सीबीआई कोर्ट द्वारा शुक्रवार को बाबा राम रहीम सिंह को दोषी मानने के साथ ही ऐसी ख़बरें आना शुरू हो गई थी, जो शायद पहले कहीं बाबा के दबदबे के ख़ौफ़ में दबा दी गई थी. इन्हीं ख़बरों में से एक उस पत्रकार की ख़बर भी फिर सुर्ख़ियों में आना शुरू हो गई है, जिसने बाबा की सच्चाई को उजागर करने के कीमत अपनी जान दे कर चुकाई थी.

सिरसा से निकलने वाले सांध्य दैनिक समाचार 'पूरा सच' के संपादक रामचंद्र छत्रपति वो शख़्स थे, जिन्होंने सबसे पहले बाबा द्वारा साध्वी के साथ किये कथित बलात्कार की ख़बर को प्रकाशित किया था. इस ख़बर के प्रकाशित करने के कुछ महीने बाद ही छत्रपति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस ख़बर को छपने से पहले से रामचंद्र के सहयोगी ने उन्हें चेतावनी भी दी थी कि 'सर हमें ऐसी ख़तरनाक ख़बर को नहीं छापना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि कोई आपको एक दिन गोली ही मार दे.' इसका जवाब रामचंद्र ने कुछ ऐसे दिया था कि 'एक सच्चा पत्रकार गोली खा सकता है, पर जूते नहीं और जो पत्रकार जूते खा ले, वो पत्रकार ही नहीं.'

24 अक्टूबर 2002 को डेरा के दो समर्थकों ने रामचंद्र की उस वक़्त गोलियां चलाई, जब जो अपने घर के बाहर थे. उस समय रामचंद्र की पत्नी और उनके तीनों बच्चे घर में थे. मरने से पहले भी रामचंद्र की यही ख़्वाहिश थी डेरा प्रमुख की सच्चाई सबके सामने आये और पीड़ितों को इंसाफ़ मिले. उनकी इस लड़ाई को रामचंद्र के बेटे अंशुल ने आगे बढ़ाया और और लगातार 15 सालों तक लड़ने के बाद आज उनकी लड़ाई सफ़ल होती हुई दिखाई दे रही है.

अपने पिता की तस्वीर के सामने एक कमरे में ‘पूरा सच' की एक कॉपी हाथ में लिए हुए अंशुल कहते हैं कि 'वो एक लॉ ग्रेजुएट थे, पर वक़ालत करते हुए वो कभी खुद संतुष्ट नहीं हुए. इसलिए वक़ालत छोड़ कर उन्होंने पत्रकारिता को अपना पेशा बना लिया था और ‘राष्ट्रीय सहारा' के साथ जुड़ गए.' अंशुल आगे कहते हैं कि उनके पिता ने कई अख़बारों के लिए लेख लिखे, पर वो हमेशा से आज़ाद हो कर लिखना चाहते थे, पर विषय पर अच्छी पकड़ और समझ होने के बावजूद राजनीतिक प्रभाव होने की वजह से उनके लेखन को स्वतंत्रता नहीं मिली, जिसके बाद उनके दिमाग में खुद का अख़बार खोलने का विचार आया, जिसे उन्होंने 'पूरा सच' का नाम दिया. इस नाम का विचार रामचंद्र के दिमाग में डेरा के समर्थकों द्वारा निकाले जा रहे अख़बार 'सच' से आया.

अंशुल कहते हैं कि 'ये अख़बार 2 फरवरी 2002 को शुरू हुआ था और बिना किसी के दवाब में आये लोगों तक ख़बरों को पहुंचाता था. ये बिलकुल ऐसा था, जो मेरे पिताजी हमेशा से करना चाहते थे. अख़बार के पहले एडिशन में ही उन्होंने शपथ ली थी कि वो किसी भी हालात में सच के साथ कभी समझौता नहीं करेंगे.'

इसी अख़बार के ज़रिये उन्होंने पहली बार डेरे में चल रही आपराधिक गतिविधियों को उजागर किया था, जिसके बाद उनके दोस्तों ने उनसे कहा था कि 'वो मुसीबतों को दावत देने का काम कर रहे हैं.' इसके कुछ महीनों बाद ही उन्हें एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें बाबा द्वारा साध्वियों पर किये जा रहे यौन शोषण का पता चला. इस पत्र की सच्चाई जानने के बाबा रामचंद्र ने ख़बर को अख़बार में छापा.

अंशुल का कहना है कि 'सभी ज़रूरी जानकारियां जुटाने के बाद उन्होंने एक रिपोर्ट तैयार की, जिसे उन्होंने अख़बार में छापा. इस ख़बर के आने के बाद हर कोई अचम्भित था कि सिरसा में रहने के बावजूद एक शख़्स बाबा के विपरीत जाने का साहस भी कर सकता है. इस ख़बर के छपने के बाद से ही पिताजी को धमकियां मिलनी शुरू हो गई थीं और आख़िरकार उन पर अक्टूबर में हमला हो गया.'

अंशुल बताते हैं कि 'पिताजी काम से लौट कर घर आये थे कि दो आदमियों ने उन्हें आवाज़ दी और वो घर से बाहर आये. वो जैसे ही घर से निकले उन लोगों ने ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं और भाग गए. उनमें से एक आदमी को पुलिस पोस्ट की तरफ़ भागते हुए पकड़ लिया गया. उसके पास से रिवॉल्वर भी बरामद हो गई, जो एक डेरा समर्थक के नाम पर भी रजिस्टर थी.'

गोली लगने के बाद रामचंद्र 11 दिनों तक पहले सिरसा फिर दिल्ली इलाज के लिए भेजे गए. वो बोलने में असमर्थ थे इसके बावजूद उन्होंने अपना बयान दिया और डेरा समर्थकों का नाम लिया, पर हरियाणा पुलिस ने इस बाबत कोई FIR दर्ज़ नहीं की. अंशुल का कहना है कि 'पुलिस ने उनके बयान से उस हिस्से को हटा दिया, जिसमें उन्होंने डेरा समर्थकों का नाम लिया था.'

11 दिनों तक मौत से लड़ने के बाद आख़िरकार उन्होंने घुटने तक दिए और दिल्ली में 8 नवंबर 2002 को आखिरी सांस ली. इसके बाद कुछ लोगों ने एक सिग्नेचर कैंपेन चलाया कई लोग और NGO सहयोग के लिए आगे आये, जिसके बाद आख़िरकार पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए.

अंशुल कहते हैं कि 'उनकी मां इस सब से काफ़ी डर गई थीं, पर हमने उन्हें समझा लिया. मैं अपने पिता की शहादत को बेकार नहीं जाने दे सकता था. एक दिन हमें इंसाफ़ मिलेगा इस उम्मीद में हम लगातार 15 साल से लड़ रहे हैं.'

अपने पिता की मौत के वक़्त अंशुल 21 साल के थे और पढ़ाई कर रहे थे. उनकी मौत के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और ‘पूरा सच’ की ज़िम्मेदारी अपने सिर ले ली. घाटे के वक़्त भी उनकी कोशिश रही कि अख़बार बंद न हो, पर 2014 में किसी का सहयोग न मिलने की वजह से अख़बार को बंद करना पड़ा. इस बारे में अंशुल का कहना है कि 'कोई हमें विज्ञापन नहीं दे रहा था, ज़्यादातर लोग डरे हुए थे. मैं इस केस के बारे में लगातार छाप रहा था और सम्पादकीय में भी इसके बारे में लोगों को बता रहा था.'

इन 15 वर्षों में अंशुल को भी कई धमकियां मिली. उन पर केस से हटने के लिए कई तरह से दवाब बनाया गया. वो कहते हैं कि 'उन्होंने हमें पैसों की भी पेशकश की, हमारे अख़बार पर गुंडे भेजकर हमले भी करवाए, पर हम पीछे नहीं हटे.'

अब जब फ़ैसला आने वाला है अंशुल फिर से पढ़ने का मन बना रहे हैं. वो कहते हैं कि 'मैं IGNOU से LLB करके वकील बनना चाहता हूं. मैं दो बच्चों का पिता हूं, पर मेरा मानना है कि पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती.'

अंशुल का मानना है कि एक वकील बन कर ही सिस्टम से लड़ कर लोगों को न्याय दिलाया जा सकता है. इस बारे में अंशुल कहते हैं कि 'मैं चाहता हूं कि मैं वकील बन कर अपने पिता के क़दमों कर चलूं, वो हमेशा कहा करते थे कि सच और झूठ के बीच कोई तीसरी चीज़ नहीं होती.’

इस केस की अगली सुनवाई 16 सितम्बर को होनी है. फ़िलहाल आज आये रेप फ़ैसले में बाबा को 10 साल कैद की सजा सुनाई गई है.