किसी ने सच ही कहा है कि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती और किसी व्यक्ति में अगर कुछ कर गुजरने की ललक हो, तो बड़ी से बड़ी दीवार भी उसका रास्ता नहीं रोक सकती. ऐसे ही एक होनहार युवा हैं बिहार के पूर्णिया में रहने वाले दिलीप साहनी. दिलीप एक मज़दूर के बेटे हैं, और उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई दैनिक मजदूरी करते हुये की. उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई और दिलीप ने बीटेक की डिग्री हासिल की, जिसके बाद नौकरी के लिए उसका मलेशिया के लिए कैम्पस सेलेक्शन भी हो गया. लेकिन उस वक़्त दिलीप के पास मलेशिया जाने के लिए पैसे नहीं थे. पर आज बतौर इंजीनियर दिलीप को सालाना 8 लाख रुपये मिल रहे हैं.

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23 साल के दिलीप को ये सफ़लता ऐसे ही नहीं मिली इसके लिए उनको सामाजिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर लड़ना पड़ा था. दिलीप कहते हैं कि, "मेरे और मेरे परिवार के लिए एक इंजीनियर बनने के अपने सपने का समर्थन करना कभी आसान नहीं था."

दिलीप ने बताया कि उनका मूल घर दरभंगा जिले में है, जहां से उनका परिवार हर साल बरसात के मौसम में 6 महीने (जुलाई से जनवरी) के लिए पूर्णिया आ जाता है. यहां पूरा परिवार मखाने की कटाई और फोड़ने का काम करता है. इस काम में कई बार हाथ भी जल जाते हैं लेकिन मिलते हैं सिर्फ 200 रूपये. इस तरह परिवार के सभी सदस्य मिलकर 800 रुपये रोज़ का कमा लेते हैं. इसके बाद दिलीप ने कहा कि बहुत मेहनत कर के मेरे पिता जी ने पैसे जमाकर मुझे इंजीनियरिंग कराई.

दिलीप के पिता लालटुन साहनी बताते हैं कि बेटे की पढ़ाई के लिए जब उन्हें पैसों की ज़रूरत थी तो उन्हें कहीं से भी मदद नहीं मिली. न तो कोई सरकारी मदद मिली और न ही बैंक ने लोन दिया. उस वक़्त उन्होंने पुश्तैनी 11 कट्ठा जमीन बेचकर भोपाल में दिलीप का दाखिला कराया और मजदूरी से पैसे जोड़-जोड़ कर उसकी पढ़ाई पूरी कराई.

अपनी करंट सैलरी के बारे में बात करते हुए दिलीप ने याद किया कि एक वक़्त था जब राजधानी पटना से उत्तर पूर्व में 360 किलोमीटर दूर पूर्णिया में स्थित हरदा में बतौर मज़दूर काम करने वाले इस परिवार की महीने की आमदनी मात्र 2,000-3,000 रुपये थी.

दिलीप ने बताया, '2013 में जब मुझे भोपाल के एक प्राइवेट तकनीकी कॉलेज Millennium Group of Institutions में एक इंजीनियरिंग प्रोग्राम में एडमिशन लेने का ऑफ़र मिला था, तब मैंने एजुकेशन लोन के लिए कई बैंक्स के चक्कर लगाए, लेकिन मेरी सभी ऍप्लिकेशन्स को रिजेक्ट कर दिया गया था.'

जब उनको बैंक से कोई मदद नहीं मिली, तब दिलीप के छोटे भाई ने उनकी मदद करने की ठानी और अपने बड़े भाई की पढ़ाई के लिए चेन्नई में एक टाइल यूनिट में नौकरी की. इसके अलावा मखाने फोड़ने का सीज़न ख़त्म होने पर दिलीप के पिता लालटुन साहनी नेपाल जाकर आइसक्रीम बेचते थे ताकि दिलीप की पढ़ाई पूरी हो सके. छुट्टियों में दिलीप भी परिवार के साथ मखाना फोड़ने का काम करते हैं.

उन्होंने कहा, "यदि मेरे पिता और भाई ने पैसे से मेरी सहायता नहीं की होती और इतना कठिन परिश्रम नहीं किया होता, तो मैं इंजीनियर नहीं बनता."

इसके अलावा उनके सामने सामाजिक चुनौती भी खड़ी थी, जो बहुत बहुत बड़ी थी. दिलीप से पहले, उनके गांव अंतोर से कोई भी दसवीं की परीक्षा भी पास नहीं किया है. उन्होंने जेएनजेवी हाई स्कूल, नवादा, बेनिपुर से फ़र्स्ट डिवीज़न में दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करके 2011 में ये उपलब्धि हासिल की. इसके बाद उन्होंने 2013 में दरभंगा के भरेरा कॉलेज से बारहवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की.

उन्होंने बताया, 'शिक्षा मेरे लिए कभी आसान नहीं थी क्योंकि हर साल मखाना कटाई के मौसम में मुझे श्रमिक के रूप में काम करने और कुछ पैसे कमाने के लिए पूर्णिया की यात्रा करनी पड़ती थी.' गांव के बहुत से लोगों का मानना था कि दिलीप पढ़-लिख कर आगे बढ़ने के जो सपने देख रहा है, वो व्यर्थ है. पढ़ाई के प्रति उसकी सनक व्यर्थ ही है, लेकिन वो दृढ़ निश्चयी था और उसने अपना लक्ष्य निर्धारित कर लिया था.

अपने कॉलेज में पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए दिलीप को 2016 में राज्य में टॉप करने पर मध्यप्रदेश के गृह मंत्री ने दिलीप को सम्मानित किया और सर्टिफिकेट प्रदान किया.

आखिरकार पिछले महीने एक बड़ी इस्पात कंपनी, Sangam Group ने उनको नौकरी का प्रस्ताव दिया है, जिसमें उनकी पोस्टिंग सिंगापुर में होगी. इसके साथ ही उनको 8 लाख रुपये सालाना सैलरी ऑफ़र की गई है. ये सैलरी उनके परिवार की सालाना इनकम से कई गुना अधिक है, जो मखाना फोड़ कर वो कमाते हैं.

ये तो अभी शुरुआत है. दिलीप कहते हैं कि उनका सपना उन गरीब बच्चों की मदद करना है, जो पढ़ाई करने के लिए प्रवासी मखाना मजदूरों के रूप में काम करते हैं. इस काम के लिए उनके आदर्श पूर्णिया के पुलिस अधीक्षक निशांत तिवारी हैं, जिन्होंने गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए 'मेरी पाठशाला' की शुरुआत की है.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दरभंगा और मधुबनी जिलों से 10,000 से भी अधिक प्रवासी श्रमिक पूर्णिया में मखाना कटाई और प्रसंस्करण में लगे हुए हैं. इन लोगों के लिए दिलीप प्रेरणा बन सकते हैं.

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