पिता को खोने से लेकर Sexual Assault तक, इस ट्रांसजेंडर पत्रकार की कहानी आपको रुला देगी

Ishi Kanodiya

‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’

और बात जब किन्नरों की आ जाए तब तो हम सब जानते ही हैं कि लोग अपनी ज़बान से अपशब्द निकालने से पहले ज़रा भी नहीं सोचते हैं. लोग बार-बार उनकी पहचान पर सवाल उठाते हैं.  

अपने ऊपर उठी इन्हीं आवाज़ों को नीचा किया है ज़ोया ने अपनी हिम्मत और जीवन अपने शर्तों पर जीने की चाह से.

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जब तक मैं 10 साल का हुई मुझे पता चल गया था कि मैं बाकी लड़कों से अलग हूं. मेरे पिता के निधन के बाद हमें हमारे घर से निकाल दिया गया और मेरी मां को शराब की लत लग गई. वो लोगों से लड़ती थीं और कई बार तो लोग हिंसक हो जाते थे. वो कई दिनों तक के लिए ग़ायब हो जाती थीं और हमें ये भी नहीं पता होता था कि वो वापस आएंगी. मां के इस व्यवहार के चलते हमें सब अपने घर से बहार निकल दिया करते थे.

ज़िंदगी ने जो कठनाइयां ज़ोया की राहों में डाली थीं उसमें से निकलते हुए, अपनी पहचान को सबसे छुपाते हुए ज़ोया की ज़िंदगी ने एक और करवट ली. पर इस बार उसकी ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए.

एक बार मेरी मां मुझे एक दरगाह ले गईं. ये सोचकर कि मेरे ऊपर कोई जादू-टोना हो गया है. यहां पहली बार मैंने एक किन्नर को देखा. मैं उसके साथ दोस्त बन गया. मुझे आखिरकार स्वतंत्र महसूस हुआ और एक वर्ष के भीतर मुझे उसके समुदाय में स्वीकार कर लिया गया. मैंने हिम्मत जुटाई और मां को सब कुछ बता दिया. लेकिन उसने मुझे अस्वीकार कर दिया- दोस्तों, परिवार और पड़ोसियों ने भी मुझे नहीं अपनाया. घृणा के बावजूद मैंने अपने बाल बढ़ाए, लिपस्टिक लगाई और एक लड़की की तरह कपड़े पहनने लगा.
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पर शायद अभी उसे अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और भयानक जंग लड़नी बाकी थी.

एक बार ट्रेन में एक पुलिस वाला मुझसे बहस करने लगा. वह मुझे और एक दूसरे व्यक्ति को कोच से पुलिस स्टेशन ले गया. उसने जबरदस्ती हमारे कपड़े उतरवाए, हमें मारा और हमें एक-दूसरे के साथ शारिरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया. उसने ये सब कुछ रिकॉर्ड भी कर लिया था. जब मैंने शिकायत दर्ज करने की कोशिश की तो उसे अस्वीकार कर दिया गया.  

समाज ने उसे अपने से अलग-थलग कर दिया और पैसे की कमी के चलते हालात और ख़राब होने लगे.

नौकरी की तलाश में ज़ोया ने हर जगह का दरवाज़ा खटखटाया पर हर तरफ उसको एक ही जवाब मिला कि ‘उसके जैसे’ लोगों को वो नौकरी पर नहीं रखते. 

वक़्त फिर पलटा, जहां सारे दरवाज़े बंद हो गए थे ज़ोया के लिए एक नया दरवाज़ा खुला. 

कुछ कॉलेज के छात्रों ने मुझे देखा और मुझे अपनी डॉक्यूमेंट्री में फ़ीचर करने के लिए कहा. मैं घबरा गया था लेकिन उन्होंने मेरी हिम्मत बांधी. वो मेरी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ था – मुझे उसके बाद एक हिंदी धारावाहिक में काम भी करने को मिला! मैंने एक दो फ़िल्मों में भी काम किया और अवॉर्ड भी जीते. एक समाचार चैनल के मालिक ने कहा कि वो मेरे काम से प्रभावित है. मैंने एक बहुत बड़ा जोख़िम लेते हुए उनसे नौकरी मांगी. मुझे बहुत आशचर्य हुआ. उन्होंने मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया. मेरा चयन हो गया और मैं मुंबई का पहला ट्रांसजेंडर पत्रकार बना.
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जहां ज़ोया को हर जगह से निराशा मिल रही थी वहीं इस पूरी घटना ने उसके जीवन को नई दिशा दी. उसको अपने प्रति नया नज़रिया दिया. उसको इस बात का एहसास दिलवाया कि ख़ुद से प्यार करना जितना मुश्किल है उतना ही ज़रूरी भी. 

मैंने सब कुछ देखा है- लोगों को खोना, नौकरी ना होना और इज़्ज़त के साथ व्यवहार ना किया जाना. बहुत आसान नहीं था पर मुझे अपने आप से प्यार करने में बहुत वक़्त लगा और मैं दुनिया को अब अपने ऊपर फिर से हावी नहीं होने दूंगी. ये मैं हूं, मैं सुंदर हूं… जैसी भी मैं हूं.
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वाक़ई, हर जंग को जीतने की शुरुआत ख़ुद से प्यार करने से ही शुरू होती है.

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