' के नाम से जाना जाता है.

इसी दौरान प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया. रास बिहारी बोस आज़ादी की रणनीति बनाने के लिए अप्रैल में 1915 में जापान चले गए. उन दिनों जापान कई देशों के क्रांतिकारियों की शरणगाह बना हुआ था. इस दौरान उनकी मुलाक़ात चीन के क्रांतिकारी नेता सन यात सेन से हुई. कई भारतीयों से भी उनकी मुलाकात हुई जो देश को आज़ाद देखना चाहते थे. अंग्रेज़ सरकार बुरी तरह उनके पीछे पड़ी हुई थी, जब उन्हें पता चला कि रास बिहारी बोस टोक्यो में हैं, तो मित्र देश होने के नाते उन्होंने जापान सरकार से रास बिहारी बोस को उन्हें सौंपने की मांग की. लेकिन एक ताकतवर जापानी लीडर ने उन्हें अपने घर में छुपा लिया जो अंग्रेज़ों से नफ़रत करता था.

'इंडियन करी' ने जापान में किया फ़ेमस

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इस दौरान पुलिस हाथ धोकर उनके पड़ी हुई थी इसलिए उन्हें एक बेकरी मालिक के घर में छुपना पड़ा. ऐसे में वो बेकरी के लोगों और बेकरी मालिक के परिवार के साथ घुल-मिल गए और वहीं काम करने लगे. बेकरी के लोगों को भारतीय खाना बनाना सिखाने लगे. इसी दौरान उन्होंने एक डिश बनाई जो जापानियों को बेहद पसंद आई. जिसे 'इंडियन करी' नाम दिया गया. 'इंडियन करी' धीरे-धीरे इतनी मशहूर हो गई कि आज जापान के हर रेस्तरां में मिलती है. सबसे पहले 'नाकामुराया बेकरी' ने ही इसे अपने रेस्तरां में 1927 में इंडियन करी के नाम से लांच किया था. इसके बाद रास बिहारी जापान की संस्कृति, भाषा, व्यवहार में ही रंग गए. बेकरी मालिक के आग्रह पर रास बिहारी ने उनकी बेटी तोशिको से शादी कर ली.

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शादी के कुछ साल बाद उनके दो बच्चे हुए. सन 1925 में उनकी पत्नी की न्यूमोनिया से मौत हो गई. इसके बाद रास बिहारी एक बार फिर देश की आज़ादी के लिए कूद पड़े. इस दौरान उन्होंने टोक्यो में 'इंडिया क्लब' बनाया, कैसे देश को गुलामी से मुक्ति मिले इसकी रणनीति भी बनाई. भारतीय सैनिकों के विदेशी युद्धों में इस्तेमाल करने का विरोध किया और उन्हें एकजुट किया. इस दौरान उन्हें लगा कि वो अब बीते कल के नेता हैं, उन्हें एक नया लीडर चाहिए. इसी दौरान नेताजी बोस भारत छोड़कर जर्मनी पहुंचे तो रास बिहारी बोस को लगा कि सुभाष चंद्र बोस से बेहतर करिश्माई नेतृत्व उन्हें और कोई नहीं मिल सकता.

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बैंकाक में हुई लीग की दूसरी कॉन्फ़्रेंस में रास बिहारी बोस ने नेताजी बोस को आमंत्रित करने का फ़ैसला लिया. 20 जून 1943 को सुभाष चंद्र बोस टोक्यो पहुंचे. जापान पहुंचे तो रास बिहारी बोस को सुभाष चंद्र बोस से काफी आशाएं थीं, क्योंकि दोनों बोस थे, बंगाली थे, क्रांतिकारी थे, और एक-दूसरे के प्रशंसक भी थे. 5 जुलाई को वो सिंगापुर पहुंचे, नेताजी का ज़ोरदार स्वागत हुआ और उसी दिन रास बिहारी बोस ने 'इंडियन नेशनल आर्मी' की कमान नेताजी को सौंप दी. जबकि ख़ुद को सलाहकार के रोल तक सीमित कर लिया. कुछ साल बाद वो बीमारी के चलते हॉस्पिटलाइज़ हो गए, लेकिन जापान में अपने नाम और रिश्तों के ज़रिये उन्होंने सुभाष चंद्र बोस की पूरी मदद की. जापान सरकार ने जापान के इस भारतीय दामाद को जापान के दूसरे सबसे बड़े अवॉर्ड ‘ऑर्डर ऑफ़ दी राइजिंग सन’ से सम्मानित किया.

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साल 2013 में इसी क्रांतिकारी की अस्थियां 70 साल बाद जापान से भारत लाई जा रही थीं. उस वक़्त न भारत सरकार ने इसमें कोई दिलचस्पी दिखाई, न ही नेशनल मीडिया में किसी ने इस ख़बर को तवज्जो दी. पश्चिम बंगाल के चंदननगर के मेयर जब जापान से उनकी अस्थियां लेकर भारत पहुंचे, तो इसकी ख़बर न तो राज्य के सीएम और न ही देश के पीएम को थी.

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आज हालत ये है कि इतिहासकारों को छोड़ दिया जाए तो 'आज़ाद हिंद फ़ौज' के गठन में नेताजी बोस के अलावा कोई जानता तक नहीं है. मोहन सिंह या रास बिहारी बोस के उस योगदान का कहीं ज़िक्र तक नहीं होता.

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