कैसे बनते हैं महिला नागा साधु? जानिए कितनी कठिन होती है इसकी प्रक्रिया

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How To Become a Female Naga Sadhu: भारत में प्राचीनकाल से ही इंसान दो तरह की ज़िंदगी जीता आ रहा है. एक वो ज़िंदगी जिसे हम सांसारिक सुखों के साथ जीते हैं, जबकि दूसरी वो ज़िंदगी जो सांसारिक सुख को त्यागकर जीनी पड़ती है. सांसारिक सुख त्यागने वाली इसी ज़िंदगी को ही ‘संन्यास’ लेना कहा जाता है. भारत में साधु-संतों की प्रथा सदियों से चली आ रही है. एक ज़माना था जब भारत को साधु-संतों का देश भी कहा जाता था. आज भी देश में साधु-संतों की संख्या 40 से 50 लाख के क़रीब है. लेकिन महिला नागा साधु बनने की प्रक्रिया बेहद कठिन होती है.

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महिला नागा साधु

भारत में साधु-संतों का जीवन इतना रोचक है कि आम लोगों के मन में हमेशा से इनके बारे में जानने की जिज्ञासा होती है. नागा साधु भी साधु-संतों की एक ऐसी बिरादरी है. नागा साधु भी दो तरह के होते हैं पुरुष नागा साधु और महिला नागा साधु. बात यदि महिला नागा साधु की करें तो मामला और भी रोचक बन जाता है.

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दरअसल, भारत में कम ही लोगों को जानकारी है कि पुरुष नागा साधु की तरह महिला नागा साधु भी होती हैं. पुरुषों की तरह ही महिलायें भी सांसारिक जीवन त्यागने के बाद नागा साधु बनती हैं. महिला नागा साधु बनने के नियम भी उतने ही कड़े होते हैं जितने पुरुष नागा साधुओं के होते हैं. चलिए आज यही जानते हैं कि आख़िर महिला नागा साधु कैसे बनती हैं, क्या वो पुरुष नागा साधुओं की तरह बिना वस्त्रों के रहती हैं?

महिला नागा साधु बनने की प्रक्रिया बेहद कठिन

बताया जाता है कि महिला नागा साधु बनने की प्रक्रिया बेहद कठिन होती है. इस दौरान उन्हें कई कठिन तपस्याओं से गुजरना पड़ता है. नागा साधु बनने के बाद वो अपना पूरा जीवन ईश्वर को समर्पित कर देती हैं और दुनिया के सामने बेहद कम ही नज़र आती हैं. महिला नागा साधु अखाड़े, जंगल, गुफ़ाओं में रहना पसंद करती हैं. साथ ही इनको कई सालों तक भयंकर तपस्या करनी पड़ती है. इनकी तपस्या इतनी कठिन होती है कि इन्हें आप केवल कुंभ के दौरान ही देख पाते हैं.

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कैसे बनते हैं महिला नागा साधू?

महिला नागा साधु बनने के लिए पूर्व महिलाओं को भी पूरी तरह से अपना सांसारिक जीवन त्यागन पड़ता है. सिर मुंडवाने के बाद उन्हें अपना पिंडदान करना होता है. इसके बाद उन्हें पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन भी करना पड़ता है. इस प्रक्रिया में 6 से लेकर 12 साल तक ब्रह्मचर्य का पालन करने और कुंभ स्नान के बाद ही महिलाओं को गुरुओं द्वारा नागा साधु बनने की अनुमति मिलती है. पुरुष नागा साधुओं को जहां वस्त्रों के बिना संन्यास लेना पड़ता है. वहीं महिला नागा साधुओं को वस्त्र के साथ संन्यास लेने की अनुमति तो होती है, लेकिन उन्हें केवल गेरुआ रंग पहनने की ही छूट होती है.

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इन नियमों का करना पड़ता है पालन

महिला नागा साधु के ‘पंथ’ में शामिल होने की प्रक्रिया में 4 से 4 साल लग जाते हैं. नागा साधु बनने के बाद उन्हें कठिन साधना करनी होती है. पुरुष नागा साधुओं की तरह ही उन्हें भी शरीर पर धुनि और माथे पर हमेशा तिलक धारण करना पड़ता है. शहर और बस्ती से दूर अपने लिए ख़ुद ही निवास स्थान खोजना पड़ता है. सुबह उठकर नदी में स्नान करने के बाद रात के सोने तक भगवान शिव की आराधना में पूरी तरह समर्पित रहना पड़ता है.

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महिला नागा साधुओं को सन्यासी के अलावा न तो किसी को प्रणाम करने की आज्ञा होती है और न ही किसी की निंदा करने की. दीक्षा लेने वाली हर महिला नागा साधु को इसका पालन करना पड़ता है. महिला नागा साधुओं को माई, नागिन और अवधूतानी नामों से संबोधित किया जाता है. वहीं दूसरी साध्वियां उन्हें ‘माता’ कहकर बुलाती हैं. पुरुष नागा साधुओं की तरह ही महिला नागा साधु भी तांत्रिक क्रिया करती हैं.

भारत में ‘जूना अखाड़ा’ सबसे बड़ा अखाड़ा माना जाता है. साल 2013 में पहली बार प्रयागराज में ‘माई बाड़ा अखाड़े’ को शामिल किया गया था. ये वही अखाड़ा है जिसमें सबसे अधिक महिला नागा साधु रहती हैं.

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