भगवान शिव की नगरी काशी हिंदुस्तान की ख़ूबसूरत जगहों में से एक है. ये वो शहर है जिसकी ख़ूबसूरती और रहन-सहन के बारे में जितनी बात करें कम है. इस शहर की सबसे रोचक बात ये है कि यहां के लोग भगवान शिव को पूजते नहीं, बल्कि उन्हें आर्शीवाद देते हैं. काशी के बारे में ये भी कहा जाता है कि भगवान शिव ने अपने त्रिशूल में इस शहर को समा रखा है.  

भगवान शिव की नगरी काशी
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इस शहर से जुड़ी कई सारी ऐसी बातें और परंपराएं हैं, जो लोगों को चकित करती हैं. एक ऐसी ही अनोखी परंपरा यहां की मणिकर्णिका घाट से भी जुड़ी हुई है.

मणिकर्णिका घाट की अनोखी परंपरा

काशी की मणिकर्णिका घाट पर साल में एक अनोखे महोत्सव का आयोजन किया जाता है. इस आयोजन में एक तरफ़ मुर्दों की लाशें जलती हैं. दूसरी ओर सेक्स वर्कर (नगर वधुएं) डांस कर रही होती हैं. ये एक अनूठी साधना है, जो कि शम्शान नाथ महोत्सव का हिस्सा है. जिसमें नगर वधुएं जलती लाशों के बीच पैरों में घुंघरू बांधे नाचती रहती हैं.

मणिकर्णिका घाट
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इस अनोखी साधना का मतलब क्या है? 

कहा जाता है कि नगर वधुएं नाचते हुए भगवान से विनती करती हैं कि अगले जन्म उनको ऐसी नर्क वाली ज़िंदगी न मिले. मान्यता के मुताबिक, अगर सेक्स वर्कर जलती चिताओं के सामने नटराज को साक्षी मान कर नाचेंगी, तो अगले जन्म उन्हें भगवान ऐसी नर्क वाली ज़िंदगी नहीं देंगे. इस प्रथा की शुरूआत आमेर के राजा सवाई मान सिंह के समय में शुरू हुई थी. राजा ने ही 1985 में घाट पर मंदिर बनवाया था. आपको बता दें कि ये महोत्सव चैत्र नवरात्र की सप्तमी की रात में आयोजित किया जाता है. 

नटराज
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कहते हैं कि राजा के समय में श्मशान नाथ महोत्सव में महाश्मशान होने के कारण हर कलाकार ने संगीत प्रोग्राम के लिये मना कर दिया था. इसके बाद उन्होंने महोत्सव के लिये नगर वधुओं को आमंत्रित किया. तब से लेकर आज तक ये प्रथा कायम है. कहते हैं कि जो भी इंसान अंतिम समय में मणिकर्णिका घाट जाता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. हांलाकि, कुछ लोगों की ये कामना पूरी होती है.