हमारा बचपन बीता है हवाई जहाज़ को नीचे से Bye-Bye करते हुए. रॉकेट के गुज़रने के बाद वो आसमान की बनी सफ़ेद लकीर को हम बड़े आश्चर्य से देखते थे. कोई उसे रॉकेट का धुआं मानता था, तो कोई बर्फ़ की लकीर, पर ​हम में से शायद ही कोई जानता हो कि वो असलियत में होती क्या है.

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आसमान में बनने वाली इस सफ़ेद लकीर को Contrails कहते हैं. Contrails भी बादल ही होते हैं, पर वो आम बादलों की तरह नहीं बनते. ये हवाई जहाज़ या रॉकेट से बनते हैं और काफ़ी ऊंचाई पर ही बनते हैं.

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ज़मीन से करीब 8 किलोमीटर ऊपर और -40 डिग्री सेल्सियस में इस तरह के बादल बनते हैं. हवाई जहाज़ या रॉकेट के एग्जॉस्ट से Aerosols ​निकलते हैं. जब पानी की भाप इन Aerosols से साथ जम जाती है, तो Contrails बनते हैं.

हवाई जहाज़ के एग्जॉस्ट से भाप और कई ठोस पदार्थ निकलते हैं. इससे कार्बन डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड निकलती है. इसके अलावा इसमें से सल्फ़ेट और मीथेन जैसे हाइड्रोकार्बन भी निकलते हैं. इनमे से कुछ Contrails बनाने में मददगार होते हैं, बाकी सिर्फ़ प्रदूषण में सहयोग देते हैं.

कब देखे गए थे ये सबसे पहले?

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Contrails सबसे पहले दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 1920 में देखे गए थे. ये सबकी नज़रों में दूर से ही आ जाते थे. इस Contrail की वजह से न ही लड़ाकू पायलट पकड़े जाते थे, बल्कि कई खबरें आई थीं कि धुएं के कारण कई विमान आपस में टकरा गए क्योंकि उन्हें कुछ दिख नहीं रहा था.

आम तौर पर Contrails तीन तरह के होते हैं

1. Short Lived Contrails

ये Contrails कुछ ही समय में गायब हो जाते हैं, जैसे ही विमान जाता है ये भी लुप्त हो जाते हैं.

2. Persistent Contrails (Non-spreading)

ये Contrails लम्बी लाइन होती है, जो आसमान में विमान जाने के बाद तक दिखती हैं. इनके बनने का कारण हवा में नमी होती है.

3. Persistent Spreading Contrails

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ये Contrails हवा में फ़ैलने लगती है और ज़्यादा जगह घेरती है. ये भी नमी के कारण आसमान में काफ़ी देर तक दिखती है.

Contrails तेज़ हवा की वजह से अपनी जगह से खिसक भी जाती है, ज़रूरी नहीं है कि वो वहीं दिखे जहां से जहाज़ गुज़रा था.

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