जब भी काकोरी रेल डकैती या सिर्फ़ काकोरी का ही ज़िक्र कहीं सुनते हैं, तो ज़हन में एक ही नाम आता है... राम प्रसाद बिस्मिल.

भारत की आज़ादी कई क्रांतिकारियों ने अपने लहू से लिखी थी. लेकिन बिस्मिल सिर्फ़ क्रांतिकारी नहीं थे. उनके अंदर एक कवि, एक शायर भी बसता था.

Source: Aaj Abhi

बिस्मिल यूं बने क्रांतिकारी

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले में 11 जून 1897 को, मां मूलारानी और पिता मुरलीधर के घर बिस्मिल का जन्म हुआ.

क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत 1913 से हुई. बिस्मिल के समय के वैदिक धर्म के प्रमुक प्रचारकों में से एक थे भाई परमानंद. भाई परमानंद से बिस्मिल ने गदर पार्टी, लाला हरदयाल और ख़ुद परमानंद को पार्टी गतिविधियों का हिस्सा रहने के कारण सुनाई गई फांसी की सज़ा की बात सुनी. ये सब सुनकर बिस्मिल का लहू भी हिलोरे मारने लगा और वतनपरस्ती की भावना आंखों में उतर गई.

भाई परमानंद द्वारा सुनाए गए किस्से ने बिस्मिल पर इतनी गहरी छाप छोड़ी कि उन्होंने 'मेरा जन्म' शीर्षक से एक कविता लिख डाली. इसके साथ ही ब्रितानिया साम्राज्य के विनाश की कसम खाई और क्रांतिकारी बनने की प्रतिज्ञा ली.

मैनपुरी षड्यंत्र में संलिप्त

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में 1915-16 के बीच एक क्रांतिकारी संस्था की स्थापना हुई थी, नाम था 'मातृदेवी'. औरैया के क्रांतिकारी गेंदालाल दीक्षित के नेतृत्व में इस संस्था ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष चलाया. The Wire में छपे लेख के मुताबिक, इस संस्था से हुए एक मुक़ाबले में 50 अंग्रेज़ सैनिक मारे गए थे. इस मुक़ाबले के लिए बिस्मिल और दीक्षित ने इटावा, शाहजहांपुर, मैनपुरी, आगरा जैसे कई ज़िलों में अभियान चलाया और युवाओं को वतन पर सबकुछ वार देने के लिए प्रेरित और एकत्रित किया. उन्हीं दिनों, बिस्मिल ने अपनी 'मैनपुरी की प्रतिज्ञा' कविता भी लिखी.

इसी बीच एक मुखबीर ने अंग्रेज़ों को 'मातृदेवी' और क्रांतिकारियों की गतिविधियों की सूचना दे दी. अंग्रेज़ों ने धावा बोला और 35 क्रांतिकारी शहीद हो गए. बिस्मिल बच निकले और 2 साल तक भूमिगत रहे. उन्हें पकड़ने की अंग्रेज़ों की नीतियां विफल हो रही थी.

1918 में निश्चित होकर वो दिल्ली में हो रहे कांग्रेस अधीवेशन में पहुंचे और वहीं अंग्रेज़ों ने धावा बोल दिया. भागने की कोशिश की और बचने का कोई उपाय न देख बिस्मिल यमुना में कूद गए. आज का ग्रेटर नोएडा, तब रामपुर जागीर था, वहीं बिस्मिल ने शरण ली और 'बोल्शेविकों की करतूत' लिखने की शुरुआत की.

असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने पर HSRA से जुड़े

1922 में चौरी-चौरा कांड(भीड़ ने 22 पुलिसवालों को ज़िन्दा जला दिया था) के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था. और इसी के बाद बिस्मिल का 'अहिंसक आंदोलन' पर से विश्वास उठ गया.

क्रांति का सपना पलकों पर लिए, चंद्रशेखर आज़ाद और बिस्मिल के नेतृत्व में HSRA (Hindustan Republican Association) बनी. अंग्रेज़ों के ईंटों का जवाब पत्थर से दिया जाने लगा. लेकिन यहां भी आर्थिक संकट आन पड़ा. अंग्रेज़ों का मुक़ाबला करने के लिए हथियार ख़रीदने के पैसे HSRA के पास नहीं थे.

काकोरी कांड और उसके बाद

हथियार ख़रीदने के लिए, 9 अगस्त, 1925 को काकोरी स्टेशन पर सरकारी खजाना लूटने का प्लैन बनाया गया. सरकारी खजाना तो लूट लिया गया लेकिन थोड़े ही दिनों बाद इसमें संलिप्त अधिकतर क्रांतिकारी पकड़े गए. 26 सितंबर, 1925 को बिस्मिल को भी गिरफ़्तार कर लिया गया और लखनऊ सेंट्रल जेल भेज दिया गया. कोर्ट में मुकदमा चला, बिस्मिल, अशफ़ाक उल्लाह खान, राजेन्द्रनाथ लाहिरी को खज़ाना लूटने के आरोप में फांसी की सज़ा सुनाई गई.

19 दिसंबर 1927 को बिस्मिल को फांसी दे दी गई. फांसी के दिन बिस्मिल ने, मशहूर शायर 'बिस्मिल अजीमाबादी' की ग़ज़ल 'सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' को पूरे जोश-ओ-ख़रोश के साथ गाया.

बिस्मिल जैसे शेर को एक शेरनी ही जन्म दे सकती थी. ये बात इस क़िस्से से पुख़्ता हो जाती है. जब जेल में बिस्मिल से मिलने उनकी मां पहुंची, तो बिस्मिल की आंखे डबडबा गईं. ये देख मां ने कहा,

तुझे ऐसे रोकर ही फांसी चढ़ना था, तो तूने क्रांति की राह चुनी ही क्यों? तब तो तुझे इस रास्ते पर कदम ही नहीं रखना चाहिए था.

ऐसे क्रांतिकारी फिर ने होंगे, न ही होगी वो क्रांति. 'राम', 'बिस्मिल', 'अज्ञात' को शत् शत् नमन.