'मांझी' फ़िल्म तो आप सब ने ही देखी होगी, जिसमें नवाज़ुद्दीन सिद्दकी ने पहाड़ का सीना चीर कर रास्ता बनाने वाले मांझी का किरदार निभाया था. सरकार से कई विनतियों के बाद जब उसके कानों पर जूं तक न रेंगी, तो मांझी खुद ही औजार उठा कर रास्ता बनाने के लिए अकेले ही चल पड़े थे.

ऐसे ही एक मांझी की कहानी उत्तराखंड के डांग में देखने को मिली है, जहां कई सालों तक सरकार के चुनावी वादों के भरोसे रहने के बाद महिलाओं ने खुद ही सड़क बनाने का फ़ैसला लिया.

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2012 में गोमुख उत्तरकाशी के 100 किलोमीटर के दायरे को ग्रीन इकोलॉजिकल घोषित किया गया था, जिसके बाद इन महिलाओं ने क्षेत्र में चल रहे हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और कमर्शियल माइनिंग प्रोजेक्ट्स के ख़िलाफ़ आवाज़ भी उठाई थी.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, सरकार का कहना है कि उसने 5 जनसुनवाई आयोजन की थी, जिसे विपक्षियों के विरोध के बाद वापिस ले लिया गया था. वहीं दूसरी ओर 'उत्तराखंड महिला मंच' से जुड़ी पुष्पा चौहान का कहना है कि उन्हें इसमें भाग ही नहीं लेने दिया गया.

ये महिलाएं कई पेड़ काटने के ख़िलाफ़ रहने के साथ ही ऐसे कई फ़ैसलों पर अपना विरोध दर्ज करा चुकी हैं. पर इन सब के बावजूद सरकार या प्रशासन में से कोई भी इनकी सुध लेने वाला नहीं है. ये अपने क्षेत्र में विकास चाहती हैं, पर वो विकास पेड़ों को काट कर या नदियों की धारा में रुकावट पैदा करके नहीं चाहतीं.

सरकार की अनदेखी के बाद इसलिए इन महिलाओं ने औजार उठाये और खुद सड़क बनाने के लिए निकल पड़ीं.

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