अगर आपने मधुर भंडारकर की फ़िल्म 'कॉरपोरेट' देखी हो तो आप इस बात को तो जानते ही होंगे कि कई बार कॉरपोरेट कंपनियां अपने फ़ायदे के लिए किसी भी हद तक गुज़र जाती हैं लेकिन ऐसी घटनाएं सिर्फ़ पर्दे पर ही नहीं होती. 70 के दशक में भारत में भी एक ऐसा मामला सामने आया था जब देश के कई सीक्रेट दस्तावेज़ों को शराब के लिए बेचा जा रहा था. 

Coomar Narain, दिल्ली में एक इंजीनियरिंग और ट्रेडिंग कंपनी का प्रतिनिधित्व करता था. मुंबई में स्थित इस कंपनी का मालिक लोकेश मानकलाल था. लोकेश और नरेन,  जॉनी वॉकर ब्लैक लेबल विह्स्की और महज कुछ रूपयों के लिए सरकारी अधिकारियों से कई महत्वपूर्ण डॉक्यूमेंट्स निकलवा कर अपनी कंपनी को फ़ायदा पहुंचा रहे थे.   

नरेन कॉमर्स मिनिस्ट्री में सीनियर अधिकारी था. उसने इंडियन सिविल सर्विस में एक नेटवर्क खड़ा कर लिया था. वो अपने बॉस को बिज़नेस में फ़ायदा पहुंचाने के लिए देश के सीक्रेट दस्तावेज़ो का सौदा करता. शाम होते ही सिविल अधिकारियों का नरेन के दिल्ली ऑफ़िस में जमावड़ा लगता जहां ब्लैक लेबल की बोतल के साथ ही जानकारियां लीक की जाती.

जहां नरेन और उसके साथ मौजूद सरकारी अधिकारी शराब की घूंट भरते, वहीं नरेन के घर पर काम करने वाले नौकर जल्दी से दस्तावेज़ों की फ़ोटोकॉपी करा लाते. वापस आकर इन अधिकारियों को ऑरिजिनल दस्तावेज़ वापस कर दिया जाता. हालात ये थे कि महज एक ब्लैक लेबल विह्सकी या महज 100 रुपये में देश की महत्वपूर्ण सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा था.

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1970 के अंतिम सालों में मानेकलाल का बिज़नेस सोवियत यूनियन और Eastern Bloc के देशों में फ़ैलने लगा था. कुमार नरेन ने सीक्रेट दस्तावेज़ों को निकलवाने की क्षमताओं से मानेकलाल का बिज़नेस फलने -फूलने लगा. अपनी कंपनी को Eastern Bloc में फ़ायदा पहुंचाने के लिए नरेन ने अपना बिज़नेस बढ़ाना शुरू किया, इसके लिए उसने अपना नेटवर्क फ़ैलाना शुरू किया. मिनिस्ट्री ऑफ़ डिफेंस के अलावा पीएम और राष्ट्रपति ऑफ़िस में भी उसने सेंध लगाने की कोशिशें की.

नरेन ने सैंकड़ों सीक्रेट दस्तावेज़ों को एक कॉमर्स मिनिस्ट्री के सिविल अधिकारी को बेचा था. इस अधिकारी ने इन दस्तावेज़ों को Eastern यूरोप में बिज़नेस चलाने वाले दो भारतीय बिज़नेसमैन को बेच दिया. इन दस्तावेज़ों में भारत के एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम, मिलिट्री सैटैलाइट्स, सरकारी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, RAW, IB जैसे संस्थानों के टॉप सीक्रेट सरकारी पॉलिसी पेपर्स और देश की महत्वपूर्ण डिफ़ेंस प्लान जैसे कई सीक्रेट दस्तावेज़ मौजूद थे.

नरेन कई आलीशान पार्टियां भी कराता था, जिसमें ब्लैक विह्स्की के साथ ही कई महंगी कॉल गर्ल्स भी होती थीं. इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB) को जब एहसास हुआ कि सरकार के सीक्रेट दस्तावेज़ों को लीक किया जा रहा है, उसी दौरान उन्हें ये भी पता चला कि फ़्रांस भारत के रक्षा मंत्रालय से जुड़े 4 बिलियन डॉलर्स के Contract को हासिल करने की भी कोशिश कर रहा है, ऐसे में IB ने एक्शन लेने का फ़ैसला लिया.

पुकत गोपालन रोज़ की तरह ही काम के बाद सीधा नरेन के पास पहुंचा. गोपालन, पीसी एलेक्ज़ेंडर का सीनियर पर्सनल अस्सिटेंट था. वहीं पीसी एलेक्ज़ेंडर जो प्रधानमंत्री के प्रिसिंपल सेकेट्री थे. वो मानेकलाल के ऑफ़िस में तीन सीक्रेट दस्तावेज़ों की फ़ोटोकॉपी कराने जा रहा था. जिस समय पुलिस वहां पहुंची, गोपालन और नरेन विह्स्की पी रहे थे. पुलिस ने दोनों को गिरफ़्तार कर मानेकलाल की ऑफ़िस की बिल्डिंग को सील कर लिया.

प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, जांचकर्ताओं ने सैंकड़ों दस्तावेज़ बरामद किए जिनमें रक्षा मंत्रालय और प्रधानमंत्री ऑफ़िस से जुड़ी हर महत्वपूर्ण फ़ाइल की फ़ोटोकॉपी मौजूद थी. इसके अलावा पीएम ऑफ़िस के तीन सदस्यों को भी उनके घर से गिरफ़्तार किया गया.

इस बात का पता चलते ही पीसी एलेक्ज़ेंडर से इस्तीफ़ा ले लिया गया. सरकार ने इस मामले से जुड़े किसी भी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उस समय मीडिया ने फ़्रांस को कटघरे में लिया था और इसमें पोलैंड और ईस्ट जर्मनी के भी रोल के बारे में भी मीडिया में खबरें आयीं.

नरेन अपने गिरफ्तार होते ही समर्पण की मुद्रा में आ चुका था, पर नरेन की पत्नी का कहना था कि मेरा पति एक छिपकली तक से डरता है वो ऐसा षडयंत्र नहीं रच सकता, लेकिन नरेन खुद चाहता था कि उसे झंझटों से छुटकारा मिल जाए. यही कारण था कि उसने अपने 32 टॉप सिविल अधिकारियों के नेटवर्क का पूरा कच्चा-चिट्ठा पुलिस के सामने खोल दिया. देश के सीक्रेट दस्तावेज़ों की मदद से उसने कई मिलियन डॉलर बनाए थे. हालांकि, नरेन ने साफ़ किया कि उसकी कमाई अपने बॉस योगेश मानेकलाल और Poles, Eastern Germans से डील करने वाले दो बिज़नेसमैन से बेहद कम थी. 

5 महीने चली जांच में 18 लोगों को देश के महत्वपूर्ण सीक्रेट्स को दूसरे देशों को देने के चलते गिरफ़्तार किया गया था. 17 सालों तक चले इस केस में योगेश मानेकलाल को 14 सालों की कड़ी सजा सुनाई गई. इसके अलावा 12 पूर्व सिविल अधिकारी जिनमें 4 पीएम ऑफ़िस और 4 डिफ़ेस मंत्रालय से संबंधित थे, उन्हें 10 साल की सज़ा सुनाई गई थी. कुमार नरेन की प्राकृतिक तरीके से मार्च 2000 में मौत हो गई थी.

माइकल स्मिथ एक ब्रिटिश लेखक हैं और जासूसी से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं. उनकी हालिया किताब 'The Anatomy of a Traitor – A History of Espionage and Betrayal’ के कुछ अंशों से इस आर्टिकल का अनुवाद किया गया है.

Source: GGINews