अफ़ग़ानिस्तान जहां पर महिलाओं की वर्तमान स्थिति दयनीय है. आये दिन हम ख़बरों के माध्यम से अफ़ग़ानिस्तान की स्थिति के बारे में जानते हैं. ये तो आपको पता ही होगा कि अफ़ग़ानिस्तान एक कट्टरपंथी सोच से जकड़ा हुआ है. आपको बता दें कि अफ़ग़ानिस्तान में 1996 से लेकर 2001 तक तालिबानी शासन रहा और उस दौरान अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की स्थिति बेहद ही दर्दनाक थी. इतना ही नहीं वहां की औरतों पर शरिया क़ानून लगाकर कर उनकी ज़िन्दगी को बद से बदतर बना दिया गया.

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आज भी ऐसे माहौल में उनके लिए सांस लेना तक दूभर है. समाज और क़ानून की बेड़ियों में आज भी अफगानी महिलायें जकड़ी हुईं हैं. अब अगर स्थिति में कोई महिला संगीत के प्रति अपना रुझान दिखाए तो उसके लिए जीना मुहाल हो जाता है. आपको बता दें कि अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के लिए म्युज़िक एक ऐसा अपराध है, जो कट्टरपंथियों के लिए ना काबिले बर्दाश्त है. इन महिलाओं के जहन में कट्टरपंथियों का डर इस कदर बसा हुआ है कि वो स्कूल जाने की बात भी नहीं कर सकती हैं.

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लेकिन हाल ही में कुछ ऐसा हुआ जिसने इन कट्टरपंथियों के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा मारा है. बीती 19 और 20 जनवरी को स्विट्ज़रलैंड के दावोस में लोगों ने एक ऐसा नज़ारा देखा, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. जी हां, ये नज़ारा था अफ़ग़ानिस्तान के पहले महिला ऑर्केस्ट्रा की म्यूज़िकल परफोर्मेंस का. इन लड़कियों ने स्विट्ज़रलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के स्टेज पर परफॉर्म किया. इस इवेंट में करीब 3 हज़ार सीईओ और कई देशों के हेड मौजूद थे. इस परफोर्मेंस के दौरान इन अफगानी महिलाओं ने बिना डर के अपनी कला का प्रदर्शन किया. इन महिलाओं ने बांसुरी की सुरीली आवाज़, तबले की थाप, गिटार की धुन और वॉयलिन की मधुर तान के संगम से वहां का समां बांध दिया था. हालांकि, कट्टरपंथ के खिलाफ़ जाकर इन महिलाओं ने अपनी बहादुरी का परिचय दिया है. भले ही उनको जान से मारने की धमकियां ही क्यों न करना पड़े.

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35 महिलाओं के इस ऑर्केस्ट्रा ने इंटरनेशनल लेवल पर लाइव परफोर्मेंस देकर ये साबित कर दिया कि अब महिलाओं की ज़िन्दगी में भी बदलाव आ रहा है. हालांकि अब इनको धमकियां भी मिल रही हैं, मगर ये अफ़गान लड़कियां बिना डरे अपने सुरों के दम पर कट्टरपंथ के खिलाफ़ बिगुल बजा रही हैं. साथ ही अफ़ग़ानिस्तान की दूसरी महिलाओं के मन में हिम्मत की अलख जगाने का काम कर रही हैं.

आइये अब आपको बताते हैं इस बैंड के बारे में:

सबसे पहले आपको बता दें कि 35 अफगानी लड़कियों का ये अफ़ग़ानिस्तान का पहला औरतों ऑर्केस्ट्रा है. इस ऑर्केस्ट्रा का ‘ज़ोहरा’ रखा गया है. गौरतलब है कि इस बैंड की सभी लड़कियों की उम्र मात्र 13 से 20 साल है और ज़्यादातर गरीब परिवारों से हैं.

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‘ज़ोहरा’ ग्रुप को कंडक्ट करने वाली नेगिना खपलवाक कहती हैं कि, ‘इस प्रोग्राम के माध्यम से वो अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं की आजादी और तरक्की को समर्पित और उजागर करना चाहती हैं. देश की महिलायें कट्टरपंथियों के डर से गुलामों सी जिंदगी जीने को मजबूर हैं और ये बैंड इन महिलाओं के लिए एक मिसाल बनेगा.

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नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ म्यूजिक के फाउंडर और म्यूजिशियन डॉ. अहमद सरमस्त कहते हैं कि नेगिना खपलवाक अफ़ग़ानिस्तान की पहली ऑर्केस्ट्रा ‘ज़ोहरा’ की कंडक्टर हैं. ये अफ़ग़ानिस्तान के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है. वो भी ऐसे देश में जहां कट्टरपंथ ने अपनी जड़ें मजबूत कर रखी हैं.

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वहीं नेगिना कहती हैं कि है, ‘अफ़ग़ानिस्तान में कुछ परिवार ऐसे हैं, जो घर की बेटियों को स्कूल भी नहीं जाने देते. वहीं मेरी दादी ने मेरे पिता से कहा था अगर तुमने नेगिना से म्यूजिक स्कूल छुड़वाया तो तुम मेरे बेटे नहीं रहोगे. तब मेरी फैमिली ने अपना घर छोड़ दिया और काबुल में जाकर रहने लगे.’

इसके साथ ही नेगिना बताती हैं कि उस दौरान हमारे लिए जिंदगी इतनी आसान नहीं थी. शहर में नौकरी भी नहीं थी और दूसरी भी कई सारी परेशानियां मुंह बाहे खड़ीं थीं. वो फिर बताती हैं कि एक बार उनके चाचा ने धमकाया था और कहा था कि अगर तुम मुझे कहीं दिखाई दी तो मैं तुम्हें जान से मार दूंगा. तुम जो कर रही हो वो हमारे लिए बहुत शर्मनाक है.'
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वो आगे कहती हैं कि मैं हमेशा इस और्केस्ता से जुडी रहूंगी. म्युज़िक मेरी ज़िन्दगी है और इस क्षेत्र में आगे बढाने के लिए मेरे परिवार ने कई सारे समझौते तो किये ही हैं साथ ही बहुत ज़्यादा संघर्ष भी किये हैं. नेगिना का उद्देश्य है कि वो स्कॉलरशिप जीतें और देश से बाहर जाकर पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई करें. साथ ही इस ऑर्केस्ट्रा को भी कंडक्ट करें.

नेगिना कहती हैं, 'अगर आप खुद अपने पैरों पर खड़ी नहीं होती हैं तो आपका कोई फ्यूचर नहीं है. मैं दूसरी लड़कियों के लिए मार्गदर्शक बन जाना चाहती हूं. ताकि उन्हें कुछ करने का हौसला मिले.'

कैसा दुर्भाग्य है ये कि खुद को विकासशील देश बताने वाले अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानीयों से आजाद होने के 15 सालों के बाद भी लड़कियों को आज़ादी नहीं मिली है. आपको बता दें कि एक रिपोर्ट के अनुसार, 2016 में कुल 19 प्रतिशत लड़कियां ही स्कूल जा रही थीं. जो पूरी दुनिया में किसी भी देश से सबसे कम है.

अब देखिये ज़ोहरा बैंड का ये वीडियो:

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Source: chinadaily & reuters