इतिहास पढ़ने के बाद लगता है कि बीते कुछ सालों में हमने कितना लंबा सफ़र तय कर लिया है. इस सफ़र में कुछ चीज़ें आज भी हमारे साथ शान बन कर खड़ी हैं. सुख-दुख और शानो-शौक़त की एक ऐसी ही मिसाल दिल्ली का लाल किला भी है. लाल किले के पास हिंदुस्तान की हर करवट का हिसाब है. ये मुग़ल सल्तनत से लेकर डिजिटल इंडिया बनने तक का गवाह है.

Red Fort
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लाल किले की दीवारें देख कर उसके अतीत के बारे में जानने की इच्छा होती है. लाल किले का माहौल उस वक़्त क्या होता होगा, जब वहां मुग़लों का राज था. चलिये जानते हैं कि लाल किले में कैसा जीवन जीते थे मुग़ल बादशाह.

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लाहौरी गेट  

लाहौरी गेट किले का प्रवेश द्वार था. मुख्य द्वार पर पहले दो बड़ी-बड़ी हाथियों की मूर्तियां थीं, लेकिन बाद में इन्हें तुड़वा दिया गया था.

लाहौरी गेट
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नौबत खाना

कहा जाता है मुग़लकाल में नौबत खाने में दिनभर में कम से कम पांच बार ढोल-नगाड़ा बजाकर बदलते पहर का ऐलान किया जाता था. यही नहीं, किसी भी ख़ास मौक़े पर तो सारा दिन ढोल बजता रहता था. किले में संगीत के भी ख़ास इंतज़ाम थे. इसके बाद 1909 में ब्रिटिश शासन के दौरान इमारत में एक संग्रहालय खोल दिया गया, जो कि अब तक चल रहा है.  

नौबत खाना
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दीवान-ए-आम  

दीवान-ए-आम के पीछे कुछ इमारतें बनी हुई हैं, जो मुग़लई ज़िंदगी को दर्शाती हैं. वहीं दीवान-ए-ख़ास में बादशाह लोग कुछ ख़ास लोगों से मिलते-जुलते थे. पहले यहां के खंबे क़ीमती नगों से जड़े हुए थे, लेकिन अब किसी का नामो-निशान तक नहीं बचा है.

दीवान-ए-आम
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ख्‍़वाबगाह 

दीवान-ए-ख़ास के दाईं तरफ़ बड़ी बैठक, इम्तियाज़ महल, मुमताज़ महल, तस्बीह खाना और ख़्वाबगाह बना हुआ है. कहते हैं कि बादशाह ने नमाज़ के लिये तस्‍बीह ख़ाना बनवाया हुआ था. वहीं ख़्वाबगाह में सोने के लिये जाते थे. वहीं महिलाओं के लिये निजी कक्ष बन हुए थे, जहां कोई भी मर्द नहीं आ सकता था. ख़्वाबगाहों में शहज़ादों और बादशाह लोगों को कहानियां भी सुनाई जाती थी. किले के दरवाज़ों से हरदम भीनी-भीनी सुंगध आती रहती थी.  

diwan e khas
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हमाम  

अब ASI ने हमाम पर ताला जड़ दिया है, लेकिन मुग़लकाल में इसे नहाने के लिये इस्तेमाल किया जाता था.  

हमाम
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चबूतरे  

एक दौर था जब दिल्ली में जमकर बारिश होती थी. इसी बारिश का आनंद लेने के लिये किले में सावन-भादो नामक दो चबूतरे बने हुए थे. 

Sawan/Bhadon pavilions
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रमज़ान के महीने में लगती थी रौनक  

रमज़ान के महीने में किले में ख़ास रौनक हुआ करती थी. सूरज ढलते ही बादशाह के इशारे पर तोपें दाग़ी जाती थीं. मुग़लकाल में त्योहारों में लाल किला रंगीनियों और मुशायरों से गूंज उठता था.

सच में वो भी क्या समय था.