मणिपुर की तबाबी देवी थांगजाम जूडो में ओलंपिक स्तर पर पदक जीतने वाली पहली भारतीय बन गईं हैं. तबाबी ने महिलाओं की 44 किलोग्राम वर्ग में तीसरे यूथ ओलंपिक में रजत पदक जीत इतिहास रचा. भारत को इस खेल में ओलंपिक स्तर पर पदक दिलाने वाली तबाबी का सफ़र किसी आम खिलाड़ी की तरह नहीं रहा. किसी भी खिलाड़ी को सिस्टम का साथ मिले न मिले पर उसका परिवार उनका पूरा साथ देता है. पर तबाबी के केस में ऐसा नहीं है. उन्हें अपने परिवार का भी साथ नहीं मिला. इसलिए वो उनसे छिप कर जूडो की ट्रेनिंग लेती थीं.

भारत ने अभी तक जुनियर और सीनियर लेवल पर जूडो में कोई भी ओलंपिक मेडल नहीं जीता था. 16 साल की तबाबी देवी थांगजाम ने देश का ये सपना पूरा कर दिया है. उन्होंने सेमीफ़ाइनल में क्रोएशिया की Ana Puljiz को 10-0 से हराया था. पर फ़ाइनल में वो वेनेजुएला की Maria Gimenez से हार गईं. इसलिए उन्हें सिल्वर से ही संतोष करना पड़ा.

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माता-पिता नहीं चाहते थे तबाबी एक खिलाड़ी बने

मणिपुर के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाली तबाबी का जूडो ओलंपियन बनने का सफ़र काफ़ी संघर्षपूर्ण रहा. उनके माता-पिता नहीं चाहते थे कि वो एक जूडो खिलाड़ी बने. उनका मानना था कि ये लड़कों का खेल है और उन्हें ये छोड़ अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए. चूंकी पैरेंट्स को उनका ये खेल खेलना पसंद नहीं था, इसलिए वो उनसे छिप कर जूडो की ट्रेनिंग लेती थीं.

बचपन से ही जुझारू थी तबाबी

तबाबी बचपन से ही कभी किसी से हार न वाली लड़की थी. वो लड़कों से अकसर भिड़ जाया करती थीं पर तब छोटी और कमज़ोर होने के कारण, वो उनसे हार जाती थी. इस बात पर ग़ौर करने पर उन्हें पता चला कि उनकी स्ट्रेंथ कमज़ोर है, इसलिए वो बड़े लड़कों से जीत नहीं पाती. इसका तोड़ निकालने के लिए तबाबी ने जूडो की ट्रेनिंग लेने का फ़ैसला किया.

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जूडो ने बदल दी ज़िंदगी

तबाबी ने स्कूल में जूडो की ट्रेनिंग लेना शुरू की, जिसका नतीजा ये रहा कि वो सेल्फ़ डिफ़ेंस करने में माहिर हो गईं. उनका आत्मविश्वास बढ़ गया था. लोग उनकी इज्ज़त करने लगे थे. इसके बाद कोई लड़का भी उनसे पंगा नहीं लेता था. एक तरह से जूडो ने उनकी लाइफ़ ही बदल डाली थी.

मगर अब उनके अंदर राष्ट्रीय स्तर पर मेडल और नाम कमाने की बात घर चुकी थीं. इसमें तबाबी का साथ दिया उनकी कोच Chingkheinganbi Huirem ने. कोच साहिबा ने उनके घरवालों को समझाया कि जूडो सिर्फ़ मर्दों का खेल नहीं है. ये महिलाओं को आत्म रक्षा और आत्म सम्मान से जीना सिखाता है.

मेडल जीतने के बाद मां-बाप ने किया सपोर्ट

पहले तबाबी की फ़ैमिली मानने को तैयार न हुई. मगर जब तबाबी ने नेशल और इंटरनेशनल लेवल पर कई मेडल जीते, तब उन्हें भी तबाबी की ज़िद के आगे हार माननी पड़ी. अब वो आगे बढ़कर तबाबी को सपोर्ट करते हैं.

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तबाबी जैसी कई महिला खिलाड़ी मैदान में और घर पर इस तरह का संघर्ष करती हैं. तबाबी ने ये जंग जीत कर एक बार फिर साबित कर दिया है कि लड़कियां भी किसी से कम नहीं. बस उन्हें मौका देने की देर है. क्या आप उन्हें ये मौका देने के लिए तैयार हैं?

Source: Buenosaires2018.com