अालिया भट्ट की अपकमिंग मूवी राज़ी का ट्रेलर रिलीज़ हो चुका है. इस फ़िल्म की कहानी हरिंदर सिक्का के नॉवेल 'कॉलिंग सहमत' पर आधारित है. ये नॉवेल एक कश्मीरी लड़की की असल कहानी पर आधारित है. नॉवेल में इस लड़की का नाम सहमत खान है. अब आप सोचेंगे ये सहमत कौन है, वो इतनी महत्वपूर्ण क्यों है, क्यों उसकी कहानी पर फ़िल्म बनाई जा रही है? इस तरह के कई सवाल हैं जिनका जवाब किसी को नहीं मालूम. चलिये आज हम आपका परिचय कराते हैं सिक्का जी की असली सहमत से.

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दुनियाभर के देश अपने दुश्मन देशों की जासूसी कराते रहते हैं, भारत और पाकिस्तान भी. हरिदंर सिक्का की नॉवेल 'कॉलिंग सहमत' की लीड किरदार सहमत खान भी ऐसी ही एक जासूस है. इसकी ख़ासियत ये है कि ये कोई काल्पनिक किरदार नहीं, बल्कि एक रियल लाइफ़ स्टोरी है, जिसकी पहचान गोपनीय रखी गई है. इस महिला जासूस ने पाकिस्तान में दुश्मनों के बीच रहते हुए भारत को बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारियां उपलब्ध कराई थीं. साथ ही वो उन चंद सीक्रेट एजेंट में से एक है, जो पाकिस्तान में जासूसी करने बाद भी भारत लौट पाई थीं. इस बात का ज़िक्र सिक्का ने 'द हिंदू' को दिये अपने इंटरव्यू में किया था.

दरअसल, 1971 में हुए इंडिया-पाकिस्तान के युद्ध से पहले आर्मी को एक ऐसे जासूस की ज़रूरत पड़ गई थी, जो पाकिस्तान में रह कर उनकी हर हरकत पर नज़र रख सके. इसके लिए एक कश्मीरी बिज़नेसमैन अपनी बेटी सहमत को मनाने में कामयाब हो जाते हैं.

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मगर सहमत खान ने कभी जासूसी करने के बारे में सोचा भी नहीं था. वो तो कश्मीर की एक युवा लड़की थी. जिस समय वो कॉलेज की पढ़ाई कर रही थी उसी दौरान उनके पिता उसे जासूस बनने के लिये कहते हैं. उसे तो जासूसी का 'ज' तक भी नहीं मालूम था. वो फिर भी अपने पिता और देश की ख़ातिर ये करने को तैयार हो जाती है.

इसके बाद जो सबसे दिलेरी का काम सहमत ने अपनी लाइफ़ में किया, वो ये कि अपने वतन की ख़ातिर पाकिस्तानी आर्मी ऑफ़िसर से शादी करना. वो उससे निक़ाह करती हैं और फिर वहीं से ख़ुफिया तरीके से भारतीय आर्मी को पाकिस्तानी सेना की बहुत सी गोपनीय और अहम जानकारियां देती हैं.

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उन्हीं की वजह से बहुत सी ज़िन्दगियां बचाई जा सकी थीं. सहमत ने पहले एक बेटी, फिर एक पत्नी और इन सबसे ऊपर उठते हुए एक जासूस का किरदार रियल लाइफ़ में बहुत ही उम्दा तरीके से निभाया. जब वो पाकिस्तान से वापस आईं, तो वो प्रग्नेंट थीं. उन्होंने एक लड़के को जन्म दिया जो आगे चलकर अपनी मां के जैसे ही इंडियन आर्मी ज्वाइन कर देश की सेवा करता है.

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इस नॉवेल को लिखने की प्रेरणा हरिदंर सिक्का को तब मिली जब वो कारगिल युद्ध के बारे में रिसर्च करने के दौरान सहमत के बेटे से मिले थे. उनके बेटे ने ही अपनी मां की देशभक्ति की नायाब मिसाल से रू-ब-रु उनको कराया था. इसके बाद सिक्का सहमत से मिलने पंजाब के मलेरकोटला पहुंचे, जहां वो रहती थीं. उन्हें देखकर ख़ुद नेवी ऑफ़िसर रह चुके सिक्का भी ये यक़ीन नहीं कर पाए कि वो जासूसी कर सकती हैं.

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शायद यही वजह है कि पाकिस्तानियों को भी इसकी भनक न लग सकी कि जो औरत पाकिस्तान के जनरल याह्या खान के पोते-पोतियों टीचर है, जो एक पाकिस्तानी आर्मी ऑफ़िसर की पत्नी है, वो दरअसल, एक हिंदुस्तानी जासूस है. सहमत न सिर्फ़ एक बेहतरीन जासूस हैं, बल्कि उनकी कहानी बताती है कश्मीरियों को भी हिंदुस्तान से उतना ही प्यार है, जितना बाकी देशवासियों को. सहमत की कहानी भी उन तमाम भारतीय गुमनाम देशभक्तों की तरह खो गई होती, अगर हरिंदर सिक्का इस पर नॉवेल न लिखते. हरिंदर सिक्का को सहमत की असल ज़िंदगी को नॉवेल में ढालने में करीब 8 साल लग गए.

सहमत बहादुरी, देशभक्ति और त्याग की मिसाल थीं, कहना ग़लत न होगा.

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