दुनिया में शायद ही ऐसा कोई देश होगा, जहां भारतीय न रहते हों. इन्हीं में से एक देश युगांडा भी है. दशकों पहले युगांडा में लाखों भारतीय रहा करते थे, लेकिन एक सनकी और खूंखार तानाशाह की वजह भारतीयों को या तो युगांडा छोड़ कर जाना पड़ा या फिर उन्हें देश से ही निकाल दिया गया. युगांडा के इस सनकी तानाशाह के बारे में कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं, जैसे कि वो इंसानों का खून पीता था, आदमखोर था. इस ख़ूंखार तानाशाह का नाम ईदी अमीन (Idi Amin) था.

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ईदी अमीन के सत्ता में आने से पहले युगांडा में एशियाई मूल (खासकर भारतीय) के लोगों का दबदबा हुआ करता था. युगांडा के लगभग हर सिनेमाघर में हिंदी फ़िल्में चला करती थीं. 70 के दशक में युगांडा की राजधानी कंपाला में अधिकतर कारोबार भी एशियाई मूल के लोग ही थे. सड़कों के नाम भी एशियाई मूल के लोगों के नाम पर ही थे. लेकिन ईदी अमीन के सत्ता में आते ही भारतीयों पर ज़ुल्म होने शुरू हो गए.  

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कौन था ईदी अमीन?

ईदी अमीन दादा सन 1971 से 1979 तक युगांडा का सैन्य नेता एवं राष्ट्रपति हुआ करता था. अमीन 1946 में ब्रिटिश औपनिवेशिक रेजिमेंट 'किंग्स अफ़्रीका राइफ़ल्स' में शामिल हो गया. इसके बाद ईदी ने युगांडा की सेना में मेजर जनरल और कमांडर के पद भी हासिल किये. देश के प्रमुख पद पर आसीन रहते हुए उसने स्वयं को फ़ील्ड मार्शल के रूप में भी पदोन्नत कर लिया.

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50 लाख लोगों को मार डाला था

25 जनवरी 1971 को युगांडा में सैन्य तख्तापलट के बाद मिल्टन ओबोटे को पद से हटा दिया गया और ईदी अमीन देश का राष्ट्रपति बन गया. अमीन के शासन को मानव अधिकारों के दुरूपयोग, राजनीतिक दमन, जातीय उत्पीड़न, गैर क़ानूनी हत्याओं, पक्षपात, भ्रष्टाचार के लिए जाना जाता था. अंतर्राष्ट्रीय प्रेक्षकों और मानव अधिकार समूहों का अनुमान है कि ईदी अमीन ने अपने शासनकाल में 1,00,000 से 5,00,000 लोगों को मार डाला था.   

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ख़ुद ही अपने आजीवन राष्ट्रपति किया घोषित  

अमीन सन 1975-1976 में 'अफ़्रीकी एकता संगठन' का अध्यक्ष बन गया. इस संगठन को अफ़्रीकी राज्यों की एकता को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था. 1977-1979 की अवधि के दौरान युगांडा को मानव अधिकारों को लेकर 'संयुक्त राष्ट्र आयोग' द्वारा तलब किया गया था. सन 1977 से 1979 तक अमीन ने ख़ुद को 'महामहिम आजीवन राष्ट्रपति, फ़ील्ड मार्शल, वीसी, डीएसओ, एमसी जैसे पदों की उपाधि दे दी थी. 

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बीबीसी के मुताबिक, ईदी अमीन की हुकूमत खत्म होने के बाद युगांडा में कई जगह लोगों की लाशें सड़ती हुई मिली थीं. इस दौरान तमाम सामूहिक कब्रों का पता भी चला था. वो वाकई में एक राक्षस था, जिसने अपने ही देश के लाखों लोगों को मौत के घात उतार दिया था.

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ईदी अमीन के शासनकाल में स्वास्थ्य मंत्री रहे हेनरी केयेंबा ने एक किताब लिखी थी जिसका नाम 'अ स्टेट ऑफ़ ब्लड: द इनसाइड स्टोरी ऑफ़ ईदी अमीन' था. इस किताब में उन्होंने लिखा है कि 'एक बार अमीन अस्पताल के मुर्दाघर में गया था, जहां उसके दुश्मनों के शव रखे गए थे. इसके बाद अमीन ने अपने इन दुश्मनों का खून पीना शुरू कर दिया था. युगांडा की काकवा जनजाति में इंसानों का ख़ून पीने की प्रथा है. अमीन भी काकवा जनजाति से आता था'.

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सन 1977 से ही युगांडा में ईदी अमीन के ख़िलाफ़ बगावत शुरू होने लगी थी. युगांडा के भीतर असंतोष और 1978 में तंज़ानिया के कंगेरा प्रांत को जीतने के प्रयास में 'युगांडा-तंज़ानिया युद्ध' ईदी अमीन के शासन के पतन का मुख्य कारण बना. इसके बाद अमीन लीबिया और सउदी अरब में निर्वासित जीवन जीने लगा. आख़िरकार 16 अगस्त, 2003 को सऊदी अरब के जेद्दा में इस ख़ूंखार तानाशाह की मौत हो गई.