जय जवान, जय किसान नारे को भारत का राष्ट्रीय नारा भी कहा जाता है. ये नारा सबसे पहले 1965 के भारत पाक युद्ध के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था. आज हम इस नारे का ज़िक्र इसलिए कर रहे हैं क्योंकि देश के जवान और किसान दोनों की हालत कुछ ठीक नहीं है. देशभर में किसान फ़सल चौपट हो जाने से आत्महत्याएं कर रहे हैं. इसी हफ़्ते हज़ारों किसान अपनी मांग को लेकर महाराष्ट्र के नासिक से 180 किलोमीटर पैदल चलकर मुम्बई पहुंचे. अब सवाल ये उठता है कि आख़िर 55 हज़ार किसानों की इस रैली को किसने संगठित किया होगा? किसने किसानों को उनके अधिकारों के लिए लड़ने को प्रेरित किया होगा?

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55 हज़ार किसानों की इस महारैली के पीछे जिस इंसान का हाथ है आज हम आपको उसी के बारे में बताने जा रहे हैं.

विजु कृष्णन, इस किसान रैली से पहले शायद ही किसी ने ये नाम सुना होगा. क्योंकि इससे पहले विजु को उनके करीबी और किसानों के लिए काम करने वाले लोग ही जानते थे, लेकिन अब स्थिति बिलकुल अलग है. आज उनके नाम को हर कोई जानता है. किसानों की जायज़ मांग को लेकर विजु कृष्णन के नेतृत्व में एक शांतिपूर्ण रैली निकाली जा रही है.

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44 साल के विजु कृष्णन, Jawaharlal Nehru University Students Union (JNUSU) के पूर्व छात्र अध्यक्ष भी रहे हैं. वो Students Federation of India (SFI) के नेता थे. जबकि वर्तमान में विजु देश के सबसे बड़े किसान संगठन 'अखिल भारतीय किसान सभा' में संयुक्त सचिव के तौर पर किसानों के लिए काम कर रहे हैं. इसी हफ़्ते उनके नेतृत्व में नासिक से मुंबई तक लॉन्ग मार्च निकाला गया है.

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इससे पहले भारत की बदलती कृषि अर्थव्यवस्था को लेकर डॉक्टरेट पूरी करने बाद विजु कृष्णन ने बेंगलुरु के सेंट जोसेफ़ कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ पॉलिटिकल साइंस के प्रमुख के तौर पर काम किया. कुछ साल वहां पढ़ाने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर किसान हितों के लिए काम करने की ठान ली.

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न्यूज 18 के साथ एक इंटरव्यू के दौरान विजू कृष्णन ने कहा 'किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए मेरा ये संघर्ष पिछले दो वर्षों से चल रहा है. मेरा ये संघर्ष महाराष्ट्र के अलावा देश के कई अन्य हिस्सों जैसे राजस्थान, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भी जारी रहा. अब किसानों के हक़ के लिए समय-समय पर छोटे-बड़े विरोध प्रदर्शन होते रहेंगे जो बाद में एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकते हैं. इससे पहले भी कई तरह के किसान आंदोलन हुए थे लेकिन अब हमारे पास लगभग 50,000 किसानों की सक्रिय भागीदारी है. इससे पहले राजस्थान में भी इतने ही या इससे भी ज़्यादा किसानों ने आंदोलन में हमारा साथ दिया था. अखिल भारतीय किसान सभा की इस ताकत को देख मीडिया ने भी हमारे इस आंदोलन को लोगों तक पहुंचाया.'

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