भारत के सतनाम सिंह भामरा दुनिया की सबसे मशहूर लीग नेशनल बास्केटबॉल एसोसिएशन (एनबीए) में खेलने वाले भारत के पहले खिलाड़ी हैं. 7 फ़ीट 2 इंच लंबे सतनाम का जन्म 10 दिसंबर 1995 को पंजाब के बरनाला ज़िले के बल्लो गांव में हुआ था. सतनाम के पिता बलबीर सिंह किसान हैं. मात्र 9 साल की उम्र में सतनाम 6 फुट 2 इंच लम्बे हो गए थे. इसको देखते हुए उनके परिवार ने उनका दाख़िला 'लुधियाना बास्केटबॉल अकादमी' में करवा दिया था. जहां भारत के दिग्गज कोच डॉ. सुब्रमण्यम के संरक्षण में उन्होंने प्रशिक्षण लिया.

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सतनाम एक ऐसे गांव से आते हैं जहां आज भी बुनियादी सुविधाएं न के बराबर हैं. ऐसे गांव से निकलकर 'लुधियाना बास्केटबॉल अकादमी' पहुंचना फिर नेशनल बास्केटबाल एसोसिएशन लीग में खेलना अपने आप में किसी सपने के सच होने के बराबर है. सतनाम की सबसे ख़ास बात ये थी कि उनकी हाइट बास्केटबॉल के हिसाब से बहुत अच्छी थी जो कि हमेशा से ही उनके लिए फ़ायदेमंद रही. दूसरा उनका खेल लगातार अच्छा हो रहा था. इसी बीच साल 2010 में जब वो मात्र 14 साल के थे, उन्हें अमेरिका के फ़्लोरिडा स्थित IMG Academy में ट्रेनिंग लेने का मौका मिला.

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सतनाम ने पांच साल तक IMG अकादमी में ट्रेनिंग ली. इस दौरान उन्होंने कॉलेज बास्केटबॉल में अपने प्रदर्शन से सबको प्रभावित किया. सतनाम को 2015 में डैलस मावेरिक्स की ओर से एनबीए के दूसरे राउंड के ड्राफ़्ट में शामिल किया गया था. डैलस ने साल 2011 में NBA का ख़िताब अपने नाम किया था. इस टीम में डर्क नोविट्ज़स्की जैसे स्टार खिलाड़ी खेलते हैं. सतनाम ने दो साल टेक्सास लेजेंड्स में बिताए. जो मावेरिक्स से संबंद्ध जी-लीग क्लब है.

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सतनाम आज भारत के उन युवाओं के लिए रोल मॉडल हैं, जो अपने बास्केटबॉल के सपने को सच करने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं ताकि कल के दिन उनमें से भी कोई नया सतनाम एनबीए जैसी लीग में खेल सके. लेकिन साल 2017 में सतनाम अचानक भारत लौट आये और इस समय अपने गांव में अपने परिवार के साथ ही रह रहे हैं. साथ ही लुधियाना बास्केटबॉल अकेडमी में बच्चों को ट्रेनिंग भी दे रहे हैं. जिस सतनाम को भारत के लोग अंतर्राष्ट्रीय बास्केटबॉल स्टार बनने का सपना देख रहे थे. वो इन दिनों गुमनामी के अंधेरे में जी रहे हैं. अचानक ऐसा क्या हुआ कि वो अमेरिका छोड़कर भारत आ गए.

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सतनाम का कहना है कि 'लोगों को लगता होगा कि मैंने अमेरिका में ढेर सारा पैसा कमाया होगा, लेकिन ऐसा बिलकुल भी नहीं है. मुझे साल 2017 में सिर्फ़ 9 खेलने को मिले. इस दौरान मुझे प्रति मैच मात्र 500 डॉलर ही मिलता था. मैच नहीं खेलने पर कोई भी पैसा नहीं मिलता था. जबकि लीग के तरफ़ से अब तक मुझे खेलने के लिए कोई कॉल नहीं आया है. अब मुझे अपना करियर समय से पहले ही ख़त्म होने का डर सता रहा है. अगर मुझे आगे मैच खेलने को मिलते हैं तो ज़रूर जाऊंगा. फ़िलहाल मैं इंडिया में रहकर बच्चों के बास्केटबॉल के सपने को पूरा करने में उनकी मदद कर रहा हूं.'
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सतनाम ने आगे कहा कि 'भारत में बास्केटबॉल शुरू हुए 72 साल हो गए हैं लेकिन जिस लेवल तक मैंने खेला वहां तक कोई नहीं पहुंच पाया. ऊपरवाले ने मुझे अच्छी हाइट दी जिसके लिए मैं उनका हमेशा शुक्रिया अदा करता हूं. लुधियाना में मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला. क्योंकि उस दौरान मुझे कई अच्छे लोग मिले जिन्होंने मेरी मदद की. अपने खेल और लोगों की मदद की वजह से ही मैं फ़्लोरिडा तक पहुंच पाया.'

सतनाम के माता-पिता का कहना है कि, जब सतनाम छोटा था तभी से वो बास्केटबॉल खेलने लगा था. लेकिन गांव में इस खेल के लिए किसी भी प्रकार की सुविधा नहीं थी. इसलिए हमने उसे छोटी सी उम्र में ही लुधियाना भेज दिया. वो इन दिनों वो घर पर ही है लेकिन न ही केंद्र और पंजाब सरकार की तरफ़ कोई मदद नहीं मिली. साल 2015 में ही वो एनबीए में सेलेक्ट हो गया था तब से सरकार ने कोई जॉब भी नहीं दी.

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आईएमजी अकेडमी का कहना कि, सतनाम जितने टाइम भी हमारे साथ खेला उसका खेल शानदार रहा. यही कारण है कि उसको एनबीए में खेलने का मौका मिला. सतनाम में अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी बनने की सारी ख़ूबियां हैं. जो एक स्टार बास्केटबाल खिलाड़ी में होनी चाहिए.