दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने में थल व नेवी के साथ-साथ वायुसेना की भी अहम भूमिका होती है. वहीं, वायुसेना की जान माने जाते हैं फ़ाइटर पायलट, जो आसमान में दुश्मन सेना से हवाई मुक़ाबला करते हैं. इतिहास गवाह है कि भारत में कई जांबाज़ पायलट हुए, जिन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध से लेकर कारगिल युद्ध में अहम भूमिका निभाई. वहीं, ब्रिटिश हुकूमत के अंतर्गत भी भारत का एक ऐसा वीर फ़ाइटर पायलट हुआ, जिसकी वीरता की कहानी पूरे विश्व में मशहूर हो गई. आइये, जानते हैं इस बहादुर फ़ाइटर पायलट की कहानी.   

इंद्र लाल रॉय

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उस जांबाज़ फ़ाइटर पायलट का नाम था इंद्र लाल रॉय. इनका जन्म कलकत्ता (वर्तमान नाम कोलकाता) में 2 दिसंबर 1898 को हुआ था. रॉय एक पढ़े लिखे परिवार से संबंध रखते थे. उनके पिता का नाम पियरा लाल रॉय और माता का नाम लोलिता रॉय था.   

रॉयल फ़्लाइंग कॉर्प्स का हिस्सा

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जानकारी के अनुसार रॉय 1917 में रॉयल फ़्लाइंग कॉर्प्स का हिस्सा बन चुके थे. माना जाता है कि जब रॉय ब्रिटिश एयरफ़ोर्स में शामिल हुए, तो उनकी उम्र मात्र 18 वर्ष की थी. उनकी एयरफ़ोर्स में नौकरी लंदन के सेंट पॉल स्कूल में पढ़ते हुए ही लग गई थी.   

बने सेकेंड लेफ़्टिनेंट

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रॉय काफ़ी जिज्ञासु और मेहनती थे. उनकी प्रतिभा का अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उन्हें तीन महीने के अंदर ही प्रमोशन मिला और वो सेकेंड लेफ़्टिनेंट बन गए थे.  

प्रथम विश्व युद्ध में दिखाया पराक्रम   

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जानकारी के अनुसार रॉय रॉयल फ़्लाइंग कॉर्प्स की तरफ़ से प्रथम विश्व युद्ध में लड़े थे. कहा जाता है कि लड़ाई के दौरान उनका फ़्लाइंग टाइम 170 घंटे से ज़्यादा रहा था.   

गिराए दुश्मनों के फ़ाइटर प्लेन  

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माना जाता है कि प्रथम विश्व युद्ध की इस लड़ाई में उन्होंने 13 दिनों के अंदर दुश्मनों के 10 फ़्लाइंग प्लेन्स को नेस्तनाबूद कर दिया था. वहीं, प्रथम विश्व युद्ध में ही वो शहीद (22 July 1918) हो गए थे. जब रॉय शहीद हुए उनकी उम्र 19 वर्ष थी. बता दें कि उनकी वीरता के लिए उन्हें ‘डिस्टिंगुइश्ड फ़्लाइंग क्रॉस अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया था.   

छपा था उनकी वीरता पर लेख  

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21 सितंबर 1918 को ‘द लंदन गैजेट’ ने इंद्र लाल रॉय पर एक लेख छापा था, जिसमें उन्हें निडर और बेहतरीन फ़ाइटर पायलट कहा गया था. साथ ही उन्होंने किस तरह दुश्मनों के फ़्लाइंग प्लेन गिराए, इस बारे में भी जानकारी दी गई थी.