आपके अंदर तब तक किसी के प्रति ईर्ष्या की भावना नहीं आ सकती, जब तक आकर आपके कोई कान न भर दे. आज के ज़माने में कान भरने वाले कितने हैं, ये पूछो ही मत. अब तक अगर कान भरने का बेस्ट ख़िताब किसी को जाना चाहिए, तो उसके सबसे पहले हक़दार देवर्षि नारद ही होंगे. सच कहूं दोस्तों, तो नारद भगवान के पास चुगलखोरी की भी कई डिग्रियां थीं. हालांकि, ये बात अलग है कि किसी के लिए वो एक पत्रकार हो सकते हैं, तो किसी के लिए चुगलखोर. दोनों बातें अपनी जगह पर सही भी हैं. पुराणों और शास्त्रों में ऐसे कई मौके देखने को मिले हैं, जिनमें नारद जी का अलग-अलग व्यक्तित्व दिखा है.

एक बार नारद जी कैलाश पर एक आम लेकर पहुंच गये और उन्होंने शिव जी से कहा कि गणेश और कार्तिकेय में जो आपका सबसे योग्य बेटा है, उसे दे दें. इसमें गणेश जी अपनी योग्यता साबित करने में सफ़ल रहे. भगवान शिव ने इसके लिए मूल्यांकन का जो तरीका अपनाया उससे कार्तिकेय खुश नहीं हुए और वो कैलाश छोड़ कर चले गये. हालांकि, गणेश अधिक योग्य हैं, कार्तिकेय भी तब तक ये बात मान रहे थे, जब तक उनका किसी ने ये कान नहीं भर दिया कि उनके माता-पिता उनसे ज़्यादा गणेश को मानते हैं. इसके बाद कार्तिकेय को भी लगने लगा कि गणेश के सामने उनका कोई महत्व नहीं. अब सवाल उठता है कि कान भरने वाला वो शख़्स कौन था?

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अगर आप अब भी नहीं समझ पायें, तो जान लीजिए. वो शख़्स थे देवर्षि नारद, जिन्होंने कार्तिकेय के कान भरे थे और उनके मन में दुर्भावना पैदा की थी. हालांकि, नारद जी को पत्रकारिता का पिता और संसार का पहला पत्रकार माना जाता है. इसमें कोई दो राय नहीं कि वे पहले पत्रकार थे. मगर दोस्तों आज हम इनकी पत्रकारिता की बात न कर, इनकी चुगलखोरी की बात करेंगे. आम बोल-चाल में हम सभी कह देते हैं कि नारद जी की तरह चुगलखोरी मत करो. मतलब साफ़ है कि हम लोगों के मन में नारद जी की एक छवि चुगलखोर के रूप में भी रच-बस गई है.

दोस्तों याद रहे, आज के पत्रकारों से भी बड़े वाले पत्रकार थे देवर्षि नारद मुनि. हमारे पत्रकारों की नज़रों से तो ख़बरें और गॉसिप छूट भी जाती हैं, मगर क्या मजाल कि नारद मुनि की नज़रों से दुनिया का कोई भी घटनाक्रम छूट जाए. यूं कहें कि वो तो अकसर सास, बहू और साजिश के चक्कर में ही अपनी पत्रकारिता किये फिरते थे.

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अगर आप अब भी नारद मुनि को चुगलखोर मानने से कतरा रहे हैं, तो सच में आप महान हैं या फिर आप इनके बारे में कुछ गलत सुनना ही नहीं चाह रहे हैं. वैसे मैं भी आपको बता दूं कि इनके बारे में हम कुछ गलत नहीं लिख रहे हैं, बल्कि पुराणों में इनका कैरेक्टर जिस तरह का था, हम बस उसे ही आपके समाने रख रहे हैं.

इसलिए अगर आप देवर्षि नारद को पत्रकार न भी मानें, तो आप अपनी भाषा में इन्हें चुगलखोर कह सकते हैं. पौराणिक कथाओं पर एक बार नज़र दौड़ाने पर ऐसे कई वाकये सामने आते हैं, जहां नारद भगवान पत्रकारिता कम और चुगलखोरी करते ज़्यादा नज़र आए हैं. भगवान की योजनाओं को राक्षसों तक और राक्षसों की योजनाओं को देवताओं तक पहुंचाने में इन्हें जैसे महारथ हासिल था. इन्होंने ऐसा विश्वास बना लिया था कि दानव भी बेहिचक इन्हें अपनी सारी रणनीति बता दिया करते थे.

अगर आप अब भी मुझे खरी-खोटी सुनाने के मूड में हैं, तो ज़रा एक नज़र इधर भी दौड़ाइये. नारद जी की चुगलखोरी के कई उदाहरण हम सबके सामने हैं. जब कृष्ण भगवान का जन्म हुआ, तब भी नारद जी ने जाकर कंस से चुगलखोरी की थी और भगवान कृष्ण के जन्म वाली बात बता दी थी. उसी तरह जब मां सीता का स्वंयवर हो रहा था, तो नारद जी ने इस स्वंयवर में शामिल होने के लिए रावण के कान भरे थे. हालांकि, ये बात भी सच है कि इनकी ही चुगलखोरी के कारण कई असुरों का संहार हो पाया और संसार को राक्षसी प्रकोप से बचाया गया.

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सच कहूं, तो इधर की बात उधर करने में आज के पत्रकार भी देवर्षि नारद से मात खा जाएं. वैसे जनाब ये भी एक कला ही है, जो हमारी-आपकी बस की बात कहां. ये पत्रकारिता कम और पब्लिक रिलेशन ज़्यादा करते थे. मगर मज़े की बात ये है कि ये दोनों पक्षों का पीआर करते थे. देव हों या दानव, ये तो भइया दोनों के प्रिय थे. जब भी संकट की घड़ी सामने होती थी, देवर्षि नारद मध्यम मार्ग अपना लेते थे. देवता और दानव लड़ते थे और ये महानुभाव आराम से बैठकर दोनों की लड़ाइयां देखते और मज़े लेते थे. इनकी आकाशवाणी भी कम फेमस नहीं थी.

नारद जी धमाका या फिर बम फ़ोड़ने के लिए जाने जाते थे. देवियों के बीच भी उन्होंने कम चुगलखोरी नहीं की. देवियों के बीच तो ये ऐसे धमाके किया करते थे कि पूछिये ही मत. बावजूद इन सबके ये उस समय के सबसे बेहतर और इकलौते संवदिया थे. इनकी इस कला का सम्मान देव से लेकर दानव तक किया करते थे.

पुराणों और शास्त्रों में देवर्षि नारद का जो कैरेक्टर है, उसे समझ पाना सीधी उंगली से घी निकालने के समान है. इनकी पत्रकारिता से स्वर्ग के राजा इंद्र भी परेशान हो जाया करते थे. वजह थी इनकी चुगलखोरी. ये इंद्र के दरबार की सारी बातें, राक्षसों को बता देते थे. हालांकि, जब भी राक्षसों की रणनीति जानने की बात होती, तो उस वक़्त देवतागण नारद जी को ही याद करते थे. इस लिहाज़ से कहा जाए, तो नारद जी हर तरह से अपनी पत्रकारिता में एक संतुलन बना कर रखा करते थे.

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