’एक हादसा जीवन बदल सकता है, पर कमज़ोर नहीं बनाता’, इस बात की जीती-जागती मिसाल है सेना का ये हीरो

Akanksha Tiwari

‘विकलांगता बाधा उत्पन्न कर आपके जीवन को बदल सकती है, लेकिन किसी भी तरह से ये किसी व्यक्ति को कमज़ोर नहीं बनाती. इसे स्वीकार करें और अपने अंदर छिपी क्षमताओं को पहचानें’.

देश की आवाम के लिये ये मैसेज 32 वर्षीय आर्मी हीरो गौरव दत्ता की तरफ़ से, जो आज के समय में सभी के लिये मिसाल हैं. अब इस हीरो के बारे में ज़रा विस्तार से बात करते हैं. 8 जुलाई 2001 को कर्नल गौरव की ड्यूटी ऑपरेशन रक्षक के लिए नियंत्रण रेखा (एलओसी) जम्मू और कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले में लगा दी गई. इस दौरान Non-Metallic Mine पर पैर पड़ने की वजह से उनका बांया पैर आधा कट कर अलग हो गया.

एक इंटरव्यू में इस डरावने पल को याद करते हुए गौरव बताते हैं कि बाएं पैर का आधा हिस्सा लटका हुआ था, जिसमें से काफ़ी ख़ून निकल रहा था. मैंने दूसरे सैनिक से दाढ़ी बनाने वाली ब्लेड मांगी और आधे लटके हुए हिस्से को काट कर अलग कर दिया. इस हादसे के बाद भी ये आर्मी हीरो हारा नहीं और 750 मीटर की तैराकी, 20 किलोमीटर की साइकिलिंग और 5 किलोमीटर की दौड़ के साथ, पुणे, हैदराबाद, बेंगलुरू, थोनूर, चेन्नई, दिल्ली और गोवा को कवर करते हुए, उन्होंने 12 ट्रायथलॉन पूरे किये. यही नहीं, अब वो दूसरों को भी दौड़ने के लिये ट्रेनिंग देते हैं.

गौरव का जन्म 1969 में लेफ़ि्टनेंट कर्नल एम डी शर्मा (सेवानिवृत्त) और उनकी पत्नी मीना के घर हुआ था. सिकंदराबाद में अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने मेरठ कॉलेज से स्नातक किया. गौरव बताते हैं कि जन्म से ही उनके पास सेना का महौल रहा. 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान हम जामनगर में थे और उस समय मैं सिर्फ़ तीन साल का था. वो कहते हैं मुझे याद है हवाई हमले के सायरन बजते ही उनकी मां उन्हें गोद में उठाकर खाइयों की तरफ़ भागी. आगे वो बताते हैं कि सेना उनके डीएनए में है.

1990 में देहरादून भारतीय सैन्य अकादमी में शामिल होने के एक साल बाद उन्हें उनके पिता की यूनिट, 7वीं बीएन, द ब्रिगेड ऑफ़ द गार्ड्स में नियुक्त कर दिया गया. अपने जीवन के बुरे पल को याद करते उन्होंने बताया कि पैर कटने के बाद मुझे अस्पताल पहुंचने में 12 घंटे का समय लगा, ख़ून ज़्यादा बह जाने के कारण उनकी याददाश्त भी प्रभावित हुई. प्रोटोकॉल के तहत उन्हें आगे के उपचार के लिये पुणे भेज दिया गया. वहीं डॉक्टर्स ने जब उन्हें उनके आर्टीफ़िशयल पैर के बारे में बताया, तो उनके मन में सिर्फ़ एक चीज़ थी कि वो फिर से दौड़ना चाहते हैं.

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अस्पताल में 10 महीने रहने के दौरान स्वर्गीय कैप्टन बिक्रमजीत सिंह बाजवा के साथ हुई मुलाक़ात ने उनके अंदर जोश भर दिया. वहीं चोट लगने के 13 साल बाद वो फिर से दौड़ने लगे. सबसे पहले, हैदराबाद में 2014 में 5,000 मीटर की दौड़ में हिस्सा लिया. इसके साथ ही उन्होंने 2009 के इंटरनेशनल व्हीलचेयर और एमपुति स्पोर्ट्स फे़डरेशन वर्ल्ड गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व कर कांस्य पदक अपने नाम किया और इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

Source : TBI

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