हम बारहवीं में थे. UP के बुंदेलखंड इलाके में रहते थे. हां वही, जहां से आपने अकसर सूखे, गरीबी, घास की रोटी वाली खबरें सुनी होंगी. लेकिन, पता है, एक दिन मैंने खबर सुनी कि हमारे शहर में कटरीना कैफ़ आ रही हैं. अब हम तो बचपन से ही समझदार थे, इसलिए समझ गए कि अफ़वाह है. कटरीना कैफ़ की जगह आए तो बस मुलायम सिंह. दरअसल विधान सभा चुनाव चल रहे थे और मुलायम सिंह प्रचार के लिए आने वाले थे. छोटे शहरों में भीड़ जुटाने के लिए अकसर ऐसी अफ़वाहें उड़ा दी जाती हैं. इतना ही नहीं, छोटे शहरों में VIP Visits के और भी अजीबो-गरीब किस्से हैं.

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थोड़ा VIP वाला फ़ील तो हमें भी आता था

VIP Visits का सबसे ज़्यादा मज़ा तो बच्चे लेते थे. Visit Schedule होते ही उस दिन स्कूल की छुट्टी एनाउंस हो जाती थी. नहीं, किसी सुरक्षा वजह से नहीं, बल्कि रोड जाम होने की वजह से. दूसरी वजह ये होती थी कि स्कूल की बसें तो RTO साहब रैली में भेज देते थे. सबसे खुशी की बात तो ये थी कि उस दिन लाइट नहीं जाती थी. यानि दिन भर टीवी और रुहआफ़ज़ा चलने वाला है. हां अपने प्रोग्राम के बीच-बीच में न्यूज़ लगाकर टीवी पर अपने शहर की पहली बार आने वाली फ़ुटेज भी देखते रहते थे. भले ही राष्ट्रीय चैनल इन तस्वीरों को नहीं दिखा रहे हैं, लेकिन रीजनल चैनल्स पर अपने शहर की ख़बरें लगातार आ रही होती थीं. मम्मी- आंटी लोग भी प्रेस करने के लिए सारे कपड़े इस दिन के लिए ही इकट्टठे कर के रखे रहती थीं. Mixer-Juicer से होने वाले सारे काम भी इसी दिन निपटाए जाते थे.

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अफ़वाह ही अफ़वाह

जब तक नेताजी आ कर चले नहीं जाते ,अफ़वाहों के नए नए Versions मार्केट में आते रहते. कभी कटरीना कैफ़ आने वाली होतीं तो कभी अमिताभ बच्चन. सेलिब्रिटी ही नहीं, आतंकियों की नज़र भी हमारे शहर पर ही होती थी. कभी पता चलता कि रैली से पहले यहां आतंकी हमला होगा, तो कभी पता चलता कि आतंकवादी हमारे शहर में एक हफ्ते पहले से ही आए हुए हैं. हमारे मुहल्ले वाले तो इन ख़बरों को लाने में सारी इंटेलिजेंस एजेंसियों को भी फ़ेल कर देते थे.

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नेताजी के आने की फ़ास्ट-ट्रैक तैयारियां

ये तो हुई घर-मुहल्ले की बात. बाहर निकल के देखो तो पूरा शहर ही बदल गया है. हमें पहली बार पता चला कि आज तक हम जिस पतली सी गली में इधर गाय तो उधर साइकिल से बचते हुए निकलते थे वो तो इतनी चौड़ी सड़क थी. मतलब, एक दिन में फुटपाथ की सारी दुकानें सफाचट्ट. थोड़ी देर में अपने ही इस 'नए शहर' का जोश ठंडा हो जाता, तो उन सब दुकान वालों के लिए मन में सॉफ्ट कॉर्नर भर जाता. अब कहां जाएंगी सब्जी वाली अम्मा? वो आइसक्रीम वाला कौन से मुहल्ले में गया होगा? अच्छा-भला सामने ही नमकीन-मैगी सब मिल जाती थी, अब तो बाज़ार तक जाना पड़ेगा. खैर, ये सब समस्याएं Visit के अगले दिन तक के लिए ही होतीं. जिन गलियों का कल आस्तित्व ही संकट में आ गया था, कल से फिर अपने वास्तविक रूप में आ जाएंगी.

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हां, एक बात और, इस छोटे से शहर मे मैंने इतने सायरन कभी नहीं सुने थे, जितने एक दिन में सुन लिए. हर तरफ पुलिस की गाड़ी या कोई अम्बेसडर या फिर एम्बुलेंस ही दिखाई देतीं. जो नालियां बिन बरसात के भी बजबजाती रहती थीं, वो एक दिन में (एक दिन के लिए) एकदम साफ़!

खैर, इन सब फ़ास्ट ट्रैक तैयारियों के बाद अब बारी आती थी नेताजी के आने की. इस दिन आसपास के शहरों में रोडवेज़ बसों की किल्लत पड़ जाती है. इन सरकारी बसों को नेताजी की रैली में आ रही भीड़ की सेवा में लगा दिया जाता. बसें कम पड़ जाएं, तो यहां के पब्लिक स्कूलों की बसें हैं न! हर छोटे शहर में रामलीला मैदान, कोई डिग्री कॉलेज ग्राउंड या पुलिस लाइन, जैसा कोई मैदान रैलियों के लिए फिक्सड रहता है. आसपास के गांवों से लोग बसों और ट्रैक्टरों में भर-भरकर रैली में आते थे. इधर नेताजी के आने के तय समय से कुछ पहले से Local लोग मैदान में पहुंचना शुरू कर देते. बच्चे चौकन्ने होकर हर गड़गड़ाहट की आवाज़ पर हेलिकॉप्टर देखने भागते. जो बच्चा हैलिपैड के पास जाकर हैलिकॉप्टर देख आया वो तो मुहल्ले का बाहुबली हो गया.

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खैर, छोटे शहरों में हम समस्याओं की शिकायत करने के बजाए उनसे भी प्यार कर लेते हैं. हमें अपनी संकरीं गलियां ही प्यारी हो जाती हैं. सब्ज़ी वाली अम्मा दो दिन न दिखें, तो उनकी भी चिंता होने लगती है, भले ही उनकी दुकान की वजह से हमें स्कूटी निकालने में कितनी ही दिक्कत क्यों न होती हो. बिजली पूरे दिन न जाए, तो भी ऊब होने लगती है.