ज़िंदगी के बारे में एक दिलचस्प तथ्य यही है कि मौत ही अंतिम सत्य है. भारत से लेकर सुडान तक हर इंसान, इस तथ्य को जानता भी है और मानता भी हैं. फिर भी कई लोगों के लिए किसी अपने का साथ छूटने का ख़्याल भर ही सिहरन पैदा कर देता है. कितने ही लोग ऐसे हैं, जिनके लिए अपने चाहने वालों की मौत दुनिया की सबसे पीड़ादायक फीलिंग होती है और कई तो सालों-साल इन सदमों से उबर नहीं पाते.

लोगों को ऐसी अनचाही पीड़ा के लिए तैयार करने के लिए हाल ही में Quora पर एक बेहद संवेदनशील सवाल पूछा गया. ये सवाल था - लाइफ़ में ज़्यादा तकलीफ़देह क्या है? अपने बच्चे की मौत या अभिभावक की?

ज़ाहिर है इस सवाल का जवाब देना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन लिरिन चाको नाम के एक शख़्स ने जब इस सवाल पर अपनी आपबीती बयां की, तो कई लोग इसे पढ़कर अपने आंसू नहीं थाम पाए.

लिरिन को अपनी 31 माह की बच्ची को दफ़नाना पड़ा था. 32 साल के लिरिन ने बताया कि अपने बच्चे का अंतिम संस्कार करना दुनिया की सबसे भयानक फीलिंग है और मैं नहीं चाहता कि मेरे दुश्मन भी इस दर्द से गुज़रें. उन्होंने कहा कि मैंने और मेरी पत्नी ने कभी अपनी फ़ैमिली में किसी की मौत नहीं देखी थी. हम कभी शमशान घाट तक नहीं गए थे.

शादी के कुछ समय बाद हमारे घर एक प्यारी-सी बच्ची का जन्म हुआ, जिसका नाम जॉर्डन रखा गया. जॉर्डन जब 31 महीनों की थी, तभी हम तीनों का भयंकर एक्सीडेंट हुआ. मेरी बेटी 6 दिन कोमा में रही और फिर उसकी मौत हो गई. मेरी पत्नी को सिर में 11 फ्रैक्चर्स आए और उसका चेहरा पूरी तरह से विकृत हो चुका था.

मुझे आज भी वो क्षण याद है जब मैं अपनी 31 माह की बच्ची को दफ़नाने जा रहा था. मैं और मेरी पत्नी, दोनों ही चोटिल थे और ठीक से रो तक नहीं पा रहे थे.

हम जॉर्डन से बेहद प्यार करते थे और उसकी मौत ने हमारी ज़िंदगी पलट दी. जब उसे दफ़नाया जा रहा था, तो हम चुप थे. मैं बेहद खाली महसूस कर रहा था. हम दोनों खामोश थे, लेकिन मुझे एहसास हुआ कि मुझे अब अपनी पत्नी का पहले से भी ज़्यादा ख्याल रखना है.

लेकिन जॉर्डन की मौत के काफ़ी समय बाद भी हमारी ज़िंदगी सूनी और खालीपन से भरी हुई थी. हम हर महीने उसकी कब्र पर जाते, उससे घंटों बातें करते.हम घर पर केवल फ़िल्में और टीवी शो ही देखते थे और हमने लोगों से मिलना-जुलना भी छोड़ दिया था.

अब हमें मौत से डर लगना बंद हो चुका था. हम अपनी बच्ची को बेहद मिस कर रहे थे. हमारे आसपास लोग कहते कि आप भाग्यशाली हैं कि इस भयानक एक्सीडेंट के बाद भी आपकी जान बच गई. इस एक्सीडेंट में हमारे ड्राइवर की दोनों टांगे चली गई थी. लेकिन मन ही मन हमें लगता कि बेहतर होता कि अगर हम भी अपनी जॉर्डन के पास ही चले जाते.

अपनी बच्ची की याद में हम कई रातें रोये. हम दुआ करते कि नींद में ही हमारी मौत हो जाए. लेकिन हमारे परिवार वालों को इसकी ज़रा भी भनक नहीं थी. हम लोगों ने कभी उनके सामने रोते हुए दुख ज़ाहिर नहीं किया.

हमें तब एहसास हुआ कि ज़िंदगी एक दूरगामी झूठ है, जबकि मौत एक निश्चित सत्य.

वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है. लंबी मुश्किलों के बाद हम ज़िंदगी में आगे बढ़ पाए और हमारी ज़िंदगी में एक बार फिर एक छोटी बच्ची आई. हमने अपनी बच्ची का नाम इस बार Jadyn रखा.समय के साथ-साथ हमारा दुख थोड़ा कम हुआ. हम दोनों ही अपने-अपने काम मे तरक्की कर रहे थे. मेरी पत्नी नर्सिंग स्टूडेंट्स को पढ़ाती थी, वहीं मैं अपना खुद का बिज़नेस संभाल रहा था.

लेकिन आज भी कहीं न कहीं सच्चाई हमारा पीछा नहीं छोड़ती और सच ये है कि हम अपनी जॉर्डन को बेहद प्यार करते थे और उसे आज भी मिस करते हैं. लगभग रोज़ ही उसके बारे में कोई न कोई बात हो ही जाती है. लेकिन अब उसका नाम आने पर हम उदास नहीं होते, बल्कि मुस्कुराते हैं.

हम Jadyn को पाकर बेहद खुश हैं. सबसे ज़रूरी बात है कि मेरी पत्नी एक बार फिर से मां बन पायी. लेकिन मैं प्रार्थना करता हूं कि किसी भी माता पिता को कभी अपने छोटे बच्चे की मौत न देखनी पड़े. ये दुनिया के सबसे दर्द भरे अनुभवों में से एक है. इस दर्द से निकल पाने में लोगों को सालों लग सकते हैं. बेहतरीन आर्थिक, सामाजिक सुविधाएं होने और एक बच्ची के मां-बाप होने के बावजूद, हम आज भी जॉर्डन की मौत से नहीं उबर पाएं हैं. हम अपनी बच्ची को हमेशा मिस करेंगे.

और अंत में एक लाइन में अगर जवाब दूं तो,

जब एक अभिभावक की मौत होती है, तो बच्चे को अपने नश्वर होने का एहसास होता है. वहीं जब एक बच्चा मरता है, तो अभिभावक अपना अमरत्व खो देते हैं.

Source: Quora