जानिए कौन थीं गौरा देवी, जिन्होंने शुरू किया दुनिया का सबसे बड़ा ‘चिपको आंदोलन’

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ब्रिटिशकाल से ही उत्तराखंड (Uttarakhand) कई तरह की त्रासदियों से गुजरा है. लेकिन समय के साथ पुराने ज़ख़्म को भूलकर देश के इस पहाड़ी राज्य ने आगे बढ़ना बेहतर समझा. आज उत्तराखंड शिक्षा, स्वास्थ्य, टूरिज़्म और धार्मिक महत्व के नज़रिए से देश के प्रमुख राज्यों में से एक है. देवभूमि उत्तराखंड ने राजनीति, खेल, शिक्षा, डिफ़ेंस, सिनेमा, लिटरेचर और आर्ट एंड कल्चर के क्षेत्र में देश को कई महान हस्तियां दी हैं. हेमवती नंदन बहुगुणा, पंडित गोविंद वल्लभ पंत, सुमित्रा नंदन पंत, सुंदरलाल बहुगुणा और जनरल बिपिन रावत चंद नाम हैं. इन्हीं में से एक नाम गौरा देवी (Gaura Devi) का भी है, जिन्हें चिपको आंदोलन (Chipko Movement) की वजह से जाना जाता है. 

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क्या था चिपको आंदोलन?

उत्तराखंड अपने कई तरह के आंदोलनों के लिए मशहूर है. इनमें से सबसे बड़ा अलग उत्तराखंड की मांग को लेकर था. इसके अलावा 1921 का कुली बेगार आंदोलन, 1930 का तिलाड़ी आंदोलन और 1984 का नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन. लेकिन इनमें से सबसे अलग था ‘चिपको आंदोलन’. ये एक ऐसा आंदोलन था जिसने उत्तराखंड विश्व पटल पर प्रसिद्ध बना दिया था. ये एक ऐसा आंदोलन था जो प्रकृति (पेड़ पौधों) को बचाने के लिए शुरू किया गया था. 

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दरअसल, सन 1973 में उत्तराखंड के चमोली ज़िले के रैणी, लाता और मलारी गांव के पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए एक आंदोलन की शुरुआत हुई थी. इसकी नींव सुंदरालाल बहुगुणा, कामरेड गोविंद सिंह रावत, चंडीप्रसाद भट्ट और श्रीमती गौरा देवी रखी थी. सरकार सड़क निर्माण के लिए 2400 पेड़ों की कटाई करना चाहती थी, लेकिन प्रकृति प्रेमी और गांव वाले इसके घोर विरोध में थे. 

बात सन 1976 की है. सरकार ने चमोली ज़िले के तीन गावों रैणी, लाता और मलारी के जंगलों को काटने का आदेश दिया. ये ख़बर सुनते ही गांववाले सड़कों पर उतर आये. इस दौरान गांव के पुरुषों ने पूरी मुस्तैदी से मोर्चा संभाला हुआ था, लेकिन इसी बीच सरकार ने कूटनीतिक चाल चलते हुए गांववालों का ध्यान भटकाने के लिए उनके खेतों का मुआवजा देने का ऐलान किया जो 1962 के बाद सड़क बनने के कारण उनसे छिन गए थे. मुआवजे की ख़बर सुनकर मलारी, लाता तथा रैणी के सभी पुरुष मुआवजा लेने चमोली चले गए. 

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कौन थीं गौरा देवी?

इस बीच सरकार के आदेश पर मज़दूर पेड़ों की कटाई के लिए जंगल की ओर बढ़ने लगे. लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें रोकने के लिए गांव में कोई पुरुष नहीं था. ऐसे में रैणी गांव की प्रकृति प्रेमी गौरा देवी (Gaura Devi) ने ज़िम्मेदारी अपने हाथों में ले ली और इस तरह से 24 मार्च, 1976 को इसके विरोध में ‘चिपको आंदोलन’ की शुरुआत हुई. आंदोलन की अगुवाई करते हुए गौरा देवी 27 अन्य महिलाओं को लेकर इलाक़े के क़रीब 2400 पेड़ों की कटाई को रोकने में जुट गईं. इस दौरान उन्हें डराने और धमकाने की कोशिशें भी की गईं, लेकिन गौरा देवी डटी रहीं. इस बीच सभी महिलाएं पेड़ों को बचाने के लिए उन पर चिपक गईं. इनका कहना था कि पेड़ों को काटने से पहले आरी उनके शरीर पर चलेगी. 

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 गौरा देवी का असल संघर्ष 

गौरा देवी (Gaura Devi) का जन्म साल 1925 में उत्तराखंड के चमोली ज़िले के लाता गांव में हुआ था. उनका विवाह केवल 12 साल की उम्र में रैंणी गांव के मेहरबान सिंह से हुआ था. गौरा देवी ने छोटी सी उम्र से ही गृहस्थ जीवन में लग गई थीं. खेती, पशुपालन, ऊन के कारोबार से परिवार का गुज़ारा चलता था. लेकिन गौरा देवी का असल संघर्ष 22 साल की उम्र में विधवा होने के बाद शुरू हुआ. पति उन्हें और ढाई साल बेटे को छोड़ हमेशा के लिए इस दुनिया से चल बसे. 

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गौरा देवी (Gaura Devi) इसके बाद अकेले ही अपने बेटे के साथ-साथ अपने बुज़ुर्ग सास-ससुर की सारी ज़िम्मेदारी उठाई. परिवार को संभालने से लेकर खेतों में काम करने तक गौरा ने ने सब कुछ अकेले ही किया. पहाड़ी इलाक़ों में आज भी खेतों में हल जुतवाने का काम पुरुष ही करते हैं. ऐसे में गौरा देवी को अपने खेत जुतवाने के लिए गांव के पुरुषों से विनती करनी पड़ती थी. इतनी मुश्किलों के बावजूद गौरा ने कभी हार नहीं मानी.

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‘महिला मंगल दल’ की अध्यक्ष

कुछ साल बाद सास-ससुर के चल बसने से गौरा देवी और उनका बेटा चन्द्र सिंह अकेले रह गये. गौरा देवी ने कड़ी मेहनत कर अपने बेटे को घर की ज़िम्मेदारियां सँभालने योग्य बनाने के बाद उसकी शादी भी कारवा दी. घर में बहु के आने के बाद ज़िम्मेदारियां कम हुईं तो गौरा देवी (Gaura Devi) ने अपना समय गांव के नेक कामों में लगान शुरू कर दिया. गांव में बढ़ती लोकप्रियता के चलते कुछ ही साल में वो अपने गांव के ‘महिला मंगल दल’ की अध्यक्ष बन गईं. उत्तराखंड के कई ग्रामीण इलाक़ों में आज भी ‘महिला मंगल दल’ सक्रिय हैं. 

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प्रकृति प्रेमी गौरा देवी (Gaura Devi) ने एक साक्षात्कार में पेड़-पौधों के प्रति अपना प्रेम दिखाने हुए कहा था कि, ये जंगल हमारी मां के घर जैसा है. यहां से हमें फल ,फूल, सब्जियां और सांस लेने के लिए शुद्ध हवा मिलती है. अगर ये पेड़-पौधे ये काटने लगेंगे तो निश्चित ही बाढ़ आएगी

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भारतीय इतिहास में ‘चिपको वुमन’ के नाम से मशहूर गौरा देवी (Gaura Devi) आज भले ही हमारे बीच ना हों, लेकिन ‘चिपको आंदोलन’ से वो हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गयीं. इस आंदोलन के ज़रिए उन्होंने मानवता को प्रकृति प्रेम की जो सीख दी वो हम सभी के लिए प्रेरणादायक है. गौरा देवी ने जुलाई 1991 में 66 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया था.

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