अपर्णा सेन लीक से हटकर फ़िल्में बनाती हैं. महिलाओं की सोच को आवाज़ देती हैं, इनकी फ़िल्में. 'सोनाटा' उनकी पहली English Directional फ़िल्म है. ये करने के लिए ही हिम्मत चाहिेए, क्योंकि समाज में औरतों की बात करने वाले बहुत कम लोग हैं. Feminist होना जिस समाज में किसी गुनाह से कम नहीं है, वहां औरतों की ख़्वाहिशों और सोच की बात करने की हिमाकत कम लोग ही करते हैं.

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सोनाटा, एक बांगला शब्द है, इस नाम से किसी को प्यार से बुलाया जाता है. हिन्दी वाला बाबू ही समझ लीजिए. फ़िल्म 3 औरतों पर केंद्रित है. अधेड़ उम्र की ये औरतें ट्रेलर में Fun करती हुई नज़र आ रही हैं.

आमतौर पर 40+ की औरतों से ये उम्मीद की जाती है कि वे घर पर रहें, घर संभाले, घर के मंदिर में घी के दिए जलाए, पर यहां तो औरतें सिगरेट जला रही हैं. शबाना आज़मी डांस करती दिखती हैं, लिलेट दुबे, भी मज़े करती हुई नज़र आती हैं.

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तीनों औरतें एक साथ बैठकर वाइन पीती हैं और ज़िन्दगी पर बातें करती हैं. ये फ़िल्म 3 अविवाहित औरतों की कहानी है. ये फ़िल्म महेश एलकुंचवार द्वारा लिखे गए नाटक पर बनाई गई है. हम Modernism का चोला तो पहन ले लेते हैं, पर असल में हम उतने ही अकेले भी होते हैं. किसकी ज़िन्दगी में क्या हो रहा है, वो खुश है या नहीं, ये पता लगाना बहुत मुश्किल है.

फ़िल्म में तीनों महिलाएं करियर में बहुत ऊंचे पायदान पर हैं, पर असल ज़िन्दगी में उनको ग़मों ने घेर रखा है. इन तीनों की सोच भी काफ़ी अलग है. Porn से लेकर, 'Men in Boxers' पर भी खुलेआम चर्चें होते हैं. इन सबके बावजूद, कहीं न कहीं उनके दिमाग में ये बात भी है कि कहीं उनकी बातें कोई सुन न ले.

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ये कोई Feminist फ़िल्म नहीं है, क्योंकि लिलेट खुद कहती हैं, कि हम कितने बेकार हैं, न तो हम Feminist हैं और न ही हमारी ज़िन्दगी का कोई लक्ष्य है. अपर्णा सेन के Real Life पति, फ़िल्म में भी अपर्णा के प्रेमी के रूप में नज़र आते हैं.

सोनाटा, कई मायनों में हम में से बहुतों की कहानी कहती है. चाहे वो औरतें हो या पुरुष, सब कहीं न कहीं बुलंदियां छूने में इतने व्यस्त हो गए कि कहीं ठहर ही नहीं सके. एक और बात है, सबको ज़िन्दगी में सब कुछ नहीं मिलता. जो स्थापित की गईं मान्यताओं के विपरीत जाते हैं, उनकी ज़िन्दगी आसान नहीं होती.

हमारी हिन्दुस्तानी जनता के हिसाब से तो ये फ़िल्म बिल्कुल भी नहीं है. वैसे भी औरतों के दिल की बात करने वाली फ़िल्मों का हश्र हम देख ही चुके हैं. चाहे वो Lipstick Under my Burkha हो या फिर Bandit Queen, औरतों की बात करना किसी भी फ़िल्मेकर के लिए कभी आसान नहीं रहा.