छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़ी वो ऐतिहासिक घटना, जिसके बारे में जानकर हर भारतीय को गर्व होगा

J P Gupta

भारत के वीर शासकों में से एक छत्रपति शिवाजी महाराज की आज जयंती है. मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले शिवाजी महाराज की गिनती दुनिया के सबसे श्रेष्ठ राजाओं में होती है. उनकी कहानियां आज भी हमें प्रेरणा देती हैं. उनसे जुड़ी एक ऐसी ही गौरव गाथा हम आपके लिए लेकर आए हैं. इसके बारे में हर हिंदुस्तानी को ज़रूर जानना चाहिए. 

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बात उन दिनों की है जब शिवाजी महाराज की सेना ने मुग़लों की नाक में दम कर रखा था. 1650 के आस-पास उन्होंने मुग़लों से कई युद्ध किए जिनमें कुछ में मुग़लों को हार का सामना करना पड़ा, तो कई का नतीजा नहीं निकला. शिवाजी के बढ़ते प्रताप से जलने लगा था बीजापुर का एक शासक जिसका नाम था आदिलशाह. उसे अपनी गद्दी छिन जाने का डर था. इसी भय के चलते उसने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ़्तार कर लिया.

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हालांकि, इससे पहले वो शिवाजी को बंदी बनाने की कोशिश कर चुका था जिसमें वो नाक़ामयाब रहा था. अपनी हार से खिसियाए आदिलशाह ने उन्हें छोड़ उनके पिता पर अपना ध्यान क्रेंदित कर लिया. उसने मौक़ा मिलते ही शाहजी को बंदी बना लिया, इससे शिवाजी को बहुत गुस्सा आया. शिवाजी ने एक रणनीति बनाई और उसके किले पर छापामारी कर अपने पिता को कैद से आज़ाद करा लिया. साथ में पुरंदर और जावेली के किलों पर फतेह हासिल कर उन पर कब्ज़ा कर लिया.

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इस घटना के बाद मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने जयसिंह और दिलीप ख़ान को एक संधि करने का न्यौता लेकर भेजा. इसे पुरंदर संधि के नाम से जाना जाता है. इसके अनुसार, शिवाजी को 24 किले मुग़लों को सौंपने थे. दक्षिण में पैर पसारने के बाद शिवाजी महाराज से औरंगज़ेब उखड़ा हुआ था. इसका बदला लेने के लिए शिवाजी महाराज के इलाके में लूट-पाट शुरू कर दी. इस ख़ून-खराबे को रोकने के लिए ही शिवाजी महाराज इस संधि के लिए राज़ी हुए और उन्हें 24 किले सौंप दिए.

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मगर यहां भी औरंगजेब ने शिवाजी के साथ विश्वासघात किया. शिवाजी के संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद औरंगज़ेब ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया. आगरा की जिस जेल में उन्हें रखा गया था वहां पर हज़ारों सैनिकों का पहरा था. मगर शिवाजी अपने साहस और बुद्धि के दम पर उसे चकमा देकर वहां से फरार होने में कामयाब हो गए. इसके बाद शिवाजी ने अपनी सेना के पराक्रम के दम पर फिर से औरंगज़ेब से अपने 24 किले जीत लिए. इसके बाद उन्हें छत्रपति की उपाधि मिली थी.

3 अप्रैल 1680 में बीमारी के चलते उनकी मृत्यु हो गई थी. उनकी साहसी कहानियां आज भी हम भारतवासियों को प्रेरणा और साहस देती हैं. 


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