रानी रासमणि, वो बंगाली महिला जिसने अंग्रज़ों को उन्हीं की भाषा में दिया मुंह तोड़ जवाब

Akanksha Tiwari

लगभग 200 साल तक हिंदुस्तान पर अंग्रेज़ों का राज रहा. इस दौरान देश की जनता ने बहुत कुछ देखा और झेला. देश के कुछ महान और होनहार लोगों ने अंग्रज़ों को सबक भी सिखाया. जिनकी कहानियां आज भी ऐतिहासिक पन्नों में दर्ज हैं. ऐसी ही एक छोटी सी मगर प्रेरणादायक कहानी रानी रासमणि की भी है. रानी रासमणि वो मामूली महिला थीं, जिनके तलवार से तेज़ दिमाग़ ने अंग्रेज़ों को उनके आगे झुका दिया.

tosshub

कौन थीं रानी रासमणि?

बंगालनिवासी रानी रासमणि का जन्म 28 सितंबर 1793 को केवट समुदाय में हुआ था. उनके माता-पिता मछली पकड़ कर घर चलाते थे. एक छोटे समुदाय से होने की वजह से उनके परिवार को कभी समाज में सम्मान की नज़रों से नहीं देखा गया. वो लगभग सात साल की होंगी, जब उनके सिर से माता-पिता का साया उठ गया.

thestatesman

इसके बाद 11 साल की उम्र में उनकी शादी जमींदार बाबू राजचंद्र दास से कर दी गई. रानी जंमीदार की तीसरी पत्नि थीं और वो उम्र में पति से काफ़ी छोटी थीं. यही वजह थी कि वो छोटी सी उम्र में विधवा हो गई थीं. रानी छोटे समुदाय से ज़रूर थीं, लेकिन उनका दिमाग़ काफ़ी तेज़ था. इसलिये राजचंद्र दास उन्हें अपने बिज़नेस में शामिल कर लिया था.

wikimedia

कैसे दिया अंग्रेज़ों को उनकी भाषा में जवाब?

कहा जाता है कि 1840 के आस-पास अंग्रेज़ों द्वारा बंगाल में एक नया नियम लागू किया गया. नियम के मुताबिक, जो भी मछुआरे हुगली नदी पर मछली पकड़ने आयेंगे, उन्हें टैक्स देना होगा. बेचारे मछुआरे वैसे ही कैसे-कैसे जीवन काट रहे थे. ऊपर से टैक्स का बोझ. अंग्रेज़ों का कहना था कि मछलियों की वजह से स्टीमरों के आने में दिक्कत होती है. इसलिये उन्हें टैक्स तो देना होगा.

wikimedia

ब्रिटिश सरकार के अत्याचार का शिकार मछुआरे अपनी तकलीफ़ लेकर रासमणि के पास पहुंचे. उस समय रानी को बांग्ला की राशमोनी के नाम से भी जाना जाता था.  

tosshub

ब्रिटिश सरकार ने रानी से डील तो कर ली थी, पर वो ये भूल गये कि स्टीमरों के आने-जाने में अभी भी दिक्कत होगी. बाद में हुआ भी वैसा ही. उन्होंने रानी से जवाब मांगा, तो रानी ने भी अपने कागज़ दिखा दिये. जिसके बाद अंग्रेज़ उनका कुछ न बिगाड़ सके और उन्हें समझ आ गया कि ये सब रानी ने ग़रीब मछुआरों के लिये किया था.

patrika

इस क़िस्से के बाद हर ओर उस साधारण महिला की चर्चा थी. 1861 के आस-पास रानी का निधन हो गया था, लेकिन अपनी मौत से पहले उन्होंने दक्षिणेश्वर काली मंदिर का निर्माण भी कराया था. तेज़ दिमाग़ और ग़रीब की मदद करने की वजह से आज भी बंगाल में रानी रासमणि को याद किया जाता है.

आपको ये भी पसंद आएगा
Success Story: बिहार की इस बिटिया ने 5 दिन में 5 सरकारी नौकरी हासिल कर रच दिया है इतिहास
पिता UPSC क्लियर नहीं कर पाए थे, बेटी ने सपना पूरा किया, पहले IPS फिर बनी IAS अधिकारी
मिलिए ओडिशा की मटिल्डा कुल्लू से, जो फ़ोर्ब्स मैग्ज़ीन में जगह पाने वाली एकमात्र भारतीय ‘आशा वर्कर’ हैं
पिता ठेले पर बेचते हैं समोसा-कचौड़ी, बेटी ने जीता ‘ब्यूटी कॉन्टेस्ट’, प्रेरणादायक है प्रज्ञा राज की कहानी
मिलिए नेपाल की प्रगति मल्ला से, जिन्हें मिल चुका है दुनिया की बेस्ट ‘हैंड राइटिंग’ का ख़िताब
बिहार के एक किसान की 7 बेटियों ने पुलिस ऑफ़िसर बनकर पेश की एक अनोखी मिसाल