"यार, इस हफ्ते कौन सी नई पिक्चर आ रही है?"

आपने अकसर अपने दोस्तों को यह सवाल पूछते हुए सुना होगा. हमारे देश में फिल्में हमारी सामाजिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है. हर फ्राइडे को अनगिनत नई फिल्में रिलीज़ होती हैं. दुनिया में सबसे ज़्यादा फ़िल्में भी इसी वजह से हमारे यहां ही बनती है. इन फिल्मों से हम इतना जुड़े हुए हैं कि हमारे सुख-दुख की भावनाओं को आधार भी यहीं फ़िल्में प्रदान करती है. इसी वजह से अकसर कुछ किरदार हमारे जहन में हमेशा के लिए बस जाते हैं.

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आपने 'अमर, अकबर, एंथोनी' फ़िल्म तो ज़रूर देखी होगी. साल 1977 में आई इस फ़िल्म का यह गाना भी खूब लोगों की जुबान पर चढ़ा था...'माय नेम इज़ एंथोनी गोंसाल्विस, मैं दुनिया में अकेला हूं.'

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पर फ़िल्म के बाकि दृश्यों और कथानकों की तरह इस गाने में आने वाला 'एंथोनी गोंसाल्विस' कोई काल्पनिक किरदार नहीं था. यह नाम एक असली किरदार की ज़िन्दगी से प्रेरित था. यह हकीकत में एक शख्स का नाम था, जिसे देखकर फ़िल्म में इसे रखा गया.

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आपकों शायद ही पता हो कि अमिताभ बच्चन के किरदार का फ़िल्म की शुरुआत में 'एंथोनी फर्नांडिस' रखा गया था. इस फ़िल्म का म्यूजिक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने कंपोज़ किया था. इस फ़िल्म में गानों को आनंद बक्शी ने लिखा. जब फ़िल्म के गानों को लेकर एक दिन ऐसे ही तीनों आपस में बातें कर रहे थे, तो उन्हें लगा, ''माय नेम इज़ एंथोनी फर्नांडिस' बोल गाने के अन्दर ज़्यादा सटीक नहीं बैठ रहे हैं. तब प्यारेलाल ने यह सुझाव दिया कि हमें इस गाने में 'एंथोनी गोंसाल्विस' नाम यूज़ करना चाहिए था.

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दरअसल देखा जाए तो यह सुझाव प्यारेलाल का अपने वायलिन टीचर को एक नजराना समर्पित करने की तरह था. प्यारेलाल के इस सुझाव को फ़िल्म के डायरेक्टर मनमोहन देसाई ने भी उसी समय मान लिया.

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एंथोनी गोंसाल्विस बॉलीवुड के पहले म्यूजिक अरेंजर थे. फिर भी उन्हें काफ़ी कम लोग ही जानते हैं. उन्होंने म्यूजिक कंपोजर मदन मोहन से लेकर एस.डी. बर्मन के साथ काम किया था. गाने के दो अन्तरों के बीच आने वाले म्यूजिक का ट्रेंड भी एंथोनी गोंसाल्विस ही बॉलीवुड में लेकर आए थे. इसके साथ ही सबसे पहले इन्होंने ही म्यूजिशियनस के लिए स्टाफ नोटेशन्स बनाए थे. जिससे गाने में किस तरह के म्यूजिक का इस्तेमाल किया जाए इस बात में मदद मिल सके.

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भारतीय सिनेमा की म्यूजिक इंडस्ट्री में इतना बड़ा योगदान देने के बाद भी अधिकतर लोग एंथोनी गोंसाल्विस के नाम से अनजान थे. प्यारेलाल का अपने गुरु के नाम को अमर बनाने का यह तरीका देखा जाए तो सच में शानदार था. आपको बता दें, एंथोनी गोंसाल्विस ने 1960 तक म्यूजिक इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया था. 2012 में एंथोनी गोंसाल्विस का निधन हो गया था, पर इस गाने कि वजह से वो हमेशा याद किये जाएंगे.

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इन्सान को अपने काम की पहचान एक न एक दिन मिलती ज़रूर है. एंथोनी गोंसाल्विस की कहानी इस कहावत को सही साबित करती है. तो, आप भी अपना काम शिद्दत से करते रहिए, नाम तो एक दिन हो ही जाना है.

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