प्रिय ज्योति,

तुम जहां हो वहां के बारे में विशेष जानकारी नहीं है. मुझे पता भी नहीं है कि इस दुनिया के परे भी कुछ है या नहीं. मैं ठीक नहीं हूं ज्योति... तुम पूछोगी क्यों? नौकरी है, मां-बाबा हैं. शादी का प्रेशर नहीं है. तो फिर मैं ठीक क्यों नहीं हूं?

वो डर आज भी मेरे ज़हन में रह-रह कर ताज़ा हो जाता है. कौन सा डर है तुम्हें संचिता, इतनी Negative क्यों हो रही हो, यही पूछोगी तुम? क्या तुम सच में नहीं जानती कौन सा डर?

सच बताऊं तुम्हारे जाने के बाद से ही इस डर ने मुझे और शायद हिन्दुस्तान की कई लड़कियों को घेरा है. दिल्ली जैसे शहर में रहने और अकेले ना रहने के बावजूद तुम्हारे साथ वो सब हो गया, तो मैं तो अकेले ही घर से ऑफ़िस जाती हूं. मेट्रो में सहकर्मी रहता है, लेकिन कभी-कभी वो भी नहीं रहता.

हम इंसान ज़िन्दगी को बहुत कोसते हैं, बहुत ज़्यादा, लेकिन हम ज़िन्दगी के बारे में ही सोचते हैं, मैंने किसी को भी आज तक मौत के बारे में सोचते नहीं देखा. और तुम्हें जैसी मौत मिली वैसी मौत के बारे में तो शायद ही कोई सोचता होगा. हम इंसान होते ही हैं ऐसे हैं, अपना बुरा, बहुत बुरा नहीं सोचते.

जिन 6 लोगों ने तुम्हारी हालत किसी मृत शरीर से भी बद्तर कर दी थी, वो आज भी ज़िन्दा हैं. तुम्हारे घरवाले आज भी तुम्हारे लिए लड़ रहे हैं. तुम्हारे लिए मैं और मेरे जैसे सैंकड़ों लोग सड़कों पर उतरे थे, लेकिन हालात बद से बद्तर हो गए हैं ज्योति.

न सिर्फ़ लड़िकयां और औरतें, छोटे-छोटे बच्चे भी इस समाज और देश में सुरक्षित नहीं रहे.

लड़कियां शादी के लिए मना कर दें, तो उनका गैंगरेप कर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाते हैं. ये Male Ego बहुत ख़तरनाक चीज़ हो गई है.

तुम्हारे जाने के बाद कई बेवकूफ़ों ने बहुत कुछ कहा था. लड़कियों के कपड़ों को आज भी रेप का मुख्य कारण बताया जाता है. ये Moral Police आज तक ये नहीं बता पाई की 4-5 साल की बच्चियां क्या करें कि उनका रेप ना हो. कुछ दिनों पहले ही एक 5-6 साल की बच्ची का बलात्कार करने के बाद उसके गुप्तांग में लकड़ी डाली गई थी.

भोपाल में तो एक लड़की को पेड़ से बांधकर घंटों रेप किया गया. बलात्कारी चाय और गुटखा का ब्रेक लेकर बलात्कार करते रहे.

वहीं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में जब एक लड़की ने प्रोक्टर ऑफ़िस में अपने साथ हुई छेड़छाड़ की रिपोर्ट लिखवानी चाही तो उसे ही दोषी बताया गया और कहा गया कि 6 बजे बाद वो बाहर क्यों थी?

ना 1 साल की बच्ची को छोड़ा जाता है और ना ही 100 साल की वृद्धा को. समझ में नहीं आता की क्या कहूं या क्या लिखूं?

जब से घर छोड़ा है मां चिंतित रहती थी, लेकिन जब से दिल्ली आई हूं, मां की चिंता बढ़ गई है. जब तक घर नहीं पहुंचती वो बेचैन रहती है. पहले तो मैं भी Irritate हो जाती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसकी चिंता का कारण भी समझ आ गया. उसे डर है कि कहीं मैं भी किसी दिन प्राइम टाइम का टॉपिक ना बन जाऊं.

रेप और गैंगरेप की वीभत्स घटनाएं पहले भी होती थी लेकिन हाल के कुछ दिनों में या यूं कहें कि 16 दिसंबर 2012 में इसमें कमी आने के बजाय इज़ाफ़ा ही हुआ है. यही नहीं, लोग लड़कियों को सोशल मीडिया पर खुलेआम रेप करवाने की धमकियां तक देने लगे हैं.

आज तुम्हारे साथ उस हादसे को हुए 5 साल हो गये. लेकिन आज भी लगता है मानो वो कल की ही बात हो.

अच्छा ही हुआ जो तुम नहीं हो, क्योंकि अगर तुम होती तो शायद तुम भी रोज़ डर-डर के जीती. ऐसे जीना भी कोई जीना है क्या? जहां अपना देश ही अपना नहीं लगता. ना सरकार अपने बारे में बात करती है. Feminist शब्द ही अब हमारे यहां गाली बन गई है. लेकिन ये मुद्दे तो सिर्फ़ लडकियों के हक़ तक ही सीमित नहीं हैं. ये तो पूरे एक समाज की बात है ना? तो फिर क्यों तुम्हारे लिये जलाई गयीं हज़ारों कैंड्ल्स की लौ आज बुझ गई है.

काफ़ी हिम्मत कर के तुम्हें ये लिखा है. मैं दिल से उम्मीद करती हूं कि तुम किसी भी रूप में इसे पढ़ो. क्योंकि मैं तुम्हें भुली नहीं हूं, तुम्हें ना जानते हुए भी तुम्हारे दर्द का एहसास है मुझे.

हो सके तो मुझे माफ़ कर देना, क्योंकि तुम्हारे लिए आज तक ना मैं और ना किसी और ने ज़्यादा कुछ किया है.

संचिता

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