'अपने लिए जिये तो क्या जिए, तू जी ए दिल ज़माने के लिए'. 1966 में आई फिल्म बादल का ये मशहूर गाना अपनी दार्शनिकता की वजह से भी जाना जाता है और देश में ऐसे कई महान लोग मौजूद हैं जो बाहरी दुनिया की चकाचौंध से दूर, इस गाने के बोल को अपनी जिंदगी में ढालकर एक बार फिर इसे प्रासंगिक करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं.

डॉ प्रकाश आम्टे और उनकी पत्नी डॉ मंदाकिनी आम्टे भी उन्ही चंद महान लोगों की श्रेणी में आते हैं. ये दंपति साधारण लोगों से अलग हैं. उनके रहने का तरीका भी बाकी लोगों से काफी अलग है. दरअसल, इस कपल ने अपने आंगन में ही कई ऐसे जंगली जानवरों को पनाह दे रखी थी, जिन्हें देख किसी भी सामान्य इंसान की हालत खराब हो जाए.

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जंगल बुक की तर्ज पर ही यहां इस परिवार के बच्चों ने जंगली जानवरों के बीच अपनी जिंदगी बिताई और पिछले कई दशकों से डॉ प्रकाश और उनकी पत्नी मंदाकिनी ने हेमलखासा के पर्यावरण, जानवरों और आदिवासी लोगों की ज़िंदगियां बेहतर बनाने के लिए कई प्रयास किए हैं.

70 के दशक की एक शाम मिस्टर और मिसेज़ आम्टे महाराष्ट्र के जंगलों में चहलकदमी कर रहे थे कि तभी उन्होंने एक आदिवासी लोगों के समूह को एक मरे हुए बंदर के साथ देखा. ध्यान से देखने पर डॉ दंपति ने पाया कि बंदर का बच्चा अपनी मां से चिपका हुआ था और दूध पीने की कोशिश कर रहा था. ये दृश्य देख डॉ आम्टे का दिल भर आया.

उन्होंने आदिवासियों को रोक कर पूछा था कि वे इस मरे हुए बंदर का क्या करने वाले हैं. जाहिर है, इस दुर्लभ जगह पर आदिवासी अपना खाना ही जुटा रहे थे. डॉ ने जब बंदर के बच्चे के बारे में पूछा तो आदिवासियों का जवाब था कि वे उसे भी खा लेंगे.

इन आदिवासियों के साथ हुई इस बातचीत ने आम्टे परिवार की जिंदगी को पूरी तरह से बदल कर रख दिया था.

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मादिया गोंड आदिवासी समुदाय के लिए शिकार करना कोई शौक नहीं था, बल्कि शिकार के द्वारा ही वे किसी तरह अपना पेट भर पाते थे. डॉ प्रकाश ने आदिवासियों से दर्ख्वास्त की कि बंदर के बच्चे को छोड़ दिया जाए, बदले में वे कपड़े और चावल ले सकते हैं. थोड़ी देर चली ना-नुकुर के बाद आदिवासियों ने डॉक्टर की बात मान ली.

हैरान परेशान बंदर के बच्चे को डॉ दंपति हेमलखासा गांव के अपने घर ले आया और जल्द ही ये घर का खास सदस्य बन गया. मादिया समुदाय के भगवान बबली के नाम पर ही बंदर के बच्चे का नाम बबली रखा गया. लेकिन किसी को भी इस बात का अंदाजा नही्ं था कि डॉ प्रकाश का ये प्रयास दूसरे जानवरों की जिंदगी में कितना बदलाव लाने वाला था. अपने आंगन में ही मौजूद जगह को डॉ दंपति ने एक पशुओं के अस्पताल में बदल दिया और इस अस्पताल का पहला जानवर भी बबली ही बनी.

प्रकाश ने मदिया समुदाय के साथ सौदा किया कि खाने के लिए वे भले ही जंगली जानवरों का शिकार कर लें, लेकिन इन जानवरों के बच्चों को उन्हें सौंप दिया जाए ताकि वे उनकी देखभाल कर सकें, बदले में आदिवासी अपने लिए कपड़े और थोड़ा राशन ले सकते हैं.

सौदा तय हुआ और डॉ आम्टे का आंगन जंगली जानवरों की मौजूदगी से खूबसूरत बन पड़ा.

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चीते, जंगली बिल्लियों, गिलहरियों, अफ्रीकी लंगूर, काले हिरण, सांप, मगरमच्छ, मोर, नीलगाय और ऐसे ही कई जंगली जानवर डॉ आम्टे के इस मिनी चिड़ियाघर में आने लगे. एक समय पर इस जगह पर 300 से ज्यादा जानवर गुजर-बसर कर रहे थे.

जंगली जानवरों का इस तरह इंसानी सभ्यता के बीच रहना राज्य सरकार को नागवार गुज़रा. सरकार को जब इस बारे में खबर हुई तो ये बड़ा मुद्दा बन गया. जंगल की आबोहवा को छोड़ कर इंसानों के बीच इन जानवरों का रहना काफी खतरनाक हो सकता था. यही सोचकर सरकार ने यहां एक पिंजरा बनवा दिया.

लेकिन प्रकाश के बेटे के अनुसार, बिना पिंजरों के जानवर ज्यादा सहजता से रह पा रहे थे. उन्होंने कहा कि मुझे याद है कि कैसे हम गांव के बच्चे और कई जानवर साथ में ही नदी तक नहाने के लिए जाया करते थे. हमारी पैदाइश ऐसी हुई कि हमने कभी जानवरों से डरना सीखा ही नहीं.

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पिंजरों की मौजूदगी के बावजूद डॉ आम्टे का अस्पताल आम चिड़ियाघर से कहीं बेहतर स्थिति में है, जहां आने वाले हर जानवर का आम्टे परिवार गर्मजोशी से स्वागत करता है. हालांकि यहां आने वाले जानवरों की संख्या में भारी कमी आई है क्योंकि मदियास समुदाय ने शिकार करना काफी कम कर दिया है. और इसका कारण भी आम्टे दंपति ही हैं.

दरअसल पिछले चार दशकों में आम्टे कपल ने अपने प्रयासों से यहां के आदिवासियों की जिंदगियां बेहतर बनाने में कामयाबी हासिल की है और खाने के लिए अब उन्हें केवल जानवरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता.

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हेमलखासा दुनिया से पूरी तरह से कटा हुआ है और यहां न तो बिजली है और न ही पक्की सड़कें. यहां काफी समय से मादिया गोंड आदिवासी समुदाय गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर कर रहा है. इस क्षेत्र के आदिवासियों को खेती बाड़ी की किसी तकनीक के बारे में जानकारी नहीं है और खाने के लिए इन्हें पूरी तरह से जंगल पर निर्भर रहना पड़ता है. इनके पास तन ढकने को कपड़ा नहीं है और ज्यादातर लोग कुपोषण के शिकार हैं.

यहां तक की इन लोगों के पास किसी प्रकार की कोई मेडिकल सुविधा भी मौजूद नहीं है. डॉ मंदाकिनी और उनके पति ने अपने अथक प्रयासों से यहां एक अस्पताल भी बनवाया है जहां आदिवासियों का मुफ्त में इलाज होता है. वहीं ये दंपति आदिवासी बच्चों को एक पेड़ के नीचे भी पढ़ाते हैं.

गौरतलब है कि डॉ प्रकाश आम्टे महान समाज सुधारक बाबा आम्टे के बेटे हैं. जहां प्रकाश के पिता ने आनंदवन में लोक बिरादरी प्रकल्प से कई कुष्ठ रोगियों की जिंदगियां बेहतर बनाई थी वहीं डॉ प्रकाश ने समाज सुधारने की इस कवायद को महाराष्ट्र के दुर्लभ गांव हेमलखासा में अंजाम देने की कोशिश की है.

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धीरे धीरे वे इस गांव की प्रतिदिन की समस्याएं भी हल करने लगे. उनके प्रयासों का फल कई सालों बाद जाकर मिल रहा है. आज कई आदिवासी बच्चे डॉक्टर, टीचर और इंजीनियर बन चुके हैं और डॉ आम्टे का अस्पताल कई मॉर्डन सुविधाओं से लैस हो चुका है.

यहां मौजूद स्थानीय स्कूल में अब एक पक्की बिल्डिंग भी मौजूद है और 400 आदिवासी बच्चे यहां पढ़ने आते हैं. यहां के लोगों ने आम्टे फैमिली की मदद से खेती के गुर भी सीख लिए हैं और यही कारण है कि वे भी प्रकृति में अपना योगदान देते हुए कम से कम जानवरों को नुकसान पहुंचाते हैं.

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आम्टे कपल पशुचिकित्सक नहीं बल्कि वे सामान्य डॉक्टर्स ही हैं और इस पशु अस्पताल को लेकर उन्होंने कभी कुछ सोचा नहीं था, बस वे लोग प्रयास करते गए और कारवां बनता गया. डॉ दंपति के तीन बच्चे दिगांत, अनिकेत और आरती और उनका परिवार भी अपनी जिंदगी का कुछ हिस्सा सामाजिक कार्यों में बिताते हैं.

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डॉ प्रकाश और डॉ मंदाकिनी के अथक प्रयासों और गदचिरोली में उनके सामाजिक सुधार को देखते हुए उन्हें 2008 में रमन मैग्सेसे अवार्ड से भी नवाजा गया था. वे आज भी उसी सरलता और जिंदादिली से इस दुर्लभ गांव को अपनी सेवा देने में लगे हुए है. इन महान आत्माओं को गज़ब पोस्ट की तरफ से सलाम!

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