पिछले कुछ समय से बॉलीवुड में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है. मसाला और कमर्शियल फ़िल्में तो आ ही रही हैं लेकिन यथार्थवादी और रियलिस्टिक फ़िल्मों का भी एक अच्छा ख़ासा स्पेस तैयार हुआ है.

शायद इन फ़िल्मों का ही प्रभाव है कि शहरों में रहने वाले लोग भी अब देश के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से जुड़ी फ़िल्मों में अच्छी-ख़ासी दिलचस्पी लेने लगा है. इशकज़ादे, इश्किया, ओंकारा, अपहरण, गैंग्स ऑफ़ वासेपुर जैसी फ़िल्मों ने छोटे-छोटे कस्बों और गांवों की कहानियों को शहरी लोगों तक पहुंचाया है.

बॉलीवुड में आए निर्देशकों की इस नई खेप ने मुंबई फ़िल्म इंड्रस्टी का चेहरा बदल दिया है, जो अपने अनुभवों और अपने शहरों की कहानियों और चरित्रों को पर्दे पर ला रहे हैं. अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धूलिया, विशाल भारद्वाज, अभिषेक चौबे, नीरज घेवान, मनीष शर्मा जैसे कुछ निर्देशकों ने छोटे शहरों की असरदार और प्रभावशाली कहानियों को पर्दे पर उतारा है. ख़ास बात ये है कि इन निर्देशकों पर साख बनाए रखने का कोई बोझ नहीं है और ये अपनी मनमर्ज़ियों से अलग-अलग प्रयोगधर्मी फ़िल्में बनाने से गुरेज़ नहीं करते.

पेश है इस साल की ऐसी ही कुछ फ़िल्में जिनमें आपको छोटे शहरों का अक्स नज़र आएगा:

टॉयलेट एक प्रेम कथा

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पंडित परिवार में जन्‍मा केशव साइकिल की दुकान चलाता है. पत्‍नी के प्‍यार में दीवाना केशव अपनी बीवी के लिए शौचालय का जुगाड़ करता है लेकिन उसे कामयाबी हाथ नहीं लगती. टॉयलेट बनाने की यही जद्दोजहद फ़िल्म की कहानी है. यूपी के ग्रामीण इलाकों में अक्षय की चुहलबाजी से कई लोग रिलेट कर पाने में कामयाब रहे थे.

न्यूटन

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छत्तीसगढ़ के एक नक्सल प्रभावित छोटे से क्षेत्र में कैसे एक इंसान अपनी ड्यूटी को पूरा करने के लिए शिद्दत से मेहनत करता है, यही फ़िल्म की कहानी है. इस फ़िल्म का ज़्यादातर हिस्सा छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य के जंगलों में शूट किया गया है. शहरों की आपाधापी से दूर जंगलों और आदिवासियों के बीच लोकतंत्र का खस्ताहाल, सत्तानशीनों के लिए आंखें खोल देने वाला है. शायद यही कारण है कि फ़्रेश और शानदार स्क्रिप्ट के चलते ये फ़िल्म भारत की तरफ़ से इस साल की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री के रूप में भी जगह बना चुकी है.

शुभ मंगल सावधान

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ये फ़िल्म देश के सबसे पवित्र स्थलों में से एक हरिद्वार में स्थित है. अगर आप हरिद्वार गए हैं तो फ़िल्म में दिखाए गए मंदिरों से लेकर चहल-पहल तक आपकी यादें ताज़ा कर देंगे. ये फ़िल्म संवेदनशील मुद्दे Erectile Dysfunction पर आधारित है. इससे पहले इस विषय को पहले बॉलीवुड में नहीं छुआ है.

बरेली की बर्फ़ी

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बरेली की रहने वाली बिट्टी को देखते ही चिराग दुबे दिल दे बैठता है जो एक प्रिंटिंग प्रेस का मालिक है, लेकिन बिट्टी को तो 'बरेली की बर्फी' किताब के लेखक प्रीतम विद्रोही से प्‍यार हो जाता है. ये तीनों ही किरदार बिल्कुल रियलिस्टिक टच लिए हुए हैं और दर्शकों को अपने देसी अंदाज़ से बांध रखते हैं.

अनारकली ऑफ़ आरा

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ये फ़िल्म कुछ साल पहले सुर्खियां बटोर चुकीं फैजाबाद की डांसर, सिंगर ताराबानो फैजाबादी से प्रेरित होकर बनाई गई थी. फ़िल्म की शूटिंग शुरू करने से पहले स्वरा ने बिहारी भाषा पर जमकर होमवर्क किया. आरा की संस्कृति को ज़्यादा नज़दीक से जानने के लिए स्वरा किसी नामी होटल के बजाए आरा के एक छोटे से होटल में करीब एक महीने रहीं.

जॉली एलएलबी 2

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जॉली एलएलबी वन में अरशद वारसी और सौरभ शुक्ला ने कमाल का अभिनय किया था वहीं इस फ़िल्म की फ्रेंचाइज़ी में अक्षय कुमार लखनऊ की गलियों में घूमते नज़र आए थे. सौरभ और अक्षय की जुगलबंदी ने दर्शकों को खूब हंसाया हालांकि सिनेमाटोग्राफ़ी के साथ-साथ अगर भाषाई लहजे पर काम किया जाता तो वाकई फ़िल्म बेहद मज़ेदार हो सकती थी.

बद्रीनाथ की दुल्हनिया

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लखनऊ में बेस्ड इस फ़िल्म में बद्रीनाथ को अपने लिए एक पारंपरिक दुल्हन की तलाश है वहीं वैदेही को आज़ाद ख्यालात वाली ज़िंदगी पसंद है. इसी उधेड़बुन में कहानी आगे बढ़ती है और कई दृश्यों में लखनऊ की फ़ील वाले कई प्रसंग फ़िल्म में मौजूद रहते हैं.

सीक्रेट सुपरस्टार

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इनसिया नाम की 15 साल की एक लड़की सिंगर बनना चाहती है लेकिन उसके पिता बहुत ही सख्त हैं और उसे अपने सपने पूरे करने की इजाजत नहीं देते, इसलिए इनसिया बुर्का पहनकर एक गाना रिकॉर्ड करती हैं और उसे यूट्यूब पर अपलोड करती हैं. इसके अलावा फ़िल्म में शहरों में अक्सर डार्क पहलू बन कर उभरते कई गंभीर मसले, मसलन भ्रूण हत्या और घरेलू हिंसा को इस फ़िल्म में काफी संवेदनशीलता से छुआ गया है.

लिप्स्टिक अंडर माय बुर्का

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ये फ़िल्म समाज औऱ परिवार की बंदिशों में जकड़ी हुई चार महिलाओं की कहानी है. अपनी आकांक्षाओं को उड़ान देने के लिए भोपाल की गलियों में इन सभी महिलाओं का संघर्ष चलता रहता है. वीमेन सेक्शुएलटी जैसे विषयों पर सामाजिक हिप्पोक्रेसी के चलते ही इस फ़िल्म को रिलीज़ कराने में फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा था. अलग अलग उम्र, धर्म और समाज की महिलाओं की इच्छाओं और आशाओं की कहानी कहती इस फ़िल्म में भोपाल भी एक सेंट्रल कैरेक्टर सा दिखाई देता है.

हरामखोर

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यूं तो ये फ़िल्म 2015 में बनकर तैयार थी, लेकिन अपने संवेदनशील और बोल्ड कंटेंट होने के चलते इसे भारत में रिलीज़ होने में दिक्कतें आई. कई फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में अवार्ड्स जीतने वाली ये फ़िल्म आखिरकार 2017 के पहले महीने में भारत में रिलीज़ हुई थी. मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में फ़िल्माई गई ये कहानी एक स्टूडेंट और रंगीले स्वभाव के टीचर के इर्द-गिर्द घूमती है. फ़िल्म को 20 से भी कम दिनों में निपटा लिया गया था. फ़िल्म में मौजूद सरकारी स्कूल, नवाज़ का घर और गगनचुंबी चिमनियों के पास मौजूद एक खाली मैदान कई स्तर पर इस गांव को एक किरदार के तौर पर स्थापित कर देती है.