Chhath Puja 2022: आज से 4 दिनों तक चलने वाला ‘छठ महापर्व’ शुरू हो गया है. छठ पूजा संतान की लंबी आयु, परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए किया जाता है. इस पवित्र पर्व के दौरान व्रती महिला व पुरुष 36 घंटे का निर्जला व्रत रखकर सूर्यदेव और छठी मईया की पूजा करते हैं. इस दौरान उपवास के साथ कई तरह के कठिन नियमों का पालन भी किया जाता है. हमेशा की तरह दिवाली के 6 दिनों के बाद ‘छठ पूजा’ का त्यौहार मनाया जाता है.

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नहाए खाए का महत्व (Nahay Khay Significance)

छठ पूजा (Chhath Puja) का पहला दिन ‘नहाए खाए’ होता है. इसका अर्थ है स्नान करके भोजन करना होता है. मूल रूप से ‘नहाए खाए’ का संबंध शुद्धता से है. इसमें व्रती ख़ुद को सात्विक और पवित्र कर ‘छठ व्रत’ की शुरुआत करती हैं. इस दौरान कुछ विशेष रीति रिवाजों का पालन करना होता है. इस परंपरा में ‘व्रती’ नदी या तालाब में स्नान कर कच्चे चावल का भात, चनादाल, लौकी, घीया प्रसाद के रूप में बनाकर ग्रहण करती हैं.  

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छठ पूजा (Chhath Puja) में सूती वस्त्र भी बेहद अहम माने जाते हैं. इस ख़ास मौक़े पर व्रती महिलाएं ‘सूती साड़ी’ पहनती हैं. लेकिन अधिकतर लोगों को नहीं इसके पीछे की असल वजह पता नहीं होगी. 

महिलाएं सूती पहनती हैं सूती साड़ी

छठ पूजा (Chhath Puja) बेहद पवित्र त्यौहार माना जाता है. इस ख़ास मौके पर ‘सूती वस्त्र’ पहनने की परंपरा है. ये परंपरा सदियों से चलती आ रही है. दरअसल, छठ पूजा के दौरान व्रती महिलाएं व पुरुष केवल ‘सूती वस्त्र’ ही पहनते हैं. इस दौरान केवल बिना सिलाई किए हुए कपड़े ही पहने जाते हैं. ऐसे में महिलाएं बिना सिलाई वाली सूती साड़ी पहनती हैं. साड़ी ख़रीदते समय महिलाएं इस बात का विशेष ख़्याल रखती हैं कि वो सिलाई वाली न हो. 

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पुरुष पहनते हैं धोती-कुर्ता

छठ पर्व के दौरान केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि पुरुष भी 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं. इस मौके पर पुरुषों के भी कॉटन के धोती-कुर्ता पहनने की परंपरा है. ख़ासकर पूजा के दौरान पहिला व पुरुष को कॉटन की साड़ी और धोती-कुर्ता पहनकर ही पूजा करनी होती है. 

क्यों कठिन मानी जाती है छठ पूजा?

छठ पूजा को करना बेहद कठिन माना जाता है. एक बार कोई व्रत शुरू कर दे तो इसे लगातार करना होता है. इस दिन व्रती सिर्फ एक ही बार भोजन ग्रहण करते हैं. 4 दिन के पर्व में ‘तामसिक भोजन’ का त्याग कर सिर्फ़ ‘सात्विक भोजन’ ही किया जाता है. व्रती को 4 दिन तक ज़मीन पर सोना पड़ता है और ब्रह्मचर्य का पालन भी करना पड़ता है. इस व्रत को घर की महिलाओं को तब तक करना होता है, जब तक नई पीढ़ी की कोई महिला व्रत की शुरुआत न कर दे.