बिहार एक अघोषित महामारी के चंगुल में जकड़ा जा चुका है.

बिहार का महावीर कैंसर संस्थान आजकल कैंसर अस्पताल न होकर सामान्य अस्पताल हो गया है. यहां हर रोज़ करीब 60 से 100 मरीज़ इलाज के लिए पहुंच रहे हैं. महज़ 400 बेड वाले इस अस्पताल में हालात इतने खराब हैं कि लोगों को सर्जरी के लिए दो-दो महीनों तक का इंतजार करना पड़ रहा है.

इस अस्पताल में आने वाली लोगों की भीड़ दरअसल बिहार के स्वास्थ्य की एक भयानक तस्वीर पेश करती है. यहां पिछले एक साल में बिहार, यूपी और नेपाल जैसे क्षेत्रों से 22,000 लोग कैंसर के इलाज के लिए आ चुके हैं. यहां आने वाले कई मरीज़ पित्ताशय और लिवर के कैंसर से जूझ रहे हैं. ये दोनों ही कैंसर आर्सेनिक प्रदूषण से जुड़े हुए हैं.

बिहार में Mass Cancer का मुख्य कारण यहां के भू-जल में आर्सेनिक की बढ़ती मात्रा का होना है.

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1970 के दशक से पहले तक बिहार में किसी ने पानी में आर्सेनिक के बारे में सुना तक नहीं था. कुएं द्वारा पानी से लोगों का काम चल जाता था. लेकिन नदियों के पानी में बढ़ते बैक्टीरिया की मौजूदगी की वजह से अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थाओं ने बोरवेल से ग्राउंड वाटर तरीके की पैरवी की थी. आज भू-जल के लिए कई फ़ीट खुदाई होती है और कई हैंडपंप्स लोगों को बीमार बना रहे हैं. इस फ़ैसले के कई परिणाम लोगों को भुगतने पड़े हैं.

बिहार के बक्सर जिले में तिलक राय का हट्टा नाम से एक गांव है. इस गांव में 5348 लोग रहते हैं. 2011 की जनगणना के अनुसार, इस गांव के ग्राउंड वाटर में आर्सेनिक की मात्रा काफ़ी ज़्यादा है. इस गांव पर हुई रिसर्च में सामने आया कि यहां के 80 प्रतिशत हैंडपंप्स में आर्सेनिक की लिमिट सुरक्षित स्तर से कहीं अधिक थी. गांव के प्राइमरी और मिडिल स्कूलों के हेडपंप्स में 100 पीपीबी आर्सेनिक पानी आता है. इस पानी को पीकर, स्कूल के बच्चों के हाथों में काफ़ी सख्त धब्बे हो गए हैं जिन्हें Hyperkeratosis कहा जाता है. आर्सेनिक की अधिक मात्रा की वजह से ही ये धब्बे होते हैं.

Arsenopyrite 60 फ़ीट से लेकर 200 फ़ीट तक सुरक्षित हो सकता है, बशर्ते वो हवा के संपर्क में न आए. ग्राउंड वाटर सुरक्षित मात्रा से नीचे जाते ही ये अंडरग्राउंड arsenopyrite हवा के संपर्क में आ जाता है, जिससे वो आयोनिक फ़ॉर्म में बदल जाता है. इसके बाद ये arsenopyrite, आर्सेनिक बनकर आसानी से पानी में चला जाता है. इस पानी का इस्तेमाल जानवरों से लेकर मनुष्य भी करते हैं.

पिछले 15 सालों में बिहार की फ़ील्ड स्टडी करने के बाद सामने आया है कि यहां आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर को पार कर गई है. कई जगहों पर तो ये मात्रा बेहद खतरनाक 3880 पार्ट्स प्रति बिलियन (पीपीबी) पाई गई.

प्रशासन बना हुआ है आर्सेनिक को लेकर लापरवाह

Environmental & Analytical Toxicology में छपे एक रिसर्च पेपर के अनुसार राज्य में करीब पचास लाख लोग ऐसा पानी पी रहे हैं जिसमें आर्सेनिक की मात्रा 10 पार्ट्स प्रति बिलियन से अधिक है. हालांकि बिहार के पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के आंकड़ें कुछ और कहानी कहते हैं. इन आंकड़ों के अनुसार केवल 13 जिले और 50 ब्लॉक्स ही इस समस्या से प्रभावित हैं. इन आंकड़ों को रिसर्चर्स ने चुनौती दी है.

2002 तक पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट भूजल में आर्सेनिक की मात्रा को चेक करना भी ज़रुरी नहीं समझता था. इस डिपार्टमेंट की नींद भी तब टूटी थी जब भोजपुर जिले के एक शख़्स, कुंतेश्वर ओझा ने अपने घर की ट्यूबवेल चेक कराई थी. इस शख़्स की पत्नी और मां की लिवर कैंसर की वजह से मौत हो गई थी. कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी ने इस पानी की जांच की थी. रिपोर्ट में सामने आया था कि कुतेंशवर के घर में आर्सनिक की मात्रा 50 पीपीबी से भी ज़्यादा थी.

आर्सेनिक प्रदूषण विशेषज्ञ अशोक घोष इसे लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ मानते हैं. उन्होंने कहा कि सच्चाई यही है कि आर्सेनिक की 10 पीपीबी लिमिट क्रॉस करने का मतलब है कि प्रशासन लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन 10 पीपीबी आर्सेनिक लिमिट फॉलो करता है. ऑस्ट्रेलिया में 7 पीपीबी फॉलो की जाती है. अगर बिहार में 10 पीपीबी का सख़्ती से पालन होने लगे तो बिहार के कई हज़ार पंपों को सील करना पड़ेगा क्योंकि ये पंप लोगों को पानी नहीं बल्कि कैंसर दे रहे हैं.

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