14 नवंबर. यानि बच्चों का दिन. और बच्चों का दिन भला शरारत के बिना कैसे पूरा हो सकता है? बचपन में भले कोई कुछ करे या न करे, लेकिन किसी न किसी शरारत के हिस्सेदार ज़रूर होते हैं. तो आइए जानते हैं बाल दिवस के दिन शरारत के कुछ ऐसे किस्सों को, जिन्हें जानकर आप भी अपने पुराने दिनों की याद में डूब जाएंगे.

1. ये कक्षा नौवीं की बात है. मेरे साथ बैठने वाली लड़की मुझे बहुत इरिटेट करती थी. हम दोनों में दोस्ती तो थी, लेकिन उसकी कुछ हरकतें मुझे पसंद नहीं आती थीं. ख़ासकर जब वो पूछती, 'मेरे बाल ठीक लग रहे हैं.', 'वो लड़का मुझे देख रहा है क्या?'. मैंने क्लास टीचर से कहा भी कि मेरी सीट बदल दें क्योंकि मेरे साथ बैठने वाली लड़की मुझे बहुत इरिटेट करती है. पर उन्होंने कहा कि जिसको जहां सीट दी है, उसे वहीं बैठना होगा. मैंने उस लड़की को सबक सिखाने के लिए पूरी प्लानिंग की और उस लड़की के टिफ़िन में कॉकरोच रख दिया. अपने टिफ़िन में कॉकरोच देखकर वो ज़ोर से चिल्लाई थी और बात क्लासटीचर तक भी पहुंची थी, लेकिन मैं लकी ही थी कि मुझ पर कोई एक्शन नहीं लिया गया था. हां इस घटना के बाद मेरे साथ बैठने वाली लड़की ज़रूर सुधर गई थी.

- संचिता

2. ये ग्याहरवीं की बात है. क्लास के लड़के मुझे एक निकनेम से चिढ़ाते थे. मुझे इससे काफ़ी चिढ़ थी. सबसे अजीब बात थी कि लड़के तो लड़के, लड़कियां भी इसमें शामिल थी. जब बर्दाशत नहीं हुआ तो मौका देखकर एक दिन मैंने अपने सभी क्लासमेट्स को क्लास के अंदर बंद कर दिया और लगभग 15-20 मिनट बाद दरवाज़ा खोला था. उसके बाद कोई मुझे नहीं चिढ़ाता था. शायद सब डरने लगे थे.

- आकांक्षा

3. स्कूल की छत पर काले रंग की पानी की टंकी हुआ करती थी. मैं उस समय नौवीं क्लास में था. मेरी क्लास में एक लड़का कई बच्चों को परेशान करता था. उसकी हाइट क्लास के बाकी बच्चों से ज़्यादा थी तो वो खाली-पीली लोगों से अकड़ता रहता और चौड़ा होता रहता था. एक दिन हम लोग छत पर तफ़री कर रहे थे तो वो लड़का वहां पहुंच गया और पानी की टंकी पर बैठने की कोशिश करने लगा. हम लोगों ने ये देखा और उसे धक्का देकर टंकी के अंदर डाल दिया और ऊपर से ढक्कन बंद कर दिया. वह अंदर चिल्लाता रहा तो हमने थोड़ी देर बाद ही ढक्कन खोल दिया. उस दिन के बाद से उसने हमें बुली करना छोड़ दिया.

- अभिजीत

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4. बात तब की है जब मैं छठी क्लास में थी. मेरी इंग्लिश मैम मेरी बहुत पिटाई करती थी क्योंकि मैं होमवर्क नहीं करती थी. मेरी सहेलियों ने सलाह दी कि अब जब भी मैम तुझे पीटने के लिए आए तो तू बेहोश हो जाना. मैंने ऐसा ही किया. मैम ने जैसे ही एक दो थप्पड़ जमाए, मैं वहीं ढेर हो गई. क्लास में शोर मच गया. मेरे पापा को जब पता चला तो उन्होंने स्कूल में हंगामा कर दिया. प्रिसिंपल ने भी उस टीचर को बहुत डांटा. हालांकि, आज जब सोचती हूं तो लगता है कि कम से कम मुझे मैम को तो सच्चाई बतानी चाहिए थी.

- कोमल

5. नौवीं क्लास में क्रिकेट का तगड़ा कीड़ा लगा था. क्लास बंक करके ग्राउंड में जाते थे और 10-10 रुपये के तीन-तीन ओवर वाले मैच होते थे. अक्सर मैं और मेरा एक साथी ही बंक पर जाया करते थे, ऐसे में एक टीम में 2-2 खिलाड़ी ही होते. मुझे याद है दसवीं क्लास में एक लड़का, ऑफ़ साइड में प्वाइंट के ऊपर से ज़बरदस्त छक्के मारता था. रन केवल ऑफ़ साइड और स्ट्रेट के ही होते थे. हम अक्सर मैच हार जाते क्योंकि उस बैट्समैन को कितनी ही तेज़ गेंद फ़ेंको, वो हमेशा रूम निकालकर बला की तेजी से बल्ला घुमाता और ज़्यादातर समय बॉल प्वाइंट के ऊपर से लहरा जाती.

उस दौर में ऑस्ट्रेलिया का तेज़ गेंदबाज़ माइकल कास्प्रोविच अपनी ऑफ़ कटर के लिए मशहूर था. तेज़ गेंदबाज़ होने के बावजूद माइकल की बॉल एक ऑफ़ स्पिनर की तरह घूमती और लेग स्टंप ले उड़ती. कुछ कोशिशों के बाद मैं भी कॉस्को की बॉल से ऑफ़ कटर फ़ेंकने लगा. अगली बार जब मैच हुआ तो हर बार की तरह उसने इस बार भी ऑफ़ साइड में तेजी से बल्ला घुमाया. बॉल ऑफ़ स्टंप के बाहर पिच हुई और सीधा उसके संवेदनशील अंग से जा टकराई. वो प्लेयर वहीं लेट गया. थोड़ी देर बाद जब वो उठा तो बैटिंग में कंफ़र्टेबल नहीं था और उसकी कमज़ोरी जाहिर होने के बाद हम कई मैच जीतने लगे थे. 10वीं के उस ऑफ़ साइड के प्लेयर की बादशाहत को ऑस्ट्रेलिया के माइकल के एक अस्त्र ने पूरी तरह से पस्त कर दिया था.

-विशाल

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