क्रिकेट का मुकाबला बड़ा हो या छोटा, बल्ला ज़रूरी होता है. बल्ला बनाने के लिए कश्मीरी लकड़ी विलो सबसे उपयुक्त मानी जाती है. ऐसी ही एक बैट बनाने वाली फ़ैक्टरी की मालकिन हैं रिफ़त मसूदी. उनके इस व्यवसाय से घाटी के लोगों के आर्थिक हालात सुधरे हैं.

यूं तो श्रीनगर का नरवर इलाका स्थानीय निवासियों और सुरक्षा बलों के बीच होती झड़पों के लिए सुर्खियों में रहता है. मगर इस तनाव भरे माहौल से लड़ते हुए रिफ़त मसूदी घाटी के तनाव को कम करने में जुटी हुई हैं. रिफ़त कश्मीर की अकेली महिला बैट निर्माता हैं.

ससुर ने शुरू की थी फ़ैक्ट्री

उनके ससुर द्वारा शुरू कि गई बैट बनाने की फ़ैक्ट्री में इंडियन क्रिकेटर्स से लेकर स्थानीय युवकों के लिए बल्ले बनाए जा रहे हैं. इस फ़ैक्ट्री ने यहां के लोगों की मानसिक और आर्थिक हालात को बेहतर बनाने में काफ़ी अहम भूमिका निभाई है. आलम ये है कि अब तो लड़कियां भी उनके बनाए हुए बल्ले ख़रीदने आती हैं.

1990 में हुए दंगे में उनके ससुर ने फ़ैक्ट्री बंद कर दी थी. 1999 में रिफ़त ने घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए इसे फिर से शुरू किया. तब लोग दबे मुंह से उनकी आलोचना करते थे. कहते थे कि एक महिला होकर वो कैसे फ़ैक्ट्री चला पाएंगी. मगर रिफ़त ने उनकी बातों पर ध्यान न देते हुए अपने काम को जारी रखा.

पति ने दिया साथ

रिफ़त के पति वन विभाग में काम करते थे. बैट फ़ैक्ट्री के शुरू होने पर उन्होंने भी अपनी पत्नी का साथ दिया. रिफ़त ने अपने ससुर के पुराने कस्टमर्स से संपर्क साधा और उन्हें विलो से बने बेहतरीन बल्ले बनाकर दिए. उनकी मेहनत और लगन को देखते हुए बल्ले बनाने के ऑडर्स की संख्या लगातार बढ़ने लगी.

धीरे-धीरे लोगों को भी ये समझ में आने लगा कि कश्मीर के लोगों को पर्यटन या सेब की खेती के अलावा भी दूसरे व्यापार की ज़रूरत है. अब स्थानीय लोग भी उनके इस काम में मदद करने लगे हैं. वहां का माहौल बदला है और युवकों में इस खेल के प्रति दिलचस्पी बढ़ी है. अब उन्हें दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरू से भी ऑडर मिलने लगे हैं.

सचिन, गांगुली की हैं फ़ैन

रिफ़त सचिन, सौरभ और राहुल द्रविड़ की बल्लेबाज़ी की फ़ैन हैं. वो कहती हैं- 'हर कश्मीरी भारत-पाकिस्तान के मैच में पाकिस्तान को नहीं सपोर्ट करता. मगर इंडियन क्रिकेटर्स को सपोर्ट करने का मतलब ये तो नहीं कि हम किसी पाकिस्तानी फ़ास्ट बॉलर को पसंद नहीं कर सकते.'

यहां कि फ़ैक्ट्रियों के मालिक सालाना 1-10 करोड़ रुपये का बिजनेस करते हैं. जबकि यहां से तस्करी कर दूसरे राज्यों में भेजी गई विलो लकड़ी से चल रही फ़ैक्ट्रियों का सालाना टर्नओवर उनसे कई गुना ज़्यादा है.

विलो लकड़ी को दूसरे राज्यों में बेचना है बैन

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि, विलो लकड़ी को दूसरे राज्यों में बेचना बैन है. रिफ़त को सरकार से एक शिकायत है. उनका कहना है कि इस व्यवसाय को जीएसटी के 12% के वाले स्लैब में रखना चाहिए.

उनका सपना है कि देश ही नहीं विदेशों में भी उनके बल्ले की धूम हो. आशा है सरकार रिफ़त की शिकायत और कश्मीर के हालातों को देखते हुए इस इंडस्ट्री को बढ़ावा देने पर उचित कदम उठाएगी.