प्लास्टिक की समस्या ने आज दुनिया में एक विकराल रूप धारण कर लिया है. वैज्ञानिक इन दिनों प्लास्टिक को रीसायकल करने के लिए नए-नए प्रयोग कर रहे हैं. इसी प्रयास में एक नई खोज हुई है. वैज्ञानिकों ने एक ऐसा आर्टिफ़िशियल एन्ज़ाइम बनाया है, जो प्लास्टिक को खाता है और प्लास्टिक रिसाइकलिंग में एक नई क्रांति ला सकता है. इससे वैज्ञानिकों में एक आशा की किरण जागी है. वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक रिसाइकिल करने वाले बैक्टीरिया पर शोध करते हुए खोजा एन्ज़ाइम.

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ब्रिटिश रिसर्चर्स ने एक शोध करते हुए ग़लती से प्लास्टिक-पचाने वाले प्रोटीन (Plastic-digesting Protein) बना दिया है. जब इसका टेस्ट किया गया तब सामने आया कि लैब में बनाये गए इस एन्ज़ाइम में पॉलीथीन टेरेफ़ॉथलेट (Polyethylene Terephthalate (PET)) को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने की एक अद्भुत क्षमता थी. PET, प्लास्टिक के अलग-अलग प्रकारों में से एक है, जो फ़ूड और ड्रिंक इंडस्ट्री में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है.

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British Plastics Federation के अनुसार, Pet से बनाई गई बोतलों का उपयोग 70 प्रतिशत सॉफ़्ट ड्रिंक्स, फलों के जूस और मिनिरल वॉटर की पैकेजिंग के लिए किया जाता है, जो दुकानों और सुपरमार्केट में बेचीं जाती हैं. हालांकि, ये भी कहा जाता है कि ये पूरी तरह रिसाइकल हो सकती हैं, लेकिन अगर देखा जाए तो इनको डिस्कार्ड करने के बाद भी सैंकड़ों वर्षों तक ये वैसी की वैसी ही रहती हैं और वातावरण को दिन पर दिन नुक्सान पहुंचाती हैं.

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जापानी कचरे के रीसाइक्लिंग केंद्र में बैक्टीरिया की खोज के बाद हुई रिसर्च से ये बात से ये बात सामने आयी है कि इस बैक्टीरिया में प्लास्टिक खाने की और उसको पचाने की क्षमता की गई है. इसमें PET बोतलों और कंटेनरों को पचाने के लिए PETase नामक एक प्राकृतिक एन्ज़ाइम का उपयोग किया गया था.

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हालांकि, PETase की आणविक संरचना की जांच करते हुए UK की टीम ने अनजाने में प्रोटीन का एक नया और शक्तिशाली संस्करण बनाया. University Of Portsmouth के प्रमुख साइंटिस्ट और प्रोफ़ेसर John Mcgeehan ने बताया, 'कई बार हम किसी खास उदेश्य से रिसर्च करना शुरू करते हैं और हमको नहीं पता होता है कि आगे उसके क्या रिजल्ट्स आने वाले हैं, पर अक्सर जो हम नहीं सोचते हैं, वो चीज़ अचानक से सामने आ जाती है, और रिसर्च के लिए फायदेमंद होती है. ऐसा ही हुआ हमारी इस रिसर्च के साथ.' इस तरह के इंप्रूवमेंट्स मामूली ही होते हैं, लेकिन इस खोज से ये पता चला कि इस तरह के एंजाइंस को और बेहतर बनाने की गुंजाइश है. ताकि प्लास्टिक के बढ़ते कचरे को ख़त्म करने के प्रयास में हम और आगे बढ़ सकेंगे. हालांकि, अभी ये बहुत ही छोटे लेवल पर है.'

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'इस रिसर्च से ये पता चल गया है कि इस तरह की कोई टेक्नोलॉजी है और ये एक अच्छी संभावना है कि आने वाले सालों में हम एक औद्योगिक रूप से व्यवहार्य प्रक्रिया को देखेंगे जिसकी मदद से Pet और दूसरे अन्य प्लास्टिक जैसे PEF, PL और PBS को वापस उनके मूल रूप में परिवर्तित किया जा सकेगा, ताकि लगातार उनका पुनर्नवीनीकरण किया जा सके. US के साइंटिस्ट्स के साथ काम करते हुए Portsmouth के वैज्ञानिकों ने Harwell, Oxfordshire में Petase से होते हुए X-Ray बीम्स को डायमंड लाइट सोर्स सिंक्रोटॉन किया. आपकी जानकारी के लिए बात दें कि जब X-Rays, एक नुमा सुरंग पाइप जिसके चारों और इलेक्ट्रॉन्स घूम रहे होते हैं, में से निकलती हैं तो उसकी रौशनी सूरज से निकलने वाली किरणों से 10 अरब गुना ज़्यादा तेज़ होती है. डायमंड लाइट स्रोतों द्वारा मिलने वाले PETase के ब्लूप्रिंट का उपयोग करके वैज्ञानिकों ने एक सक्रीय अणु बनाया. जिसके परिणामम स्वरूप ये प्रोटीन बना जो सीधे तौर पर प्लास्टिक पर असर करता है. इस प्रोटीन में प्लास्टिक को पचाने की क्षमता का विकास करने के बाद जो एंजाइम बना था, वो भी Polyethylene Furandicarboxylate (PEF), जो प्लास्टिक का एक जैविक प्रकार था और इससे बनी बोतलों ने ही कांच की बीयर बोतलों की जगह ली थी.

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इस रिसर्च की रिपोर्ट्स National Academy Of Sciences की जर्नल प्रोसिडिंग्स में पब्लिश की गई है. Portsmouth के School Of Biological Sciences के Institute Of Biological And Biomedical Sciences के डायरेक्टर Prof. Mcgeehan ने कहा, 1960 में जब से प्लास्टिक प्रचलित हुई कुछ लोग इस बात का अंदेशा या पूर्वनुमा कर सकते थे कि आने वाले समय में विशाल प्लास्टिक अपशिष्ट पैच समुद्र पर तैरता पाया जा सकता है. या दुनिया भर में प्राचीन समुद्र तटों पर बहाया जा सकता था. हम सब प्लास्टिक की समस्या से निपटने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन वैज्ञानिक समुदाय जिन्होंने इस 'आश्चर्यजनक-सामग्री' को बनाया है, को अब इसका सटीक समाधान विकसित करने के लिए हर संभव तकनीक का उपयोग करना होगा.'

दुनिया भर में प्लास्टिक पॉल्यूशन की समस्या का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हर साल समुद्र में 80 लाख टन प्लास्टिक फेंका जा रहा है. जिसका परिणाम ये होता है कि प्रतिवर्ष 10 लाख से ज़्यादा पानी में रहने वाले जीवों की मौत प्लास्टिक से होने वाले इंफेक्शन के कारण हो जाती है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दुनिया भर में जितना प्लास्टिक इस्तेमाल होता है, उसका सिर्फ 9% प्लास्टिक ही रिसाइकिल हो पाता है.

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