प्रेम को लेकर भी बहुत क्रांतिकारी थे भगत सिंह, सुखदेव को लिखी ये चिट्ठी इस बात का सबूत है

Sanchita Pathak

सिर्फ़ 23 साल की उम्र में फांसी के फंदे को गले लगा लिया था भगत सिंह ने. शहीदी के लगभग 10 दशकों बाद भी भगत सिंह न सिर्फ़ भारतीयों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणस्रोत हैं.


भगत सिंह, सुखदेव थापर और शिवराम राजगुरू को एक साथ फांसी हुई थी. सुखदेव थापर को एक चिट्ठी में भगत सिंह ने प्रेम पर अपने विचार लिखे थे. बहुत कम लोग जानते होंगे कि क्रांतिकारी विचारों वाले भगत, प्रेम के एहसास का बहुत सम्मान करते थे.  

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पेश है उनकी चिट्ठी– 

प्रिय भाई,


जब तक तुम्हें ये चिट्ठी मिलेगी मैं बहुत दूर जा चुका होऊंगा. मैं तुम्हें बता दूं कि सभी ऐश-ओ-आराम और अच्छे लम्हों के होते हुए भी, मैं इस लंबे सफ़र के लिए तैयार हूं. आज तक मेरे दिल में एक बात चुभ रही है कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे ग़लत समझा और मुझ पर बहुत बड़ा इल्ज़ाम लगाया- कमज़ोर पड़ने का इल्ज़ाम. आज मुझे इस बात का पूरा यक़ीन है कि वो और कुछ नहीं, एक ग़लतफ़हमी थी. मेरा खुलकर बात करना और मेरे इक़बालिया बयान को मेरी कमज़ोरी समझा गया. मैं हम लोगों में से किसी से भी कमज़ोर नहीं हूं, भाई. मैं साफ़ दिल से जा रहा हूं. क्या तुम भी अपना दिल साफ़ कर सकते हो? तुम्हारी बहुत कृपा होगी. ध्यान रखना कि तुम जल्दबाज़ी में कोई कदम न उठाओ, आराम से अपना काम करते रहना. तुम्हारी जनता के प्रति कई ज़िम्मेदारियां हैं और अपना काम करते हुए तुम वो पूरा कर सकते हो. एम.आर.शास्त्री मुझे सही लगता है. इस रास्ते के अंधेरे भविष्य को देखते हुए अगर वो इस पर चलना चाहे, तो उसे रणभूमि में लाने की कोशिश करो. जैसा तुमको सही लगे, करो. भाई, अब हमें ख़ुश होना चाहिए.  

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जिस बात पर हमारी बहस चल रही थी उस पर मैं अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता. मैं आशा और आकांक्षाओं से भरा हुआ हूं और वक़्त आने पर सब कुछ क़ुर्बान कर सकता हूं और यही असली बलिदान है. ये बातें किसी भी आदमी के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वो मनुष्य हो. जल्द ही तुम्हें इसका सबूत मिल जाएगा. किसी शख़्स के चरित्र के बारे में बात-चीत करते हुए तुमने पूछा था ‘क्या प्रेम ने कभी किसी पुरुष की सहायता की है?’ आज मैं उस सवाल का जवाब दूंगा. हां Mazzini की सहायता की थी. तुमने पढ़ा ही होगा कि अपनी पहली विद्रोही असफ़लता के बाद वो अपने मृत साथियों की याद बर्दाशत नहीं कर सके थे. अपनी बुरी हार के बाद या तो वो पागल हो जाते या फिर आत्महत्या कर लेते, पर उनकी प्रेमिका की चिट्ठी ने उन्हें जीवित रखा. उस एक चिट्ठी से वो किसी एक से नहीं, सबसे मज़बूत बन गए. 

जहां तक प्रेम की नैतिकता का सवाल है, मैं ख़ुद कहता हूं कि वो और कुछ नहीं बस जुनून है, जानवरों वाला नहीं, इंसानों वाला, मिठास वाला. प्रेम कभी जानवरों वाला जुनून नहीं हो सकता. प्रेम हमेशा इंसान के चरित्र को ऊपर उठाता है. फ़िल्मों में दिखने वाली लड़कियों को प्रेम नहीं कहा जा सकता. वो बस पशुओं की तरह जुनून दिखाते हैं. सच्चा प्रेम कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता. जब उसे आना होता है, आता है. कोई नहीं कह सकता कब. ये प्राकृतिक है. मैं तुम्हें बता रहा हूं कि एक जवान लड़का और लड़की एक-दूसरे से प्रेम कर सकते हैं और अपने प्रेम के ज़रिए ही जुनून से ऊबर कर अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं.


मैं यहां एक चीज़ साफ़ कर देना चाहता हूं कि जब मैंने प्रेम को इंसानों की कमज़ोरी कहा, तो मैंने वो उस स्तर पर पहुंचे किसी साधारण इंसान के लिए नहीं कहा था. वह एक बहुत ही आदर्श स्थिति है जहां मनुष्य प्रेम-घृणा आदि पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपने कार्यों का आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा. अभी के दौर में ये कोई बुरी बात नहीं है, ये तो मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक है. मैंने एक इंसान के, एक इंसान के प्रति ही प्रेम की निंदा की है. मनुष्य को प्रेम की भावना सिर्फ़ एक इंसान तक ही सीमित नहीं रखनी चाहिए, बल्कि इसे सार्वभौमिक बनाना चाहिए. मुझे लगता अब मैंने अपनी भावनाएं स्पष्ट कर दी हैं.  

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मैं तुमसे एक और बात कहना चाहता हूं कि क्रांतिकारी सोच के होते हुए हम नैतिकता के संबंध में आर्यसमाजी ढंग की कट्टर सोच नहीं बना सकते. हम क्रांति को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, पर असल ज़िन्दगी में शुरुआत में ही थर-थर कांपते हैं. दिमाग़ में कोई ग़लत भावना न लिए हुए मेरा तुमसे निवेदन है कि तुम्हें अपना अति-आदर्शवाद कम करना होगा. जो पीछे छूट जाएंगे और मेरी जैसी बीमारी का शिकार होंगे, उनके प्रति कठोर न होना. उनकी निंदा करके उनकी परेशानियां मत बढ़ाना. उन्हें तुम्हारी सहानुभूति की ज़रूरत है. क्या मैं तुमसे ये आशा रख सकता हूं कि किसी के प्रति कोई द्वेष न रखते हुए, तुम उनसे तब सबसे ज़्यादा हमदर्दी दिखाओ, जब उन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी? पर तुम्हें तब तक इन बातों का एहसास नहीं होगा जब तक तुम ख़ुद इसके शिकार नहीं होगे. रही बात इसकी कि मैंने ये सब क्यों लिखा तो मैं बस खुलकर बात करना चाहता था. मैंने अपने दिल की सारी बातें कर ली.


तुम्हारे लिए सफ़लता और ख़ुशहाल जीवन की कामना के साथ 

तुम्हारा 
बी.एस. 

ये चिट्ठी 5 अप्रैल, 1929 को लिखी गई थी. इतनी-सी आयु में संसार और इंसान से जुड़ी भावनाओं का इतना ज्ञान असंभव-सा लगता है… लेकिन भगत सिंह थे भी एक असंभव से इंसान. 

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