चीरहरण ही नहीं इसलिए भी द्रौपदी ने 13 सालों तक नहीं बांधे थे बाल, पढ़ें महाभारत का ये पूरा क़िस्सा

J P Gupta

Why Draupadi Never Tied Her Hair For 13 Years: महाभारत एक भारतीय महाकाव्य है जिसके बारे में हर किसी को कहानी या फिर किसी टीवी सीरियल के रूप में पता है. जिन्होंने इसे नहीं पढ़ा उनको एक बार ज़रूर इसे पढ़ना भी चाहिए.

इसमें कई दिलचस्प क़िस्से हैं. ऐसा ही एक क़िस्सा जुड़ा है पांडवों की पत्नी द्रौपदी से. उन्होंने एक प्रण के चलते पूरे 13 साल तक बाल नहीं बांधे थे, ऐसा क्यों किया था द्रौपदी ने और इसके पीछे की क्या स्टोरी है, चलिए जानते हैं.

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इसकी शुरुआत हुई पांडवों और कौरवों के बीच एक पासे के खेल से. इसमें युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और उनकी पत्नी द्रौपदी पर दांव खेला. पांडवों ने में सब कुछ खो दिया जो उनके कब्जे में था. इसका मतलब ये था कि पांडव अब कौरवों के गुलाम थे. कौरवों की जीत के साथ दुर्योधन ने दुशासन को द्रौपदी को दरबार में घसीटने का आदेश दिया.

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दुशासन के ऐसा करने पर द्रौपदी ने विरोध किया. दुशासन याचना करती हुई द्रौपदी के बालों को पकड़ा और उसे घसीटते हुए राजदरबार में ले गया. ये भी कहा जाता है कि उस समय द्रौपदी रजस्वला थी.

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अपमान को और बढ़ाने के लिए उसने शाही दरबार के सामने उसको निर्वस्त्र करना शुरू कर दिया. हालांकि, पांडवों और परिवार के अन्य लोगों की निष्क्रियता पर आज कई लोग सवाल उठाते हैं, मगर कहानी ये कहती है कि वे सभी हार से बंधे हुए थे, असहाय थे और शर्म से अपना सिर झुकाए खड़े थे.

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द्रौपदी ने अपने 5 पतियों और परिवार के बुजु़र्गों की ओर देखा, जो केवल दर्शक बनकर रह गए थे. उसने न्याय के लिए खड़े न होने के लिए भीख मांगी, अनुरोध किया और सबको फटकार लगाई.

लेकिन कोई भी उसके बचाव में नहीं आया. जब उसकी चीख बहरे कानों पर नहीं पड़ी, तो उसने भगवान कृष्ण से प्रार्थना की. दुशासन ने उसकी साड़ी को जितना खींचा, वो उतनी ही खिंचती चली गई! उसे उसका अंत कभी नहीं मिला.

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द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में असफल रहने पर दुर्योधन ने उसकी बायीं जांघ थपथपाई और उसे अपनी गोद में बैठने का आदेश दिया. इससे द्रौपदी क्रोधित हो गई और उसने दुर्योधन को टूटी जांघ के साथ मरने का श्राप दिया.

इस अपमान से क्रोधित होकर उसने अपने बालों को तब तक नहीं बांधने की कसम खाई, जब तक कि वो अपने बालों को अपने साथ दुर्व्यवहार करने वालों के खू़न से नहीं धोती.

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इन अनैतिक कार्यों को देखकर पांडव भीम अपने क्रोध को और अधिक नहीं रोक सके. वो खड़ा हुआ और द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए कौरवों पर टूट पड़ा. बाद में युद्ध में भीम ने दुशासन की हत्या करके द्रौपदी के अपमान का बदला लिया. गौर करें कि भीम ने उस वक्त दुर्योधन के जांघ पर प्रहार किया था.

इससे हमें सीख मिलती है कि हमें किसी की सनकी इच्छाओं को पूरा करने से पहले उसके कारण होने वाले सभी परिणामों के बारे में सोच लेना चाहिए.

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