हम अपनी निजी ज़िंदगी में कई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं जैसे- सांस लेना, खाना खाना, पानी पीना, सोना-जागना, घूमना- फिरना आदि. इन्हीं में से एक नित्य प्रक्रिया है आंखों की पलकों का झपकना. हर इंसान अपनी आंखों की पलकों को झपकाता है. क्या आप जानते हैं कि लगातार पलकें झपकने से आपके देखने की क्षमता तेज़ और साफ़ होती है? ये हम नहीं जनाब बल्कि साइंस ऐसा कहता है.

पलकों का झपकना हमारे व्यवहार और गतिविधियों पर निर्भर करता है कि हम किस समय क्या कर रहे हैं और ये ख़ुद को उसी के अनुसार ढाल लेती हैं. जब हम किसी से बात कर रहे होते हैं तो ये ऊपर हो जाती हैं और जब हम कुछ पढ़ने लगते हैं तो ख़ुद ही नीचे हो जाती हैं. जब हम बहुत ज़्यादा थक जाते हैं तो पलकों के झपकने की दर भी कम हो जाती है. जब हम कोई रोचक चीज़ पढ़ते हैं, तब प्रति मिनट 15 बार नहीं, बल्कि मात्र 3-8 बार पलकें झपकाते हैं. इस दौरान बहुत सम्भावना है कि हमारी पलकें उस वक़्त झपकती हैं जब हम पन्ना पलटते हैं या एक लाइन से दूसरी लाइन पर जाते हैं.

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हारवर्ड डेटाबेस के मुताबिक मनुष्य की आंख की एक झपकी 0.1 से 0.4 सेकण्ड अवधि की होती है. औसतन इसे 0.25 सेकण्ड मान लेते हैं. यदि इसके आधार पर हम ये हिसाब लगाएं कि हम 1 घंटे में पलकें झपकाने में कितना समय व्यतीत करते हैं तो यह आएगा 5 मिनट. इसका मतलब ये हुआ कि जागते हुए हर घण्टे में 5 मिनट तो हमारी आंखें बन्द रहती हैं, जो हमारी जगने के समय का लगभग 10 प्रतिशत है.

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दिसम्बर 2012 में यूएस के प्रोसीडिंग्स ऑफ़ दी नेशनल एकेडमी ऑफ़ साइन्सेज़ में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार, जापान के ओसाका विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की टीम ने बताया था कि पलक झपकना दिमाग़ के लिए कुछ समय के आराम का तरीका हो सकता है. इससे आपके मस्तिष्क को थोड़ा भटकने और ऑफ़लाइन जाने का मौका मिलता है. ये समय एक सेकेंड का बहुत छोटा हिस्सा हो सकता है और इसके कुछ सेकंड बाद ही एकाग्रता पूरी तरह लौट आती है.

इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 20 स्वस्थ व्यक्तियों को ब्रेन स्कैनर में बैठाकर उनके मस्तिष्क की निगरानी की. इस दौरान सभी लोग ब्रिटिश कॉमेडी सीरियल मिस्टर बीन देख रहे थे. शोधकर्ताओं ने पाया कि वीडियो में जहां ब्रेक आते थे तो सबकी पलक एक साथ झपकती है. साथ ही दिमाग़ के उस हिस्से में सक्रियता में कमी आती है, जो एकाग्रता के साथ काम कर रहा होता है. वैज्ञानिकों ने बताया कि उस दौरान दिमाग़ कुछ पल के लिए डिफ़ॉल्ट मोड या सुस्त अवस्था में चला जाता है. शोधकर्ताओं का मानना है कि हो सकता है कि ये डिफ़ॉल्ट मोड विश्राम की भूमिका अदा करता है, जिससे बाद जब आंखें खुलती हैं तो एकाग्रता की क्षमता ज़्यादा हो जाती है.

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इसके बाद जब शोधकर्ताओं ने वीडियो में अपने आप से ही बीच-बीच में आने वाले ब्रेक में कृत्रिम ब्लैकआउट डाल दिए, जो कि साधारण ब्लैकआउट्स से अलग थे और उनका अवधि भी केवल एक पल के बराबर थी, तब मस्तिष्क स्कैन के आंकड़ों में डिफ़ॉल्ट नेटवर्क एक्टिव होता नहीं दिखा. इससे ये पता चला कि पलक झपकने का मतलब केवल इतना नहीं है कि क्षण भर के लिए हमें कुछ नहीं दिखता. बल्कि ये ब्लैकआउट्स हमको पता तो चलते हैं, मगर पलक झपकने की वजह से देखने में कोई व्यवधान महसूस नहीं करते हैं.

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