लिव-इन रिलेशनशिप, यानि एक जोड़े का बिना शादी के एक ही घर में साथ रहना. इसका नाम सुनते ही कई लोगों के मन में सिर्फ़ एक शब्द आता है, 'सेक्स'. असलियत में ये केवल सेक्स नहीं है, इसके और भी कई पहलू हैं, जिन्हें समझा जाना ज़रूरी है. आज जहां युवाओं में इसका चलन बढ़ रहा है, वहीं इसके नाम पर नाक-मुंह सिकोड़ने वालों की भी कमी नहीं है.

भारत में लिव-इन रिश्ते को सुप्रीम कोर्ट ने पाप या अपराध मानने से इंकार किया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब दो व्यस्क अपनी मर्ज़ी से साथ रहना चाहते हैं, तो इसमें कोई अपराध नहीं है.

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शहरी भारत पर पश्चिमीकरण के असर से लिव-इन रिश्ते आम होते जा रहे हैं. पढ़ाई और रोज़गार के लिए युवा अपने घरों से दूर जाते हैं, एक अनजान शहर में अपनों से दूर कोई लगभग अपना-सा मिल जाना, कईयों के लिए लिव-इन रिश्ते में आने की वजह बन जाता है. ये एक ऐसा चलन है, जिसे आप सही या गलत करार नहीं दे सकते. जिस तरह एक रिश्ता कैसा चलेगा, ये उस व्यक्ति पर निर्भर करता है, जिसके साथ आप रिश्ते में हैं, उसी तरह लिव-इन की सफ़लता भी काफी हद तक आपकी और आपके पार्टनर की आपसी समझ पर निर्भर करती है.

छोटे शहरों और कस्बों में हर कोई हर किसी से परिचित होता है. शादी से पहले सेक्स को लेकर जो घृणा लोगों में है, वो लिव-इन जैसी चीज़ का इन जगहों पर होना लगभग असंभव बना देती है. लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि दिल्ली या मुंबई जैसे बड़े शहरों में भी लिव-इन को आज़मा रहे लोग वो ही हैं, जो अन्य शहरों से रोज़गार या पढ़ाई के लिए यहां आते हैं. अब तक समाज इतना नहीं खुला है कि एक ही शहर में रह कर अपने घरवालों को बता कर लोगों को लिव-इन में रहने की अनुमति मिल जाये.

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इसलिए लिव-इन में रह रहे ये लोग, बड़े-शहरों की बिगड़ी औलादें नहीं हैं, ये छोटे शहरों के वो दीवाने हैं, जो अनजाने शहर में आब-ओ-दाना ढूंढते हैं, एक आशियाना ढूंढते हैं.

अगर हम लिव-इन के कॉन्सेप्ट को फ़ायदे या नुकसान के नज़रिए से देखें, तो 'कमिटमेंट का न होना' ही इसका सबसे बड़ा फ़ायदा है, और सबसे बड़ा नुकसान भी. फ़ायदा यूं कि इस बात का एहसास होना कि अब तो बाकि की ज़िन्दगी यही चेहरा देखना है, कई बार प्यार से एक्साइटमेंट को नदारद कर देता है, रिश्ता बोझिल तक लगने लगता है. लिव-इन में ये नयापन बरकरार रहता है, क्योंकि ज़िन्दगी भर साथ रहने की कोई बंदिश नहीं होती.

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हालांकि कमिटमेंट का न होना कई बार ज़िम्मेदारी के एहसास को भी कम कर देता है. ज़रा सा झगड़ा, किसी बात पर मतभेद होने से बात ब्रेक-अप तक पहुंच सकती है. क्योंकि इस रिश्ते में सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें नहीं खायी जातीं, इसलिए शादी की तरह आप इस रिश्ते को बनाए रखने का हर संभव प्रयास करने की नहीं सोचते.

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इस मुद्दे पर एक सहकर्मी से बात की, तो एक बेहद ज़रूरी बात सामने आई. हम सब बचपन से ये सोचते आते हैं कि हमारे भावी साथी में क्या गुण होने चाहिये, ये पता होने से ज़्यादा ज़रूरी है ये जानना कि वो कौनसी बातें हैं, जो आप अपने पार्टनर में कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते. गुणों के बारे में सोचना आसान है, पर एक रिश्ते को जिए बिना आप ये नहीं जान पाते हैं कि आपके लिए क्या Acceptable नहीं है. लिव-इन रिलेशनशिप आपको इन बातों को बेहतर समझने की सहूलियत देता है.

भले ही सुप्रीम कोर्ट इस रिश्ते को मान्यता दे चुका हो, समाज में अब भी ये पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हुआ है. पर धीरे-धीरे कई प्रोग्रेसिव मां-बाप भी इसे अपनाने लगे हैं. शादियां मज़ाक में नहीं होतीं, लोगों की ज़िन्दगी भर की कमाई और लाखों के लोन इसमें इन्वेस्ट कर दिए जाते हैं. आज की नॉन-कॉम्प्रोमाइज़िंग जेनरेशन जब तलाक लेती है, तो परिवारों पर भी बड़ा असर पड़ता है. जबकि लिव-इन से बाहर आना बेहद आसान होता है.

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आज जब मां-बाप बच्चों को पढ़ाई या नौकरी के लिए देश से बाहर भेजते हैं, तो कहीं न कहीं उन्हें पता होता है कि इसके साथ ही वो उन्हें एक आज़ादी भी दे रहे हैं. इस आज़ादी के मिलने पर लिव-इन का विकल्प भी खुल जाता है.

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डॉक्टर्स भी मानते हैं कि एक उम्र के बाद शारीरिक ज़रूरतों को नज़रंदाज़ करना स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकता है. शायद यही वजह थी कि पहले शादी सही उम्र में करा दी जाती थी. आज जब करियर को ज़्यादा तवज्जो दी जाने लगी है, शादी की उम्र खिसक कर 30 पार भी पहुंच गयी है. लिव-इन आपकी भावनात्मक और शारीरिक ज़रूरतों को शादी तक पूरा करता रहता है.

यकीनन लिव-इन शादी और परिवार की सामाजिक संस्था के अस्तित्व पर सवाल उठाता है और भारतीय संस्कारों को भी ताक पर रखता है, पर ये सोचने वाली बात है कि संस्कारों का महिमामंडन करना ज़्यादा ज़रूरी है या इंसान की वास्तविक ज़रुरतों का पूरा होना.

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