जानिए केवल सिनेमाघरों से ही नहीं, इन जगहों से भी कमाती हैं बॉलीवुड फ़िल्में करोड़ों रुपये

Maahi

बॉलीवुड (Bollywood) के लिए साल 2022 अब तक बेहद ख़राब रहा है. एक के बाद एक पिटती फ़िल्मों ने बड़े-बड़े बॉलीवुड स्टार्स का धुआं निकाल दिया है. साल में 2022 में रिलीज़ हुई The Kashmir Files, Gangubai Kathiawadi और Bhool Bhulaiyaa 2 को छोड़ दें तो बाकी सभी फ़िल्मों ने बॉक्स ऑफ़िस पर पानी तक नहीं मांगा. आमिर ख़ान, अक्षय कुमार और अजय देवगन सरीखे वो स्टार्स जिनकी फ़िल्में रिलीज़ से पहले ही एडवांस बुकिंग से 100 करोड़ रुपये कमा लिया करती थीं वो अब टोटल 50 करोड़ रुपये भी मुश्किल से कमा पा रही हैं. 

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साल 2020 में कोरोना महामारी के चलते जारी लॉकडाउन के कारण बॉलीवुड को अरबों का नुक़सान झेलना पड़ा था. लॉकडाउन खुलने के बाद बॉलीवुड स्टार्स ने इस उम्मीद में धड़ाधड़ अपनी फ़िल्मों की शूटिंग निपटाई ताकि 1 साल से बंद पड़े सिनेमाघरों फ़िल्में रिलीज़ करके करोड़ों कमाएंगे, लेकिन हुआ इसके ठीक उलट. दर्शकों की OTT के प्रति बढ़ती दिलचस्पी और बॉलीवुड स्टार्स के बॉयकॉट की वजह से उनकी फ़िल्में सिनेमाघरों में 1 हफ़्ते भी नहीं टिक सकी. आजकल बॉलीवुड का कोई भी तड़का दर्शकों को लुभा नहीं पा रहा है. 

साल 2022 में ये फ़िल्में हो चुकी हैं फ़्लॉप

साल 2022 में अब तक ‘दो बारा’, ‘लाल सिंह चढ्ढा’, ‘रक्षाबंधन’, ‘गुड लक जैरी’, ‘एक विलेन रिटर्न्स’, ‘शमशेरा’, ‘शाबाश मिठू’, ‘अटैक’,  ख़ुदा हाफ़िज़-2′, ‘सम्राट पृथ्वीराज’, ‘जनहित में जारी’, ‘अनेक’, ‘मेजर’, ‘ओम’, ‘धाकड़’, ‘झुंड’, ‘रनवे 34’, ‘हीरोपंती-2’, ‘जयेशभाई जोरदार’, ‘बच्चन पांडे’, ‘जर्सी’, ‘बधाई दो’, ‘बंटी और बबली-2’ और ‘राधे श्याम’ समेत कई अन्य फ़िल्में फ़्लॉप हो चुकी हैं. फ़्लॉप फ़िल्मों की लंबी होती फ़ेहरिस्त के बाद बॉलीवुड के एंडगेम की भविष्यवाणियां भी की जाने लगी हैं. 

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इन अटकलों से इतर एक सवाल ये भी उठता है कि आख़िर लगातार फ़्लॉप फ़िल्मों के बावजूद इनमें पैसा लगाने वाले प्रोड्यूसर और काम करने वाले सितारों की सेहत पर कोई फ़र्क़ क्यों नहीं दिखता? दूसरे बिजनेस की तरह किसी प्रोड्यूसर के दिवालिया होने, बड़े सितारों के कंगाल होने की कोई ख़बर क्यों नहीं आती? इस सवाल का जवाब फ़िल्मों की कमाई के गणित में ही छुपा है.

रिलीज़ से पहले ही निकल जाती है लागत

मशहूर ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श के मुताबिक़, बॉलीवुड में हमेशा से ही फ़िल्म ने कितना बिज़नेस किया या कलेक्शन क्या रहा, उसी के आधार पर फ़िल्में फ़्लॉप या हिट होती हैं. इस दौरान जो फ़िल्में फ़्लॉप होते हैं वो ‘नॉन थिएट्रिकल राइट्स’, ‘डिजिटल राइट्स’, ‘म्यूजिक राइट्स’ और ‘सैटेलाइट राइट्स’ के ज़रिए अपना इनवेस्टमेंट रिकवर कर लेती हैं. वहीं रिलीज़ से पहले फ़िल्मों के राइट्स बेचकर प्रोड्यूसर्स अपना पैसा रिकवर कर लेते हैं, लेकिन जिन्हें फ़िल्म बेची है उन्हें भारी नुक़सान होता है. 

ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श ने रणबीर कपूर स्टारर ‘Shamshera’ का उदाहरण देते हुए कहा कि, ये फ़िल्म थिएट्रिकल डिज़ास्टर साबित हुई, लेकिन रिलीज़ से पहले ही Yash Raj Films ने प्री सेल्स के ज़रिए अपना इनवेस्टमेंट रिकवर कर लिया था. इसी तरह ‘Thugs of Hindostan’ भी डिजास्टर साबित हुई थी, लेकिन Yash Raj Films ने सैटेलाइट बिज़नेस से इसकी रिकवरी कर ली थी. प्री-सेलिंग का यही फ़ायदा होता है कि प्रोड्यूसर की रिकवरी हो जाती है.

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एक्टर और प्रोड्यूसर नहीं, डिस्ट्रीब्यूटर होता है कंगाल

ट्रेड एनालिस्ट कोमल नाहटा के मुताबिक़, आज के दौर की बिग बजट फ़िल्मों की नाकामयाबी का नुक़सान एक्टर और प्रोड्यूसर नहीं, बल्कि डिस्ट्रीब्यूटर को झेलना पड़ता है. सबसे ज़्यादा नुक़सान सैटेलाइट राइट, डिजिटल राइट ख़रीदने वालों और डिस्ट्रीब्यूटर्स को झेलना पड़ता है. उदहारण के तौर पर आमिर ख़ान की फ़िल्म लाल सिंह चड्ढा को ही ले लीजिए. फ़िल्म के फ़्लॉप होने से न तो आमिर और न ही इसके प्रोड्यूसर को नुक़सान झेलना पड़ा. इसका असल नुक़सान वायाकॉम 18 को भुगतना पड़ रहा है. बड़ी फ़िल्मों के साथ अक्सर यही सब होता है. 

बॉलीवुड में बड़े बजट की फ़िल्मों के मेकर्स को पता होता है कि फ़िल्म को टेबल प्रॉफ़िट तो मिल ही जाएगा, बाद में रोने वाला रोएगा. इसीलिए आज बॉलीवुड फ़िल्मों की कहानियों में पहले वाली वो मेहनत नहीं दिखती है. प्रोड्यूसर को लगता है फ़ायदा तो मिल ही रहा है, फिर क्यों इतनी मेहनत करें. इतना सब होने बाद भी बॉलीवुड में आये दिन साउथ की रीमेक फ़िल्में बन रही हैं. वहीं साउथ की फ़िल्में बॉलीवुड दर्शकों को काफ़ी पसंद आ रही हैं. RRR, पुष्पा और KGF2 इसका उदाहरण हैं. 

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ब्रांड डील और सिंडिकेशन से कमाई

दुनिया के अन्य देशों में रिलीज़ के अलावा बॉलीवुड फ़िल्में ‘रीमेक राइट्स और सिंडिकेशन राइट्स’ से भी मोटा पैसा कमाती हैं. इस दौरान कुछ फ़िल्मों के पास  ब्रैंडिंग के राइट्स भी होते हैं, इनमें अमूमन पैसे का ट्रांज़ेक्शन कम होता है, लेकिन यहां बार्टर सिस्टम में ब्रांड्स फ़िल्म के ज़रिए ख़ुद की मार्केटिंग कर लेते हैं, यहां पर मेकर्स की थोड़ी सी सेविंग हो जाती है. सिंडिकेशन राइट्स दूरदर्शन पर फिल्म चली गई या फिर बाहर के देशों जहां फ़्री टू एयर चैनल्स हैं या फिर यू-ट्यूब चैनल हैं, वहां चल गई. ये भी एक ज़रिया है, जहां से बॉलीवुड फ़िल्में कमाई करती हैं.

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फ़िल्म कहां से कितने प्रतिशत की कमाई करती है

बॉलीवुड फ़िल्में (Bollywood Films) 50 से 60 प्रतिशत कमाई बॉक्स ऑफ़िस से करती हैं. इसके बाद डिजिटल राइट्स से क़रीब 20 प्रतिशत की कमाई हो जाती है. इसके अलावा म्यूजिक राइट्स से 7 से 10 प्रतिशत, सैटेलाइट राइट्स से 10 प्रतिशत और बाकी के 2 से 3 प्रतिशत अन्य राइट्स से कमाई करती हैं. अगर फ़िल्म हिट हो जाती है, तो फिर पूरा डायनैमिक चेंज हो जाता है. अगर फ़िल्म ने कमाल का बिज़नेस कर दिया तो सैटेलाइट राइट्स भी बढ़ जाता है. ओटीटी में भी हिट फ़िल्म की वैल्यू ज़्यादा हो जाती है. फ़िल्म की सक्सेस और स्टार वैल्यूज से भी राइट्स के प्रतिशत तय किए जाते हैं. 

फ़िल्म की कामयाबी के बाद बड़े पैमाने पर ब्रांड्स भी इससे जुड़ते हैं, जिससे प्रोड्यूसर को भी ख़र्च बचाने में मदद मिल जाती है. फ़िल्म की शुरूआत में जब आप किसी ब्रांड्स का नाम या Logo देखते हैं, तो यहां से भी प्रोड्यूसर को अच्छी ख़ासी रक़म मिल जाते है. इस दौरान फ़ूड पार्टनर प्रमोशन से लेकर शूटिंग के दौरान क्रू मेंबर्स को केटरिंग फ़्री में देते हैं. होटल पार्टनर आउटडोर लोकेशन में स्टार्स और कास्ट को फ़्री स्टे की सुविधा देते हैं. 

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पिछले कुछ सालों में OTT Platform गेम चेंजर बनकर उभरा है. लेकिन अब यहां भी बदलाव देखने को मिल रहा है. दरअसल, ओटीटी ने अपना रोल रिवर्स कर लिया है. पहले जहां ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स बिग बजट बॉलीवुड फ़िल्मों (Bollywood Films) को अपने स्ट्रीम में लेने की होड़ मचाते थे, अब वो फ़िल्म की थिएटर रिलीज़ का इंतजार करने लगे हैं. ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म जहां पहले फ़िल्मों पर बेधड़क 100 से दो 200 करोड़ तक लगा देते थे, अब उन्होंने भी हाथ खींच लिए हैं. इस वजह से भी डिस्ट्रीब्यूटर को भारी नुक़सान झेलना पड़ रहा है.

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