अतीत की वो छोटी घटना जिससे पैदा हुआ था Cotton Swab को बनाने का ख़्याल. जानिए इसका दिलचस्प इतिहास

Nripendra

History of Cotton Swab : इतिहास गवाह है कि बहुत-सी ज़रूरत की चीज़ों के आविष्कार के वक़्त ये नहीं सोचा गया था कि ये आगे चलकर बड़े-बड़े कामों में अहम भूमिका निभाएंगी. Cotton Swab के साथ भी कुछ ऐसा ही है, जो आज कोविड संक्रमण की जांच में सबसे अहम भूमिका निभा रहा है. वैसे क्या आप जानते हैं ये हमारे बीच कब से अस्तित्व में है? अगर नहीं, तो आइये इस लेख में आपको बताते हैं कि कब और कैसे Cotton Swab का आविष्कार हुआ था. साथ में और भी कई संबंधित बातें इस लेख में आपको बताई जाएंगी.   

ज़िंदगी का एक हिस्सा बन चुका है 

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Cotton Swab कोई नई चीज़ नहीं है कि बल्कि ये आधुनिक ज़िंदगी का एक हिस्सा बन चुका है. घर से लेकर अस्पतालों व मेडिकल लैब तक में इसका इस्तेमाल किया जाता है. घर में इसका इस्तेमाल अमूमन कान साफ़ करने व महिलाएं मेकअप के वक़्त करती हैं. वैसे बता दें कि कॉटन स्वाब से कान साफ़ नहीं करना चाहिए.   

ख़ूनी को पकड़ने में भी अहम भूमिका 

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मामूली-सा दिखने वाला कॉटन स्वाब ख़ूनी को पकड़ने में भी फ़ॉरेंसिक विशेषज्ञ की मदद करता है. दरअसल, इसके ज़रिए संदिग्ध व्यक्ति के DNA के सैंपल लिए जाते हैं ताकि क्राइम सीन पर मिले सैंपल से उसे मैच कराया जा सके. इसके बाद इसकी रिपोर्ट बनाई जाती है जो आरोपी को पकड़ने और उसे सज़ा देने में मदद करती है. बता दें कि फ़ॉरेंसिक विशेषज्ञ Moistened Cotton Swabs का इस्तेमाल DNA सैंपल के लिए करते हैं.  

लकड़ी से प्लास्टिक तक का सफ़र 

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पहले जो कॉटन स्वाब इस्तेमाल में लिए जाते थे वो लकड़ी के होते थे यानी सूईनुमा तीली पर रुई लगी होती थी. लेकिन, आज लड़की के साथ-साथ प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाने लगा है. इन्हें बनाने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है. वैसे आजकल सस्ते कॉटन स्वाब भी उपलब्ध हैं जिसकी गुणवत्ता सही नहीं होती और इन्हें इस्तेमाल भी नहीं करना चाहिए. 

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क्या है कॉटन स्वॉब का इतिहास?  

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कॉटन स्वाब के आविष्कारक का नाम Leo Gerstenzang बताया जाता है. Leo Gerstenzang पोलैंड के रहने वाले थे जिन्होंने 1920 के दशक में पहला कॉटन स्वाब बनाया था. इसके आविष्कार का ख़्याल एक छोटी घटना से जुड़ा है. दरअसल, माना जाता है कि एक बार लियो ने अपनी पत्नी को तीली पर रुई लपेटकर बच्चे का कान साफ़ करते देखा था. ये दृश्य देखकर ही उन्हें कॉटन स्वाब बनाने का ख़्याल आया था. 

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इसके बाद इन्होंने “Baby Gays” नाम से कॉटन स्वाब को एक उत्पाद के रूप में बनाया. इन्होंने अपनी एक कंपनी भी बना ली थी जिसका नाम था Leo Gerstenzang Infant Novelty Company. 1926 तक इसे “Baby Gays” कहा गया और बाद में इसका नाम Q-Tips कर दिया गया था. वहीं, 1948 तक इसकी मांग काफी बढ़ गई थी, जिससे बाद इसका बड़े स्तर पर निर्माण किया गया था. इसके बाद 1950 के दशक में ये मेकअप की दुनिया में प्रवेश कर गया था. इसके बाद इसका इस्तेमाल विभिन्न क्षेत्रों में किया जाने लगा और वर्तमान में ये एक महत्वपूर्ण टूल के रूप में जाना जाता है.  

आम कॉटन स्वाब से कितना अलग है कोविड की जांच वाला स्वाब  

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ज़रूरत के हिसाब से विभिन्न कामों के लिए कॉटन स्वाब को अलग-अलग तरीक़े से बनाया गया है. वहीं, कोविड की जांच में इस्तेमाल होने वाला और कान साफ़ करने व मेकअप में इस्तेमाल होने वाला स्वाव काफी अलग होता है. दरअसल, कोविड संक्रमण की जांच के सैंपल के लिए Nasopharyngeal Swab का इस्तेमाल किया जाता है. इस जांच में जो स्वाब इस्तेमाल होते हैं वो लंबे होते हैं ताकि नाक के ज़रिए नाक और गले के पीछे से सैंपल लिया जा सके. 

इस जांच के लिए CDC और WHO ने Synthetic Fiber Swabs के लिए कहा है. वहीं, कोविड के बढ़ते मामले और जांच की वजह से Synthetic Fiber Swabs की कमी को पूरा करने के लिए Cotton-tipped plastic swabs भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं, जिन्हें लगभग सिथेंटिक फ़ाइबर स्वॉब के बराबर माना गया है. 
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