‘बुरा न मानो होली है’ ठीक है, पर इन 8 चीज़ों को हम चाहकर भी अच्छा नहीं कह सकते

Abhay Sinha

होली के दिन लोग ‘डू मी ए फ़ेवर लेट्स प्ले होली’ कहते हैं और हम ‘उफ़्फ़ ये होली हाय ये होली’ कर छाती पीटते हैं. गुब्बारे भरने वाले दिन हम ख़ुद भरे बैठे रहते हैं. पता नहीं क्यों, पर हम सालों से होलियारा फ़ील नहीं कर पाते. दिक्कत हमें रंगों से नहीं है, बल्कि रंगबाज़ों से है. वो रंगबाज़, जिन्होंने होली के त्योहार को हुल्लड़बाज़ी में बदल दिया है.

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ऊपर से अग़र इन्हें टोक दो, तो बत्तीसी फाड़कर ‘बुरा न मानो होली है’ बोलकर हमारे चपक जाएंगे. फिर मिलो तीन बार गले. लेकिन अब हमसे बर्दाश्त नहीं हो रहा. क्योंकि होली पर होने वाली कुछ चीज़ें ऐसी हैं, जिन्हें हम चाहकर भी अच्छा नहीं बोल सकते.

तो बस, आज हमने क्रोध के नशे में फ़्रस्ट्रेशन की उल्टियां करने का तय कर लिया है. झेलिए.

1. पूरे शरीर में घुसेड़-घुसेड़ कर रंग लगाना

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ये अलग क्रेज़ है. आदमी शराफ़त से रंग लगवाने को तैयार है, लेकिन नहीं. पहले तो कपड़े फाड़ो, फिर शरीर में हर जगह घुसेड़-घुसेड़ के रंग लगाना शुरू कर देते हैं. अबे मतलब, एक इंसान का चबूतरे जैसा मुंह छोड़कर उसका आंगन जैसा शरीर रंगने में क्या मज़ा मिलता है, ये समझ के परे है. 

2. शराब पीकर हुड़दंगई

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देखो, तुम देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के लिए शराब पीते हो, तो कोई बात नहीं. लेकिन अर्थव्यवस्था जितना गिरो तो नहीं. बेमतलब सड़कों पर हुड़दंगई करते फिरते हो. गाड़ियों के कांच तोड़ दिए, लौंडे पेल दिए, सड़क पर ख़ुद ही पसर गए. ये सब क्या है? झूम बराबर झूम के माननीय सदस्यों को ये सब शोभा थोड़ी ही देता है.

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3. हफ़्ते भर पहले से ही निकलना मुश्किल कर देना

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ये बड़ी समस्या है. ख़ासकर छोट शहरों में ज़्यादा, क्योंकि यहां गलियां बहुत होती हैं. पता नहीं, कौन, कब, कहां से ससुरा गुब्बारा-पिचकारी चला दे, कुछ कहा नहीं जा सकता. हफ़्ते भर पहले से नासपीटे बवाल काटना शुरू कर देते हैं.

4. जानवरों को ज़बरदस्ती रंग देना

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एक बात समझ लो कि होली त्योहार है अच्छाई का, इसलिए कुछ राक्षसी हरकतों का त्याग दो. क्योंकि आप होली खेलने के बाद नहा लेते हैं, लेकिन जिन जानवरों को आप सड़क पर जबरन रंगते हैं, वो ऐसा नहीं कर पाते. कैमिकल वाले रंग उन्हें नुक़सान पहुंचाते हैं. 

5. रंग धोने के बाद चेहरे पर निकलने वाले दाने

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ये अलग बवाल है. दिनभर तो होली खेलने में बड़ा मज़ा आता है, लेकिन जब रगड़-रगड़कर रंग छुड़ाने बैठते हैं, तब असली मौत आती है. घिस-घिसकर ससुरी खाल तक छिल जाती है. फिर गुलाबी चेहरे पर जो उभरे दाने खिलते हैं, उसे देख हफ़्ते-दो हफ़्ते तक शक्ल मुरझाई नज़र आती है.

6. जीजाओं का कल्चर के नाम पर सालियों का शोषण

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संस्कृति और घटियापन में फ़र्क होता है. लेकिन जीजाओं को ये बात समझ नहीं आती. होली आते ही इन पर भोजपुरी गीतों का ऐसा ख़ुमार चढ़ता है कि वो सालियों को अपने बाप की बपौती समझ बैठते हैं. कोई टोक दे, तो साली आधी घरवाली का शिगूफ़ा छोड़ देते हैं. बस इतना समझ लें कि जिस ठरक को आप संस्कृति का जामा पहनाते हैं, वो दरअसल एक लड़की का खुलेआम शोषण है.

7. अमिताभ बच्चन का ‘रंग बरसे’ गाना

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भइया अब इस गाने से हमको भयंकर नफ़रत हो चली है. अब तो लगने लगा है कि ये गाना इंसानी वजूद से पहले से बजता चला आ रहा है. सुन-सुनकर इतना पक चुके हैं कि अब बर्दाश्त के बाहर हो गया है. ऊपर से अमिताभ बच्चन की फटी आवाज़ को जो महाफटे स्पीकर का साथ मिलता है, वो तो कलेजे पर बम की तरह गिरती है. सुकून तो मानो एकदम छितरा जाता है.

8. होली खेलने के बाद होने वाली थकावट

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आह! चाहें नशा किए हो या नहीं, घंटा फ़र्क नहीं पड़ता. होली के बाद आदमी थकावट में ऐसा झूमता है कि बिस्तर पर आप लेटते नहीं, बल्कि वो ख़ुद-ब-ख़ुद आपको अपनी गोद में ले बैठता है. कमर-पीठी सब ऐंठ जाती है. 

तो भइया, ये कुछ चीज़ें हैं, जिनसे हमें परेशानी होती है. बाकी ज़्यादा ही उल्टियां मार दिए हों, तो ग़ुस्सा मत करिएगा. काहे कि ‘बुरा न मानो होली है.’ Happy Holi!

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