कहते हैं कि ज़रूरत के वक़्त इंसान कई ऐसे हलों को खोज लेता है, जिसके बारे में सोचा भी न जा सके. ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है गूंज नामक एक संस्था ने. साल 2013 में इस संस्था ने प्लास्टिक फ़्लेक्स का इस्तेमाल स्कूल की टपकती छत से बचने के लिए किया था. ये एक सफ़ल प्रयोग साबित हुआ और गूंज को गरीबो के लिए एक नया रास्ता दिखने लगा.

फ़्लेक्स की मदद से गूंज ने बारिश के बाद टूटे घरों को बनाने और उन्हें ये काम सिखाने की ठानी. उनके साथ काम करने वाले लोग बारिश से पहले ही कई गांव तक पहुंचे और उन्हें इस काम को सिखाया. इस काम को सबसे पहले उत्तरकाशी और गुप्तकाशी में शुरू किया गया.

गूंज ने इस आइडिया को बिहार में आई बाढ़ के बाद भी मदद के लिए इस्तेमाल किया था. इसके बाद से अब गूंज की एक पूरी टीम फ़्लेक्स से मदद के लिए तैयार रहती है. इस टीम मे कुल 750 महिलाएं हैं, जो घरों के हिसाब से फ़्लेक्स जोड़ने का काम करती हैं. साथ ही इन फ़्लेक्स से वो कई और रोज़मर्रा की चीज़ें भी बनाती हैं, जिनसे गरीबों की मदद हो सके.

गांव में घूम-घूम कर इस संस्था के लोग गरीबों को ये कला भी सिखा रहे हैं, जिससे उनकी रोज़ीरोटी चलती रहे. महाराष्ट्र, उत्तराखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और दिल्ली में इसकी शुरुआत भी हो चुकी है.

संस्था का मानना है कि ये एक टेम्प्रेरी चीज़ है, लेकिन ये लोग सही राह पर हैं और आने वाले वक़्त में इसके बेहतर उपाए खोज़ लिए जाएंगे.

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