कहते हैं, जब हम किसी से प्यार करते हैं तो उसकी कोई हद नहीं होती है, लेकिन वो हद होती क्या है ये जान लेना बहुत ज़रूरी है? क्योंकि कुछ लोगों के लिए प्यार की हद उसे जी जान से चाहना है, तो कुछ लोगों के लिए उस हद के मायने बहुत अलग हैं. वो एक न पर जिसे प्यार करने का दावा करते हैं पर उसकी ज़िंदगी बद से बदतर कर देते हैं. कभी एक लड़की प्यार के नाम पर तो कभी सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला लेने के लिए तेज़ाब से झुलसा दी जाती है. ये कैसा प्यार है और ये कैसे लोग हैं? जो प्यार के बदले प्यार नहीं, बल्कि ‘तेज़ाब’ देते हैं.

दरअसल, चार साल पहले 23 साल की रेशमा ख़ातून के चेहरे पर जब तेज़ाब फ़ेंका गया, तो उसे लगा चेहरे के साथ-साथ उसकी ज़िंदगी और सपने भी जल गए. मगर कहते हैं न कि ‘भगवान के घर देर है अंधेर नहीं’. ये बात तब साबित हुई, जब तेज़ाब से झुलसी रेशमा की शादी हुई. गुलाबी रंग के लहंगे में रेशमा बहुत ही ख़ूबसूरत लग रही थी. रेशमा का हाथ थामने वाले उस शख़्स को सलाम है, जिसने रेशमा की अंदरूनी ख़ूबसूरती को देखा.

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रेशमा बताती हैं, शादी से पहले वो बहुत असमंजस में थीं, कहीं वो अपने होने वाले पति अशोक की ज़िंदगी न बर्बाद कर दें उनसे शादी करके, लेकिन अशोक और उनके परिवार वालों ने रेशमा को हिम्मत दिलाई और पूरी शादी के दौरान अशोक ने जिस तरह उनके हाथ को थामा था उससे साबित हो गया कि बंधन जन्मों का है. रेशमा आगे कहती हैं कि वो अशोक को जीवनसाथी के रूप में पाकर बहुत ख़ुश हैं. साथ ही बताया कि हम दोनों ही अपने करियर के लिए बहुत गंभीर थे. शादी से पहले अशोक पंजाब के होशियारपुर में और मैं नोएडा में जॉब कर रही थी. तब हमने निर्णय लिया कि जिसदिन हम अपने-अपने करियर में सैटल हो जाएंगे, तब शादी कर लेगें और वो दिन आ चुका है, रेशमा की शादी 19 जनवरी 2019 को हुई है.

रेशमा ने TOI को बताया,

जब वो 2014 के दिसंबर को याद करती हूं, तो मैं सिहर जाती हैं. वो इंसान मुझे घूरता था मेरा पीछा करता था, फिर एक दिन उसने मेरे पास गाड़ी रोकी और मुझ पर तेज़ाब फेंक दिया. मेरे चेहरा गल रहा था, मुझे आज भी वो दर्द अंदर क हिला देता है. मेरी एक आंख की रौशनी चली गई. मगर मैं एक बात कहना चाहूंगी, ‘उसने मेरे चेहरे पर तेज़ाब फेंका है, मेरे सपनों पर नहीं’.
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रेशमा के लिए वो समय बहुत ही मुश्किल था, क्योंकि सभी हॉस्पिटल ने उसका केस को लेने से मना कर दिया था, इस पर रेशमा कार्रवाई करना चाहती थी, लेकिन उसकी मां के प्यार और जो लोग उसके साथ इस दुखद घड़ी में खड़े थे उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया. इसके बाद एसिड सर्वाइवर्स फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया की मदद से रेशमा का इलाज किया गया. इस दौरान उनकी 18 स्किन ग्राफ़्ट सर्जरी की गईं. रेशमा ने सिर्फ़ 19 साल की उम्र में घर छोड़ने के बाद, कंप्यूटर में अपनी पढ़ाई पूरी की और नोएडा के लेमन ट्री होटल में नौकरी की.

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रेशमा ने इस दौरान तेज़ाब पीड़िता प्रज्ञा सिंह के बारे में भी बताया, कि 2006 में उन पर तेज़ाब फेंका गया था, लेकिन उन्होंने कई संघर्षों से लड़कर अतिजीवन नाम की एक संस्था खोली. ये संस्था अब तक 200 एसिड अटैक पीड़िताओं की मदद कर चुकी है. साथ ही इस संस्था का काम पीड़िताओं को नई और ख़ुशहाल ज़िदंगी देना है.

रेशमा उन सभी लड़कियों के लिए मिसाल हैं, जो इस तेज़ाब की आग में जली हैं. ज़िंदगी छोटी नहीं है इसलिए उसे तेज़ाब में जलने न दें और अपने सपनों को उसी आग के साथ पूरा करिए जिस जज़्बे से आपने उस दर्द को सहा था.