जिस उम्र में लोग आराम और सुकून से जीना चाहते हैं, उस उम्र में वेंकट और विजया निःस्वार्थ भाव से गरीबों की मदद कर रहे हैं. 10 साल पहले ये पति-पत्नी मस्कट की अपनी ऐशो-आराम की ज़िन्दगी छोड़कर भारत लौट आये थे. इसके बाद दोनों ने फै़सला किया कि बाकी ज़िन्दगी ग़रीबों की सेवा के लिए समर्पित कर देंगे. लेकिन दोनों को इस तरह के काम का तजुर्बा नहीं था, इसलिए उन्होंने एक एनजीओ के साथ Volunteering का काम शुरू किया. 1 साल में ही इन लोगों ने ग़रीब महिलाओं और उनके बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया.

सिंगल मदर और उनके बच्चों की ज़िन्दगी संवारने का किया काम

अय्यर दम्पति ने देखा कि पूरे बेंगलुरु में महिलाओं और बच्चों के लिए कई अनाथालय व आश्रालय तो हैं, लेकिन उन अकेली माताओं और उनके बच्चों के लिए कोई ऐसी सुविधा नहीं है, जिनको उनके पति या पिता ने घर से निकाल दिया है. इन अनाथालयों ने ऐसे बच्चों को रखने से भी मना कर दिया था, जिनके माता-पिता ज़िंदा थे. Volunteering के दौरान अय्यर दम्पति ने कम उम्र की कई ऐसी महिलाओं को देखा, जिनको उनके पतियों ने छोटे बच्चों सहित घर से निकाल दिया था. ऐसे में उनके पास सड़क पर रात गुज़ारने के सिवा और कोई चारा नहीं था. भूख मिटाने के लिए ये महिलाएं कुछ ऐसे काम करने लगी थीं, जिस कारण इनको अपने छोटे-छोटे बच्चों को आस-पड़ोस में किसी परिचित के घर पर छोड़कर जाना पड़ता था. इन हालातों में इनके बच्चे सुरक्षित नहीं थे.

3 से 5 साल की 15 बच्चियों को दी नई ज़िन्दगी

इन्हीं सब समस्याओं को देखते हुए साल 2007 में वेंकट और विजया ने स्वाभिमान एनजीओ की नींव रखी, जहां ऐसी ही महिलाओं और उनके बच्चों को मदद मिल सके, जो इस तरह की समस्या से परेशान हैं. इस दौरान वेंकट और विजया ने सबसे पहले झुग्गियों में रहने वाली 3 से 5 साल की 15 बच्चियों को अपने एनजीओ के साथ जोड़ने का काम किया, जो अपनी मां के साथ रहती थीं. एनजीओ में आने के बाद ये सभी बच्चियां अच्छे स्कूल में पढ़ने लगीं, उनको अच्छा खाने और पहनने को मिला. इन बच्चों की मां को इनसे मिलने दिया जाता था और छुट्टियों के समय अपने बच्चों को ये लोग अपने घर भी ले जाते थे.

वेंकट और विजया ने इन 15 बच्चियों की ही नहीं, बल्कि झुग्गियों में रहने वाले अन्य ज़रूरतमंद बच्चों की मदद भी की, जो पढ़ना चाहते थे. जो बच्चे पढ़ाई में अच्छे थे उनको Scholarships भी दी गयीं. वेंकट और विजया का पहला मकसद था बेंगलुरु के राजेंद्र नगर की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले बच्चों को समाज की मुख्य धारा से जोड़ना. आज राजेंद्र नगर की सड़कों पर कई ऐसे लोग मिल जाएंगे जो बताएंगे कि किस तरह से वेंकट और विजया ने उनकी मदद की.

छोटे-छोटे व्यवसाय खोलने के लिए महिलाओं को दी वित्तीय मदद

वेंकट और विजया उन महिलाओं को वित्तीय मदद भी देते हैं, जो छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं. इन दोनों ने कपड़े के बैग बनाने वाली एक छोटी सी यूनिट भी खोली है, यहां पर 30 से ज़्यादा महिलाएं काम करती हैं. साथ ही यहां एक पैकेजिंग यूनिट भी है, जिससे कई महिलाओं को रोज़गार मिला है. यहां कई ऐसे लोग भी हैं जो अकुशल, रोज़गार पाने में असमर्थ थे फिर भी वो यहां काम करके अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं. स्वाभिमान संस्था में Volunteering का काम करने वाले सभी लोग झुग्गी बस्तियों में रहने वाले हैं. यहां हर शाम सभी को मुफ़्त भोजन दिया जाता है, जबकि महीने में एक बार मुफ़्त किराने का सामान भी मिलता है. आज स्वास्थ्य, शिक्षा, खाने-पीने से लेकर रोज़गार तक की सारी सुविधायें इन लोगों को दी जा रही हैं.

साहिदा यहां की सबसे अच्छे बैग सिलने वाली टेलर हैं

झुग्गियों में रहने वाले लोगों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत है उनका अस्वस्थ रहना. अगर घर का एकलौता कमाने वाला बीमार पड़ जाए तो घर का ख़र्चा चलाना मुश्किल हो जाता है. गंभीर बीमारी हो जाने पर इनके पास इतना पैसा नहीं होता है कि ये इलाज़ करा सकें. ऐसे में इस दम्पति ने एक क्लिनिक भी खोला है. यहां हर दिन करीब 100 झुग्गी वाले लोग फ़्री में इलाज पाते हैं, तकरीबन 500 गरीब लोगों को हर दिन शाम का खाना खिलाते हैं. 3 सॉफ्टवेयर कंपनियां ऐसी भी हैं जो बचे हुए खाने को स्वाभिमान एनजीओ को दे देती हैं. ये दम्पति आज इन झुग्गी वालों की आवाज़ बन चुके हैं.

वेंकट कहते हैं, 'अभी बहुत कुछ करना है. मैं कभी-कभी निराश हो जाता हूं, लेकिन हर सुबह एक नई ऊर्जा के साथ उठता हूं कि अभी और भी करना है.

वेंकट और विजया जब भी इन झुग्गी बस्तियों में जाते हैं, हर तरफ़ से सलाम और नमस्ते की आवाज़ें सुनाई देती हैं.

Source: thebetterindia