अब भी नहीं समझ आया है तो ये कहानी साबित कर देगी कि ‘सारी बात मन की है’

Puneet

कहानी थोड़ी पुरानी ज़रूर है पर इसकी आत्मा आज भी बिलकुल ताज़ा है. दो बौद्ध भिक्षु पास के गांव से भिक्षा लेकर वापस मठ की ओर लौट रहे थे. उनमे से एक बूढ़ा भिक्षु था जिसे काफी अरसा हो गया था संन्यास लिये और दूसरा एक युवा भिक्षु था. उसने हाल ही में संन्यास लिया था. दोनों शांत भाव से अपने रास्ते पर चलते जा रहे थे.

रास्ते में एक नदी पड़ती थी जिसको पार करके जाना पड़ता था. आजकल बरसात के कारण वो उफान पर थी. जब वे दोनों उसके तट पर पहुंचे तो उन्हें वहां एक स्त्री दिखाई दी जो नदी पार करने की कोशिश कर रही थी. वह इतनी सुन्दर थी कि किसी अप्सरा से कम न प्रतीत होती थी. पानी से भीगे उसके वस्त्रों के नीचे से उसके सुकोमल अंग झांक रहे थे. स्वर्णाभूषण उसके रूप को अनुपम दिव्यता प्रदान कर रहे थे. जब भिक्षु उसके पास पहुंचे तो उस स्त्री ने उनको प्रणाम किया और बताया कि वो यहां के राजा की कन्या है जो शिकार खेलते हुए भटक गई है. नदी के उस पार उसका नगर है. उसने विनती की कि ‘कृपा करके मुझे इस नदी को पार करवा दें. नदी का वेग इतना ज़्यादा है कि मैं अपने शरीर को संभाल नहीं पा रही हूं’.

दोनों भिक्षुओं ने नदी की ओर देखा. किनारे के उबड़-खाबड़ पत्थर, तल की चिकनाहट और ऊपर से धारा का वेग. कुल मिलाकर उसे पार कर पाना किसी कोमल मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन था. परन्तु समस्या सिर्फ यही एक नहीं थी, समस्या एक और भी थी. भगवान् बुद्ध ने भिक्षुओं को नारी से दूर रहने को कहा था. इसीलिए वो उसको पार नहीं करवा सकते थे. नारी स्पर्श से तो अब तक संचित समस्त साधना एक क्षण में नष्ट हो सकती थी. बूढ़ा भिक्षु अभी ये सब सोच विचार ही रहा था कि युवा भिक्षु आगे बढ़ा. उसने उस स्त्री को अपने कंधे पर उठाया और नदी में उतर गया. बूढ़ा भिक्षु ये सब देखकर हक्का-बक्का रह गया. वो भी उसे विस्मय से देखता हुआ पीछे-पीछे नदी पार करने लगा. युवा भिक्षु दूसरे किनारे पर पहुंच गया. उसने स्त्री को अपने कंधे से उतारा और उसे विदा दी. वह स्त्री भी उनको प्रणाम करके चली गई. युवा भिक्षु शांत भाव से मठ की ओर बढ़ने लगा…

पीछे-पीछे बूढ़ा भिक्षु भी तट पर पहुंचा. पहुंचते ही उसने युवा सन्यासी को उपेक्षा के भाव से देखा. बूढ़े भिक्षु की आंखों में क्रोध और दुर्भावना थी. उसने युवा भिक्षु की तरफ मुंह फेरा और शीघ्रता से मठ की ओर पांव बढ़ाने लगा. आवेग में चलते-चलते वह विचार कर रहा था कि ‘देखो, एक हम हैं जिन्होंने इतने साल तक अपने ऊपर किसी स्त्री की परछाई तक नहीं पड़ने दी और एक ये हैं…आजकल के युवा सन्यासी.. स्त्री की छाया तो दूर…उसे स्पर्श भी किया..और सिर्फ स्पर्श ही नहीं, उसे कंधे पर भी उठा लिया…अभी मठ में जाकर भगवान् बुद्ध से इसकी शिकायत करता हूं. ऐसे नीच को तो संघ से ही निकाल देना चाहिए और भगवान् बुद्ध से भी ये आग्रह करूंगा कि आगे से इन युवाओं को दीक्षा ही न दें. ये अपने ऊपर सयंम तो रख नहीं सकते’.

यही सब सोचते विचारते मठ आ गया. वह तेज़ी से अन्दर गया और भगवान् बुद्ध से भेंट करने उनके पास गया. बुद्ध शांत मुद्रा में एक वृक्ष के नीचे बैठे थे. बूढ़े भिक्षु ने उन्हें प्रणाम किया और सारा किस्सा सुना दिया कि कैसे उस युवा भिक्षु ने उस स्त्री को नदी पार करवाई. संघ के सभी भिक्षु इकठ्ठा हो गए. युवा भिक्षु को बुलाया गया. भगवान् बुद्ध ने उससे पूछा कि ‘ये वृद्ध आप पर जो आरोप लगा रहे हैं क्या वो सत्य है? क्या आपने किसी स्त्री को अपने कंधे पर उठाकर नदी पार करवाई?’

अब यहां उस युवा भिक्षु ने जो उत्तर दिया वो समझने लायक है. उसने कहा, ‘कौन स्त्री? अच्छा वो…हां-हां..मैंने उसे नदी पार करवाई थी.. परन्तु भगवान्, मैंने तो उस स्त्री को नदी के उस पार से अपने कंधे पर उठाया और इस पार उतार दिया था. पर ये वृद्ध भिक्षु तो अभी तक उसे अपने कंधे पर उठाए हैं.” ये बात सुनकर बुद्ध मुस्कुराए. उन्होंने युवा भिक्षु को आशीष दी और कहा कि सच में, किसी कार्य में शारीरिक संलग्नता से कहीं अधिक प्रभावी मानसिक लिप्तता है. युवा भिक्षु ने परोपकार की भावना से उस स्त्री को उठाया इसलिए उसका मन दूषित नहीं हुआ, जबकि बूढे़ भिक्षु का मन द्वेष भाव से भर गया और वे अब तक अशांत है.

सारी बात मन की है..अन्दर की है..युवा भिक्षु उस स्त्री को कंधे पर उठा कर भी उससे मुक्त रहे और बूढ़ा भिक्षु उस स्त्री का स्पर्श किए बगैर भी उससे बंध गया. उम्मीद है आपको भी ये बात समझ आ गई होगी. अक्सर हमें अच्छा व्यवहार करने की शिक्षा दी जाती है, जबकि आपका मानसिक आचरण अधिक महत्त्व रखता है.

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