ये IPS ऑफ़िसर बेड़िया जनजाति का शोषण देख ना पाए, देखिए अब कैसे संवार रहे हैं उन लोगों का जीवन

J P Gupta

IPS Officer Helping Bedia Community: मध्य भारत ख़ासकर मध्य प्रदेश में एक ख़ास प्रकार की जनजाति पाई जाती है. ये मुग़ल काल से ही गाना-बजाने और लोगों का मनोरंजन करने के लिए जानी जाती है. ये कोई और नहीं बेड़िया जनजाति है, मगर आज़ादी के बाद इनके पास कोई काम न बचा तो इन्हें मजबूरन वेश्यावृत्ति का काम करना पड़ा.

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इस जनजाति की अधिकतर औरतें इस काम संलिप्त हैं, यही नहीं लड़कियों को भी मजबूरन यही काम करना पड़ता है. इनकी भावी पीढ़ी का भविष्य उज्जवल हो और वो सेक्स वर्कर के रूप में काम न करें, इसकी पुरजोर कोशिश करने में जुटे हैं एक IPS ऑफ़िसर. 

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ये इनके प्रयासों का ही फल ही कि बहुत से लोग इस कम्यूनिटी में ये काम छोड़ अब पढ़ लिख रहे हैं और नया रोज़गार कर रहे हैं. इन अफ़सर की ही प्रेरणादायक कहानी हम आपके लिए लेकर आए हैं. 

लगभग 5000 बच्चों की बनाई लाइफ़

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इस नेक अफ़सर का नाम है वीरेंद्र मिश्रा (Veerendra Mishra). इन्होंने अपने संगठन संवेदना (Samvedna) के ज़रिये एम.पी. के 60 गांवों में रहने वाली इस जनजाति के क़रीब 5000 बच्चों का जीवन संवारा है. इन्होंने इसकी शुरुआत साल 2005 में की थी. एक बार जब वीरेंद्र जी की पोस्टिंग राजगढ़ में थी तब उन्होंने इस कम्यूनिटी के बच्चों के साथ होते भेदभाव को देखा था.

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सेक्स वर्कर बनने को मजबूर थीं बच्चियां

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इनकी जाति की वजह से लोग इनके साथ बुरा व्यवहार करते थे और जल्दी कोई काम पर भी न रखता. इसलिए लड़कियां बड़ी होते ही सेक्स वरकर का काम करने को मजबूर हो जाती और लड़के उनके लिए ग्राहक लाने का काम करते. बहुत से बच्चों को तो ये तक नहीं पता था कि उनके पिता कौन हैं, इन बच्चों का शोषण हो रहा था. इनकी दुर्दशा देख वीरेंद्र जी ने इनकी मदद करने की ठानी और शुरू किया संवेदना नाम का संगठन.

बच्चों को वाजिब करियर चुनने में करते हैं मदद

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पहली बार इन्होंने 13 बच्चों को इस दलदल से निकाल उन्हें पढ़ना लिखना सिखाया था. इनकी पढ़ाई से लेकर जॉब दिलाने तक की ज़िम्मेदारी संगठन ने ही संभाली थी. ये संगठन बहुत से लोगों द्वारा दिए गए दान के पैसे से चलता है. संगठन बच्चों के हुनर को पहचान उन्हें वाजिब करियर चुनने में मदद करता है. वीरेंद्र जी इसकी मदद से बेड़िया कम्यूनिटी के लोगों को अपने बच्चों को पास भेजने के लिए करने के लिए वर्कशॉप भी चलाते हैं. 

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फ़िलहाल ये भोपाल में बतौर AIG (Madhya Pradesh State Industrial Security Force) तैनात हैं. इनका कहना है कि अभी इनके संगठन में कॉलेजों में 26 और स्कूलों में 37 छात्र हैं. वो इन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं. 

आगे भी जारी रखेंगे प्रयास

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वीरेंद्र जी का कहना है-’हमारा विचार अवसर पैदा करना है. जब आप अवसर पैदा करते हैं तो आप उम्मीद जगाते हैं और जब आप उम्मीद जगाते हैं तो हर कोई अपनी सीमाओं को लांघने लगता है. उन्हें अपनी मदद ख़ुद करनी होगी. हम सिर्फ़ सुविधा प्रदान करने वाले हैं. हम इस जाति की नई पीढ़ी को सेक्स वर्कर का काम करने से रोकने और पढ़ लिख कर आगे बढ़ाने के लिए आगे भी प्रयास करते रहेंगे.’

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वीरेंद्र जी की ये मुहिम रंग भी लाने लगी है. इनके संगठन में पढ़ रहे बहुत से बच्चे अब पुलिस अफ़सर, इंजीनियर और डॉक्टर बनने का सपना देख रहे हैं. वीरेंद्र जी का मानना है कि हर नागरिक को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे समुदायों के बच्चों को बेहतर शिक्षा मिले और भेदभाव से मुक्त अच्छा जीवन मिले.

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