स्वदेशी आंदोलन ने रखी थी भारतीयों के इस सबसे चहेते बिस्किट ब्रैंड की नींव

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घर के आंगन की वो चहचहाहट, अम्मा की केतली वाली चाय और साथ में पार्ले-जी बिस्किट का तड़का आज भी हमें अच्छे से याद हैं वो दिन. अम्मा की गोद में बैठकर कच्चे दांतों से पार्ले-जी बिस्किट का आनंद लेना हो या फिर स्कूल में दोस्तों से छिपकर इसे खाना. पार्ले-जी के एक-एक बिस्किट के साथ हमारी हज़ारों यादें जुड़ी हुई हैं. इस बिस्किट के साथ हम यादों की न जाने कितनी गठरियां पीछे छोड़ चले हैं. 

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पार्ले-जी का नाम सुनते ही आज भी हमें अपना बचपन याद आ जाता है. जब सुबह स्कूल न जाने की जिद पर अड़े बच्चों को मां पार्ले-जी देने का ऑफ़र देकर रवाना किया करती थीं. टिफ़िन में पार्ले-जी आते ही हम झट से स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाया करते थे. क्योंकि ये बिस्किट आज भी हमारे शरीर में ग्लूकोज़ का काम कर रहा है. दरअसल, ये चीज़ें शहरों में तो कम लेकिन गांवों में ज़्यादा देखने को मिलती थी. क्योंकि दूर-दराज़ के गावों में पार्ले जी बिस्किट इतनी आसानी से मिल नहीं पाता था. 

आख़िर क्या है पार्ले कंपनी का इतिहास?

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आज़ादी से पहले भारतीय बाज़ारों में अधिकतर विदेशी चीजें ही बेची जाती थीं. इनके दाम इतने ज़्यादा होते थे कि आम भारतीय इनको ख़रीद नहीं पाते थे. क्योंकि इनका सीधा फ़ायदा अंग्रेज़ों को होता था. उस समय भारतीय बाज़ारों में अंग्रेज़ कैंडी लाये थे, मगर वो सिर्फ़ अमीरों तक ही सीमित थी. ये बात रेशम व्यापारी मोहनलाल दयाल को पसंद नहीं आई और उन्होंने ठान लिया कि वो आम भारतीयों के लिए भारत में बनी कैंडी लाएंगे ताकि वो भी इसका स्वाद चख सकेंगे.

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साल 1928 में मोहनलाल ने जर्मनी जाकर कैंडी बनाना सीखा और साल 1929 में 60 हज़ार रुपये में कैंडी मेकर मशीन ख़रीदकर भारत लौट आये. इसी साल उन्होंने मुंबई के पास स्थित इर्ला-पार्ला इलाक़े में एक पुरानी फ़ैक्ट्री ख़रीदी. पार्ला इलाक़े में होने के कारण इसका नाम ‘पार्ले’ रखा गया. इसके बाद फ़ैक्ट्री में सबसे पहले जो चीज बनाई वो ‘ऑरेंज कैंडी’ थी. लोगों को ये कैंडी बेहद पसंद आई और इसके बाद पार्ले ने कई अन्य कैंडी भी बनाईं. इस तरह लोगों का पार्ले कंपनी के प्रति प्यार बढ़ने लगा. 

कैसे हुई पार्ले-जी की शुरुआत?

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कैंडी की सफ़ल शरुआत के बाद मोहनलाल को अंग्रेज़ों की एक और बात खटक गयी. वो थी चाय के साथ बिस्किट खाना, मगर ये बिस्किट भी सिर्फ़ अमीरों तक ही सीमित थे. इसके बाद साल 1939 में उन्होंने ‘पार्ले-ग्लूको’ बिस्किट की शुरुआत की. गेहूं से बने इस बिस्किट के दाम इतने कम थे कि हर भारतीय चाय के साथ इसे खा सकता था. कम दाम और बेहतरीन स्वाद के कारण जल्द ही ये बिस्किट लोगों की पहली पसंद बन गया. भारतीय ही नहीं, बल्कि ब्रिटिशर्स भी पार्ले-ग्लूको का स्वाद लेने लगे थे. बस यहीं से पार्ले कंपनी को भारतीयों का प्यार बेशुमार प्यार मिलने लगा. 

आम लोगों से लेकर सेना के जवानों की पसंद था पार्ले-जी

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कुछ ही समय बाद द्वितीय विश्व युद्ध का बिगुल बज गया. भारत के हज़ारों सैनिक भी ब्रिटेन की तरफ़ से लड़ने के लिए भेजे गए थे. कहा जाता है कि उस दौरान आपातकालीन स्थिति में भारतीय सैनिकों के लिए पार्ले-ग्लूको बिस्किट के पैकेट भेजे गए थे. 

गेहूं की कमी के चलते प्रोडक्शन बंद करना पड़ा

साल 1940 तक पार्ले-ग्लूको एक बड़ा ब्रांड बन चुका था, लेकिन देश में गेहूं की कमी के चलते द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कंपनी को अपना प्रोडक्शन बंद करना पड़ा था. करीब 10 साल तक भारतीयों को पार्ले-ग्लूको बिस्किट मुश्किलों से मिल पा रहा था. आज़ादी के कुछ साल बाद तक भी पार्ले कंपनी को इतना रॉ-मटीरियल मिल नहीं रहा था कि वो प्रोडक्शन जारी रख सकें. ऐसे में कुछ वक़्त के लिए उन्हें अपना पूरा प्रोडक्शन रोकना पड़ा. प्रोडक्शन रुकने के कुछ समय बाद ही लोगों को पार्ले-ग्लूको की कमी सताने लगी. कंपनी ने लोगों से वादा भी किया कि जैसे ही हालात सुधरेंगे प्रोडक्शन फिर से शुरू कर दिया जाएगा. बंटवारे के कुछ समय बाद हालात सुधरे और लोगों को एक बार फिर से पार्ले-ग्लूको मिलने लगा.

‘कॉपीराइट’ न होने से बदला था नाम

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दरअसल, कुछ साल तक प्रोडक्शन नहीं होने के कारण अन्य दूसरे ब्रांड पार्ले-ग्लूको के नाम का इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए करने लगे थे. क्योंकि पार्ले के पास इसका कोई कॉपीराइट नहीं था इसलिए कोई भी इसे इस्तेमाल कर सकता था. पार्ले की देखा देखी मार्केट में कई सारी कंपनियों ने ग्लूको बिस्कुट बनाने शुरू कर दिए थे, लेकिन जो क़ामयाबी पार्ले ग्लूको बिस्किट को मिली थी, वो किसी अन्य को नहीं मिल पाई. 

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इस दौरान हर कंपनी अपने बिस्किट के नाम के पीछे ग्लूको या ग्लूकोज शब्द का इस्तेमाल करने लगी थीं. लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि वो आख़िर कौन सा बिस्किट ख़रीदें. इसकी वजह से भी पार्ले-ग्लूको को काफ़ी नुकसान हुआ था. इसी लिए मज़बूरन साल 1982 में कंपनी ने पार्ले-ग्लूको का नाम बदलकर ‘पार्ले-जी’ कर दिया. इसके बाद सेल बढ़ने के लिए पार्ले-जी ने साल 1982 में अपना पहला टीवी कमर्शियल निकाला. टीवी कमर्शियल के बाद इसे तेजी से ख़रीदा जाने लगा.

पार्ले-जी बना देश का ‘नेशनल बिस्किट’

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साल 1990 तक पार्ले-जी देश का ‘नेशनल बिस्किट’ बन चुका था. उस वक़्त इंडियन मार्केट में कई अन्य ब्रांड भी मौजूद थे, लेकिन लोगों की जुबान पर इनमें से कोई भी राज नहीं कर पाया. आंकड़ों की मानें, तो साल 1991 में बिस्किट मार्केट का 70% हिस्सा पार्ले-जी के पास था. बदलते वक़्त के साथ पार्ले-जी ने भी कई नई चीजों को अपनाना शुरू कर दिया.

बिक्री कम हुई तो ‘शक्तिमान’ का मिला साथ

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भारत में टीवी कमर्शियल की शुरुआत के साथ ही साल 1998 में पार्ले-जी बिस्किट की सेल में भारी कमी आने लगी. उस दौर में शक्तिमान सबके पसंदीदा सुपरहीरो थे. माना जाता है कि शक्तिमान की कही बात बच्चे झट से मान जाते थे. ऐसे में कंपनी ने बच्चों के बीच इस बिस्किट को बढ़ावा देने के लिए इसे ‘शक्तिमान’ के साथ जोड़ने का फ़ैसला लिया. इसके बाद एक बार फिर से लोगों के बीच पार्ले-जी बिस्किट ख़रीदने की होड़ लग गई. सिर्फ़ विज्ञापन ही नहीं, अपनी आकर्षक लाइन्स के लिए पार्ले-जी काफी पसंद किया गया. 

 जैसे, G माने Genius, स्वाद भरे-शक्ति भरे पार्ले-जी, हिन्दुस्तान की ताकत और रोको मत, टोको मत आदि.

पार्ले-जी के आगे कोई टिक नहीं पाया

साल 2000 के बाद पार्ले कंपनी इतनी तेजी से आगे बढ़ने लगी कि अन्य ब्रांड उसके आगे टिक ही नहीं पाए. न सिर्फ़ भारत में, बल्कि विदेशों में भी पार्ले-जी की मांग होने लगी. यही कारण है कि साल 2003 में पार्ले-जी को दुनिया में सबसे ज़्यादा बेचा जाने वाला बिस्किट घोषित किया गया. वक़्त बीतने के साथ-साथ पार्ले-जी दुनिया का बड़ा बिस्किट ब्रांड बन गया.

पार्ले कंपनी सिर्फ़ पार्ले-जी बिस्किट से ही कमाती है हज़ारों करोड़

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कंपनी के मुताबिक़, साल 2012 में सिर्फ़ बिस्किट से उनकी क़रीब 5 हज़ार करोड़ की सेल हुई थी. तब से अब तक पार्ले-जी के प्रोडक्शन पर कुछ खास फ़र्क नहीं पड़ा है. आंकड़ों की माने तो पार्ले हर साल क़रीब 14,600 करोड़ बिस्किट बनाती है. ये बिस्किट दुनियाभर के 6 मिलियन स्टोर्स में भेजे जाते हैं. जिस कारण पार्ले कंपनी हर साल क़रीब 16 मिलियन डॉलर का रेवेन्यू जेनरेट करती है. साल 2009-10 के आंकड़ों पर गौर करें तो पारले-जी की बिक्री दुनिया के चौथे सबसे बड़े बिस्कुट उपभोक्ता मुल्क चीन से भी ज़्यादा है.

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मार्किट में भले ही कितने ही बदलाव क्यों न आ जाएं, लेकिन पार्ले-जी की साख पर इसका कोई असर नहीं पड़ता. आज भी इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती ही जा रही है. पार्ले जी को हमारे बाप-दादाओं ने खाया, हमने खाया और अब हमारे बच्चे भी खा रहे हैं, क्योंकि पार्ले-जी कल भी हिट था, आज भी हिट है और हमेशा हिट ही रहेगा. 

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