Ambedkar Jayanti-2021: इतिहास के पन्नों में ऐसी कई कहानियां दफ़न हैं, जो हम तक नहीं पहुंच पाती हैं. आज भी कई ऐसी घटनाएं व बातें हैं जो किसी न किसी वजह से हम तक नहीं पहुंच पाई हैं.


Reddit पर एक व्यक्ति ने एक किताब, 'भारत भाग्य विधाता' की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा- इस किताब में बाबासाहेब बी.आर.अम्बेडकर (Babasaheb B.R. Ambedkar) का लोगों के लिए आख़िरी संदेश था, हमने भी उसको जस का तस रखने की कोशिश की है-  

Source: Live Mint

'आप लोगों को नहीं पता है कि मुझे क्या परेशान और दुखी करता है. मेरे दिमाग़ में जो पहली चिंता है वो ये कि मैं अपने जीवन का मिशन पूरा नहीं कर पा रहा हूं. मैं जीते-जी अपने लोगों को दूसरे समुदाय के जैसे ही शासन में राजनैतिक शक्ति के साथ देखना चाहता था. मैं बीमारी से लगभग विकलांग हो चुका हूं, गिर चुका हूं. जो भी मैंने हासिल किया उसका फ़ायदा कुछ शिक्षित लोग उठा रहे हैं, जिन्होंने अपने कपट से ये साबित किया है कि वो किसी काम के नहीं हैं, उनको अपने पिछड़े भाईयों से कोई सहानुभूति नहीं है.


वो मेरी कल्पना से भी आगे निकल चुके हैं, वो सिर्फ़ अपने लिए, अपने मतलब के लिए जीते हैं. उनमें से कोई भी सामाजिक कार्य करने के लिए तैयार नहीं है. वो अपने ही पतन की तरफ़ आगे बढ़ रहे हैं. अब मैं गांव में रहने वाले असंख्य अशिक्षित लोगों की तरफ़ ध्यान मोड़ना चाहूंगा, जो आर्थिक रूप से अब भी कमज़ोर हैं. मेरी ये इच्छा थी कि मेरे जीते-जी मेरी सारी किताबें प्रकाशित हो जायें. ये सोच कि मैं अपनी किताबें: 'बुद्ध ऑर कार्ल मार्क्स (Buddha Or Karl Marx), रेवल्युशन एंड काउंटर-रेवल्युशन इन एनशियंट इंडिया' (Revolution and Counter Revolution in Ancient India) और 'रिडल्स ऑफ़ हिन्दुइज़्म' (Riddles in Hinduism: The Annotated Critical Selection) को प्रकाशित नहीं कर पाऊंगा. मुझे काफ़ी व्यथित करता है क्योंकि मेरे बाद इन्हें कोई और प्रकाशित नहीं कर पाएगा.'  

Source: Swarajya

वो भावनाओं में बह रहे थे मैंने उन्हें रोकना चाहा पर उन्होंने अपनी बात जारी रखी. 'मैं ये भी चाहता था कि कोई शोषित वर्ग से आगे आये, मेरे जीते जी और आंदोलन को जारी रखने का भारी दायित्व उठाए. लेकिन ऐसा कोई भी नहीं मिला. मेरे लेफ़्टिनेंट्स जिन पर मुझे पूरा भरोसा और आत्मविश्वास था कि वो आंदोलन जारी रखेंगे, उन पर आने वाले भारी दायित्व के बारे में सोचे बिना सत्ता और शक्ति के लिए आपस में ही लड़ रहे हैं...


मैं अब भी इस देश की और देश के लोगों की सेवा करना चाहता हूं. लेकिन ऐसे देश में जन्म लेना पाप है जहां के लोग जातिगत सोच रखते हैं और पक्षपाती हैं. मौजूदा ढांचे में देशहित के कार्यों में ध्यान देना मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि लोग प्रधानमंत्री की आवाज़ के विरुद्ध कोई आवाज़ सुनने को तैयार नहीं हैं. ये देश किस तरह गर्त में जा रहा है. चारों तरफ़ से बातें सुनने के बावजूद मैंने बहुत कुछ किया और मरते दम तक करता रहूंगा.'  

Source: Financial Express

अंबेडकर ने आंसू भरी आंखों से नानक चंद (Nanak Chand) की ओर देखा और नानक चंद ने उनको. इसके बाद उन्होंने कहा- 'हिम्मत रखो, दुखी मत हो. किसी न किसी दिन तो ज़िन्दगी ख़त्म होनी ही है'.


इसके बाद अंबेडकर ने नानक चंद से कहा, 'नानक मेरे लोगों से कहना, 'मैंने जो भी किया है, बहुत मुश्किलों को पार करके किया है और मेरी पूरी ज़िन्दगी विरोधियों से लड़ते हुए ही गुज़री है'. 

इसके बाद अंबेडकर ने तीन बार कहा- 'आज जहां ये कारवां खड़ा है वहां तक मैंने इसे बहुत मुश्किलों से पहुंचाया है. ये कारवां तमाम मुश्किलों, चुनौतियों और बाधाओं के बावजूद इसे आगे बढाते रहना. अगर मेरे लोग ये कारवां आगे नहीं ले जा सकते तो उन्हें इसे वहीं छोड़ देना चाहिए जहां ये आज है, पर किसी भी हालत में ये कारवां पीछे नहीं चलना चाहिए. 

ये मेरा आख़िरी संदेश है. दृढ संकल्प होकर जाओ और उन्हें बताओ, जाओ और उन्हें बताओ, जाओ और उन्हें बताओ.'  

Source: Live Mint

बाबासाहेब अंबेडकर की इन बातों को पढ़कर आपके मन में जो भी आया हो उसे कमेंट बॉक्स में लिख दें.